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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 37

From जैनकोष



ण जाणइ तं णाणं ज पिच्छइ त च दंसणं णेय ।

तं चारित्तं भणियं परिहारी पुण्णपावाणं ꠰꠰37꠰।

सम्यग्ज्ञान का दिग्दर्शन―रत्नत्रय का लक्षण इस गाथा में बताया है । रत्नत्रय में तीन बातें है―(1) ज्ञान (2) दर्शन और (3) चारित्र । जो जानता है वह ज्ञान । जो देखता है वह दर्शन है और जो पुण्य-पाप का परिहार है वह चारित्र है ꠰ आत्मा है और उसका परिणमन चल रहा है । जैसे आत्मा एक अखंड वस्तु है ऐसे ही उसका जो भी परिणमन है वह भी एक अखंड है, दूसरा परिणमन होगा वह भी अखंड परिणमन होगा । परिणमन का अर्थ है उसका कार्य होना, उसकी पर्याय बनना । किस रूप बन रहा है ? तो जिस रूप बन रहा है यह आत्मा, जो वर्त रहा है यह आत्मा वह वर्तन एक प्रकार का है, अवक्तव्य है, पर उसको समझाने के लिए भेद-व्यवहार से बताया जा रहा है कि वह भी देखता है, जानता है और पर से अलग रहता हुआ रमता रहता है । जो पदार्थ जैसा है उसको उस प्रकार जानना सम्यग्ज्ञान है, वस्तु सर्व स्वतंत्र हैं, सत् हैं, अपना-अपना अस्तित्व लिए हुए हैं और सभी वस्तुवें अपने आपमें अपना परिणमन करती चली जा रही हैं । भले ही जो परिणमन स्वभाव के प्रतिकूल परिणमन है वह निमित्त पाकर हो रहा और जो स्वभाव के अनुकूल परिणमन है वह स्वयं हो रहा, पर हो रहा है जीव में जीव के ही परिणमन से । तो ऐसे प्रत्येक पदार्थ को निहारना यह सब सम्यग्ज्ञान है ।

सम्यग्दर्शन दिग्दर्शन―सम्यग्दर्शन―दर्शन का दर्शन होना सम्यग्दर्शन है । आत्मा दर्शन गुण के परिणाम में कैसा वर्त रहा है, सो वर्तता हुआ भी यह नहीं समझ पाता कि मैं दर्शन में अपने को ग्रहण कर रहा हूँ । प्रत्येक जीव चाहे मोही हो, अज्ञानी हो, मिथ्यादृष्टि हो, वे सब अपने को ग्रहण किया करते हैं, यदि अपने को न देखे तो ज्ञान नहीं बन सकता, मगर समझ नहीं पाते कि मैंने अपने को देखा । आत्मा में जो ज्ञान और दर्शन दो गुण हैं सो ज्ञान द्वारा तो स्व-पर अर्थ को जानता रहता है और दर्शनगुण द्वारा क्या करता है सो व्यवहार से समझाने के लिए यह कहा जाता कि समस्त पदार्थों को देखता है, पर परमार्थत: वह अपने को देखता है किंतु जिसको देखा उसकी समझ बने कि मैंने अपने को देखा तो हुआ सम्यग्दर्शन और अपने को देखकर भी अपने को देखना न समझ पाया, न ग्रहण कर पाया तो हुआ मिथ्यादर्शन ।

