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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 38

From जैनकोष



तच्चरुई सम्मत्तं तच्चग्गहणं न हवइ सण्णाणं ।

चारित्तं परिहारो पयंपियं जिणवरिंदेहि ꠰꠰38꠰।

तत्त्वरुचि की सभ्यग्दर्शनरूपता―अब इस गाथा में दूसरी प्रकार से सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र का लक्षण कहा गया है ꠰ तत्त्वरुचि होना सम्यग्दर्शन है । सहजात्मस्वरूप का लक्ष्य करना यही हित है, यही उपाय है, यही मेरा स्वरूप है, यही रहना चाहिए, यह ही वास्तविकता है, ऐसी रुचिपूर्वक उस ओर उपयोग बनाये तो जो उसकी रुचि है उसे कहते हैं सम्यग्दर्शन । जैसे कहते हैं कि ‘‘सर्प डसा तब जानिये, रुचि से नीम चबाय । मोह डसा तब जानिये विषयकषाय सुहाय, अथवा कहो जिनवाणी न सुहाय ।’’ तो विषयकषाय उसको सुहाते हैं जो मोह से ग्रस्त है । उन विषयकषायों में ही उसकी रुचि रहती, उन विषयकषायों के अर्थ, विषय साधनों के अर्थ अपना परिश्रम किया करता है उसे तत्त्वरुचि नहीं सुहाती । और जिसको तत्त्व की रुचि बन गई उसे फिर अन्य बात नहीं सुहाती । परिस्थिति है, कुछ करना पड़ता है मगर सुहाता नहीं है । जैसे कोई रोगी पुरुष दवा खाता है पर उसको उस दवा के प्रति ऐसी रुचि नहीं है कि मैं इसे खाता रहूं । बल्कि वह दवा इसलिए खाता है कि हमारा दवा खाना छूट जाये, तो ऐसे ही ज्ञानी जीव जिन परिस्थितियों से गुजरता है उन परिस्थितियों में उसकी रुचि नहीं है, पर ये परिस्थितियां हमारी टल जायें इसके लिए उन परिस्थितियों से गुजरकर आगे चलता है । तत्त्व क्या है ? शुद्ध आत्मस्वरूप ꠰ मैं सत् हूँ तो मात्र सत्त्व के नाते मेरे में जो चित्स्वरूप, स्वयं जो स्वरूप है, जिसकी शुद्ध ज्ञप्ति-तरंगें चलती हैं, केवल सहज शुद्ध चैतन्यमात्र स्वरूप, जो है भूतार्थ अर्थात् स्वयं सहज होने वाला अर्थ, बस यह ही मेरी परिणति रहे, यही मेरा रहे, अन्य कुछ है ही नहीं, तो अन्य का लगाव, अन्य का लपेट उसको रुचिकर नहीं होता । जैसे कैदी को सिपाही के भय से चक्की पीसनी पड़ती है मगर उसे चक्की पीसने की रुचि नहीं है, ऐसी भी परिस्थितियां होती हैं कि उस शुद्ध अंतस्तत्त्व की रुचि है और गुजर रहे हैं अन्य किसी प्रकार ।

तत्त्वग्रहण की सम्यग्ज्ञानरूपता―तत्त्व का ग्रहण सम्यग्ज्ञान है । जब कभी कोई प्रश्न सामने आता है कि बताओ ज्ञानी के कर्मबंध अधिक होता या अज्ञानी के ? तो प्राय: करके लोग ऐसा बोल दिया करते हैं कि जो जान रहा और जानकर भी गल्ती कर रहा उसके ज्यादह पाप लगते और जो जान ही नहीं रहा, जिसको कुछ समझ ही नहीं वह यदि गल्ती करे तो उसको कम पाप लगता, मगर ऐसी बात नहीं है । वास्तविकता यह है कि यदि वह वास्तव में जान रहा है और परिस्थितिवश किसी अविरत भाव में प्रवृत्ति भी करे तो भी कर्मबंध कम है और जो नहीं जान रहा तो न जानने के कारण ही कर्मबंध चल रहा, अन्य द्रव्यों की तो बात ही क्या करें । लोग यह परिस्थिति क्यों बताते हैं कि जो जान रहा है उसके कर्म अधिक बंधेंगे क्योंकि वह जानकर कर रहा और जो नहीं जान रहा उसके क्यों बंधेगा पाप ? तो यह परिस्थिति रूढ़ि इस कारण हुई है कि एक साधारणतया बोल देने को या थोड़ा बहुत समझ लेने को लोगों ने ज्ञान कह रखा है पर ज्ञान नाम इसका नहीं है । ज्ञान नाम उसका है कि जैसे जान लिया कि यह सांप है, तो अब कोई सांप को छुवेगा नहीं, उस पर कोई पैर न धरेगा । भाई ! जानबूझकर अगर बहुत सी बातें कर ली जाती हैं तो फिर जानबूझकर सांप पर पैर क्यों नहीं रख देते ? तो जैसे जानबूझकर सांप पर पैर कोई नहीं रखता इसी तरह वास्तव में जो जान लेवे अपना स्वरूप और अविकार स्वरूप तो वह विकार में नहीं लग सकता । एक तत्त्व-रुचिपूर्वक तत्त्व के ग्रहण करने का नाम सम्यग्ज्ञान है ।

विकारपरिहार की सम्यक्चारित्ररूपता―विकारभाव का परिहार करना यह सम्यक᳭चारित्र है । सारी कला अपने आपके भीतर स्वभाव और विकार के निर्णय की है । इसी को आत्मा और स्वभाव इन शब्दों से कहा गया है, मैं स्वभावरूप हूँ, विकाररूप नहीं हूँ । मैं जैसा सहज हूँ वैसा ही रहूंगा ऐसा जिसका पूर्ण निर्णय है, भीतरी स्वभाव में उसको विकार नहीं दिखते । स्वभावदृष्टि में उसको स्वभाव का ही ग्रहण है उपयोग में, भले ही उस समय भी आस्रव बंध चल रहा है, इस सराग अवस्था तक, इस अवस्था तक पर उपयोग में नहीं है उसका राग । जैसे कोई पुरुष किसी कार्य से जल्दी घर से बाहर जाये और दरवाजा छोटा होने से उसके सिर में लग जाये तो भी जिस काम की धुन में गया है उसके कारण चोट का पता नहीं रहता, ऐसे ही चोट लगने पर भी इस ज्ञानी को चोट का पता नहीं किंतु उस तत्त्वरुचि में ही इसका उपयोग लगता है ।


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