दर्शन के विषय का दर्शन न कर पाने के कारण का दृष्टांतपूर्वक दिग्दर्शन―एक दृष्टांत लो कोई मनुष्य धनिक बनने के इरादे से यह सुनकर समुद्र के तट पर स्थित पहाड़ पर पहुंचा कि उसमें पारसपत्थर भी है, यदि एक पारसपत्थर हाथ लग जाये तो फिर वह लोहे से मनमाना स्वर्ण बनाकर धनिक बन सकता है ꠰ अब उस पर्वत पर पत्थर तो थे बहुत और पारस पत्थर कोई एक दो ही होंगे, तो कैसे पहिचान की जाये कि यह पारस है, तो उसने इस परिचय के लिए समुद्र के किनारे एक लोहे का डंडा गाढ़ा और पर्वत के सारे पत्थर इकट्ठे किये, और क्रम-क्रम से एक-एक पत्थर उठाना, लोहे पर मारना और देखना कि लोहा सोना बना या नहीं और फिर उसे समुद्र में फेंकना, यही प्रक्रिया उसकी लगातार चलती रही, पत्थर उठाना, मारना और फेंकना । अब समझ लो, जहाँ हजारों की संख्या में पत्थर थे वहाँ कितना श्रम करने की आवश्यकता थी । उस प्रकिया में उसकी तेज धुन बन गई उठाना, मारना और फेंकना । एक बार ऐसी भी स्थिति आयी कि पारस पत्थर भी हाथ लगा मगर उस तेज धुन के कारण उसे भी उठाया, मारा और फेंका । बाद में देखा कि लोहा तो सोना बन गया, पर पारस पत्थर समुद्र में फेंक दिया । अब वह माथा धुनता है, बड़ा गजब हो गया, पारस पत्थर हाथ लगा फिर भी व्यर्थ खो दिया । पर माथा धुनने से होता क्या, अब वह पुन: वापिस नहीं आ सकता याने ग्रहण करके भी फिर ग्रहण नहीं कर पाता, ठीक इसी प्रकार यह जीव इन बाह्य विषयों के जानने की धुन में समझता तो इसी तरह है कि मैंने अपने को छुवा और बाह्य पदार्थों को जाना, छुवा, हर एक छदमस्थ जीव में जानने की ऐसी कला है । जैसे कोई पुरुष था बालक, हाई जंप का खेल खेलता है, जिसे ऊंची कूद कहते हैं, दो खंभों में एक डोरी कोई तीन साढ़े तीन फिट की ऊंचाई पर बांध देते हैं और उस पर छलांग लगाते हैं, तो जो बालक जितना अधिक जमीन पर गड़कर छलांग लगाता है, वह उतनी ही अधिक ऊ̐ची कूद कूद जाता है । तो जैसे ऊ̐ची कूद के लिए जमीन पर गड़ना फिर उठना आवश्यक है ऐसे ही हम आपके लिए बाहरी पदार्थों को जानने के लिए अपने आपको छूना और फिर पदार्थों को जानना आवश्यक है । जैसे वह बालक जमीन पर क्यों गड़ता है ? एक कूदने की शक्ति पाने के लिए, ऐसे ही यह आत्मा अपने आपको क्यों छूता है ? बाहरी पदार्थों को जानने की शक्ति पाने के लिए । तो हम आपका जो कुछ भी ज्ञान चल रहा है हजारों पदार्थ जानने का सो प्रत्येक जानने में ऐसी स्थिति होती है कि जीव अपने में आये, जाने अपने में आये फिर जाने ऐसा ही प्रवर्तन चलता रहता है दर्शनोपयोग और ज्ञानोपयोग, मगर मोही जीव बाह्य विषयों की धुन में हैं, सो अपने पास आकर यह ग्रहण नहीं कर पाता कि मैं अपने पास आया और अपने स्वरूप को मैंने छुवा ।

विपरीत अभिप्राय के निरसन में सम्यग्दर्शन―जो इस दर्शन के विषय को ग्रहण कर लेता है उसे कहते हैं सम्यग्दर्शन, इसी की बाहरी मुद्रा में श्रद्धान, प्रत्यय, रुचि आदिक अनेक प्रकार से है, मगर सम्यग्दर्शन का विषय क्या है वास्तव में तो वह विषय इन शब्दों से सीधा नहीं जाना जाता । शुद्ध आत्मा की रुचि करना सम्यग्दर्शन है । पर यह तो बतलाओ कि रुचि करना यह चारित्र की परिणति है या सम्यक्त्व की परिणति है ? रुचि, प्रीति, अनुराग, भला लगना यह चारित्र की परिणति है, मगर यह सम्यक्त्व का फल है कि शुद्ध आत्मा की रुचि बनती है इस कारण उन शब्दों में कह रहे हैं । शुद्धआत्मा का प्रत्यय होना, प्रतीति होना सम्यग्दर्शन है । अब भला बतलाओ प्रत्यय और प्रतीति क्या सम्यक्त्व का विषय है या ज्ञान का विषय है ? ज्ञान का विषय है पर सम्यक्त्व जिसे हुआ है उसको शुद्ध आत्मा की प्रतीति रहती है, यह उसका परिणाम है । सम्यक्त्व का क्या विषय है ? दर्शन के विषय का दर्शन करना सम्यग्दर्शन है । अथवा कहो कि जैसे स्वच्छ भाव के होने पर अपना सारा प्रवर्तन ही बदल जाता है, स्वच्छ होता है, सन्मार्ग पर वृत्ति बनती है वह है सम्यग्दर्शन । मकान में कूड़ा बहुत पड़ा है, यह तो सीधा सबकी समझ में आ जायेगा और मकान स्वच्छ है इसे आप कैसे सीधा समझेंगे ? लोग कह तो देते कि यह बड़ा स्वच्छ है, पर इस स्वच्छता को उठाकर तो बताओ कि कैसी है वह स्वच्छता ? कूड़े को तो हाथ से उठाकर दिखा देंगे कि यह है कूड़ा मगर उस कूड़े के अभाव को कैसे बतायें ? तो ऐसे ही मिथ्यात्व के अभिप्रायों को तो हम बता सकेंगे, देह को अपना मानना, अपने को कषायोंरूप समझना, गृहीत मिथ्यात्वरूप जानना, पर सम्यक्त्व को हम किस तरह समझायें ? अरे ! जिसके होने पर ये मिथ्याभाव सब दूर हो गए उसे कहते हैं सम्यग्दर्शन । और इसी कारण पुरुषार्थसिद्धुपाय में सम्यग्दर्शन का संकेत किया है विपरीत अभिप्राय का निकल जाना । जहाँ विपरीत अभिप्राय निकल गया वह है सम्यग्दर्शन ।

विपरीत अभिप्राय की पैनी पहुंच पर आश्चर्य―विपरीत अभिप्रायों की कहां तक वार्ता कही जाये ? मुनि व्रत पालकर भी और बड़े कल्याणभाव से उसको निभाकर भी और यहाँ तक निभाकर कि कोई शत्रु कोल्हू में भी पेले तो भी उस शत्रु पर बदला लेने का भाव नहीं, उस पर रोष क्रोध का भाव नहीं । हाँं, यह विचार और चल रहा कि मैं मुनि हूँ, मुझे क्रोध न करना चाहिए, शत्रु मित्र मेरे लिए दोनों बराबर हैं । और ऐसी समता से रहूंगा तो मोक्ष पाऊंगा, ऐसा जानकर रहे, तिस पर भी विपरीत अभिप्राय रह सकता है, व्यामोह रह सकता है । वह ऐसा कौनसा भीतरी दोष है ? मोटेरूप में यह समझिये कि उसके देहदृष्टि है और इस नग्न रूप को समझ रहा कि मैं मुनि हूँ और मुनि के कर्तव्यों का अभ्यास भी किया था कि मुनि की शोभा, मुनि की सच्चाई इसमें है कि किसी पर क्रोध न करना । रागद्वेष न करना, सो वह कर्तव्य भी कर रहा मगर यह प्रेरणा मिल रही है इस पर्याय में मुनित्व के अभिप्राय से । तो सहज स्वभाव में स्वत्व का अनुभव नहीं है, यहाँ तक एक-एक भीतरी दोष रह सकता है ꠰ तो जहाँ सहज चैतन्यस्वभाव में यह मैं हूँ यह बुद्धि बनी, यह आशय बना तो उसे ही सम्यक्त्व कहो और जिसका यह आशय बना उसके लिए देह अब आत्मा न रहा और इस नाते से कोई अपमान कर रहा उसका विषाद नहीं, कोई सम्मान कर रहा उसका हर्ष नहीं । यह श्रमण तो भावश्रमण है । पर ऊपर के ऐसे ही काम करके भी यह मैं मुनि हूँ, मुनि को ऐसा न करना चाहिए, इस नाते से वृत्ति चल रही है सो व्यामोह हो गया ꠰ जैसी बात मुनि की है ऐसी ही श्रावक की बात है । सम्यग्दृष्टि श्रावक अपने आपमें मैं श्रावक हूँ,ऐसा श्रद्धान नहीं रखता । श्रावक होकर भी मैं श्रावक हूँ,यह प्रतीति नहीं है, मैं चैतन्यमात्र हूँ यह उसकी प्रतीति में है ꠰ ऐसा यह श्रावक भी मैं ऐसा पुजारी हूँ, मैं ऐसा भक्त हूँ, मैं धर्मात्मा हूँ, मैं इतने काम सम्हालता हूँ, ऐसा एक देह को आलंबन लेकर और धर्म के नाम पर कुछ भी प्रतीति करता रहे तो उसके भी व्यामोह है ।

चारित्र की पुण्यपापपरिहाररूपता―चारित्र पुण्यपाप का परिहार है । यद्यपि ज्ञानी के भी प्रमाददशा में कुछ व्रतादि प्रवर्तन चलते हैं परिस्थिति में ऐसा ही करना होता, यह बात तो चलेगी पर मैं यह हूँ ऐसी श्रद्धा में मोक्षमार्ग न चलेगा । जो जरा-जरा सी घटना में शोक होता, क्रोध होता, तड़क-भड़क हो जाती ये बातें क्यों हुआ करती हैं क्योंकि उसको देह में आस्था है, यह मैं हूँ, सो लोग देह को देख रहे हैं, मैं भी दूसरी जगह देह को ही देख रहा हूँ, सो देह देह का ही नाता चल रहा है तो वहाँ तो कल-कल होगा । कल ही नाम देह का है, एक कल, दो कल, अनेक कल, उनके बीच में होने वाला प्रवर्तन, यह सब कल-कल है और जहाँ आत्मा के सहजस्वरूप में यह मैं हूँ, ऐसा अपनी बुद्धि में उतारेगा और ऐसा ही ज्ञान बनाये रहने में अपना हित समझेगा और ऐसा ही पौरुष करेगा उसके लिए बाहरी बातों में हर्ष-विषाद न चलेगा । चारित्र सम्यक्त्वपूर्वक होता है तो सम्यक्त्व वह गुण है कि जिससे ऐसी मौलिक स्वच्छता प्रकट होती है कि अब जो भी वृत्ति बनेगी तो उसका मोक्षमार्ग में विरोध न बनेगा, बल्कि सहयोग होगा । चारित्र है पुण्य-पाप भाव का परिहार रमने का नाम चारित्र है । जो प्राणी विषयकषायों के उपयोग में रम रहा है उसके मिथ्याचारित्र है और जो पुरुष अपने इस सहज स्वभाव के उपयोग में रम रहा है उसके है सम्यक्चारित्र । तो ज्ञान, श्रद्धान और चारित्र ये तीन रत्नत्रय कहलाते हैं ।


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