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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 69

From जैनकोष



परमाणुपमाणं वा परदव्वे रदि हवेदि मोहादो ।

सो मूढो अण्णाणी आदसहावस्स विवरीओ ।꠰69꠰।

परद्रव्य में परमाणुप्रमाण भी मोहवश रति होने से मिथ्यात्वग्रस्तता―परमाणु परिमाण भी याने अत्यंत थोड़ा भी परद्रव्यों में प्रेम हुआ मोहवश तो वह जीव अज्ञानी है और आत्मस्वभाव से उल्टा चल दिया । कोई पुरुष यदि ऐसा सोचे कि मुझे संसार की किसी भी चीज में राग नहीं है, सिर्फ एक हम को स्त्री में राग है, तो मेरा बहुत-सा मिथ्यात्व हट गया, थोड़ा-सा रह गया होगा, पर ऐसा नहीं है । जिसका एक वस्तु में राग है उसके मिथ्यात्व और अधिक दृढ़ है । आप संसार के सब जीवों में राग बढ़ा लीजिए तो आपका मिथ्यात्व हल्का हो जायेगा, और अन्य सबसे उपेक्षा करके केवल एक जीव में आप राग बढ़ा लें तो आपका मिथ्यात्व दृढ़ हो गया । एक में हो या 10 में हो, जहाँ भेदविज्ञान नहीं है, आत्मदृष्टि की भावना नहीं है वहाँ मिथ्यात्व ही है । तो योगीजनों ने निर्ग्रंथ दिगंबर भेष धारण किया, पर उनके परमाणुमात्र भी किसी वस्तु में राग हो, सेवक में हो, साथी में हो, भक्त में हो, किसी एक भी बात में राग हो या विषय में राग हो तो वहाँ मुनिपना नहीं रहता । फिर जिसका जीवन बड़ा आकुलित रहता है व्यवस्था में, विहार में, इतने साधन चाहिए, साथ में मोटर चाहिए, साथ में दो-एक रसोई वाले चल रहे हैं, सारा परिकर चल रहा है, उसमें चित्त बन रहा है, तो कितना अंतर है । यहाँ तो कह रहे कि परमाणुमात्र भी राग है तो वह अज्ञानी है । इतना विशेष अगर परिग्रह रखा है तो उसका कहना क्या?

विषयलोभी अज्ञानी पुरुषों की स्वच्छंदता―एक कथानक है ऐसा कि एक राजा के पास एक पुरोहित रहता था, वह रोज शास्त्र पढ़कर राजा को सुनाता था । पुरोहित समझदार था, लोक व्यवहार में चतुर था, सो जैसे राजा खुश हो उस तरह से कथा पड़ता था ꠰ एक दिन पुरोहित को जाना था कहीं बाहर तो उसने अपने लड़कों को भेज दिया कि जावो इस समय तुम राजा को शास्त्र सुना आना । गया वह तो उस दिन यह प्रकरण निकला कि जो रत्तीभर भी मांस खाये सो नरक जावे । याने मांस खाना इतना बड़ा दोष है कि यदि थोड़ा भी खाये तो नरक जाये । अब राजा तो खाता था बहुत मांस सो उसे पुरोहित के पुत्र की बात खटकी और सोचा कि आज बड़ा बेवकूफ आया शास्त्र सुनाने । रोज-रोज शास्त्र तो अच्छा होता था, आज यह उल्टा बोल रहा, गाली दे रहा ꠰ सो दूसरे दिन जब वह पुरोहित आया शास्त्र पढ़ने तो सबसे पहले यह कहा पुरोहित ने कि महाराज कल हमने अपने लड़के को शास्त्र पढ़ने भेजा था, वह शास्त्र पढ़ गया था न? तो राजा बोला―हां, आया तो था मगर बड़ा बेवकूफ है वह तो । वह शास्त्र पढ़ना ही नहीं जानता । क्यों महाराज? अरे ! वह तो यह कहता था कि रत्तीभर भी कोई मांस खाये तो नरक जाये, तो पुरोहित बोला―हां, महाराज ! उसने बिल्कुल ठीक कहा कि जो रत्तीभर भी मांस खाये वह नरक जाये पर यह तो नहीं कहा कि जो बहुत-सा मांस खाये वह नरक जाये । तुम तो बहुत-सा खाते, तुम्हारी तो उसने कुछ बात ही नहीं कही । तो राजा उस पुरोहित की बात सुनकर बड़ा खुश हुआ और बोला―हां तुम ठीक कहते हो । अब कोई ऐसा ही अर्थ लगाने लगे कि शास्त्र में तो यह लिखा कि जो परमाणुमात्र भी परिग्रह रखे सो साधु नहीं, मगर ज्यादह रखे, बैलगाड़ी, मोटर, रसोई, अन्य अनेक आरंभ परिग्रह, इनका तो निषेध नहीं किया । अरे ! जहाँ परमाणुमात्र भी राग को योगी के लिए निषेध बताया वहाँ अन्य की तो कथा ही क्या? तो जो अज्ञानवश रंच भी राग करता है वह आत्मस्वभाव से पतित है, और अज्ञानी है ।

कल्याणार्थ अपना कर्तव्य―अपन सबको भी श्रद्धा में यह बात रखना चाहिए कि यदि परमाणुमात्र भी परमाणुमात्र में यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मुझको सुखदायी है, ऐसी श्रद्धा यदि होगी तो वह मिथ्यात्व है । श्रद्धापूर्ण सही होना चाहिए । परिस्थितिवश कुछ भी करना पड़ रहा है उसे कर्म का वेग मानें और उसमें पछतावा बनायें । अगर श्रद्धा पूर्ण सही रखें तो वह वास्तव में श्रावक है ꠰ एक परमाणु भी मेरा कुछ नहीं है, मेरा तो मात्र मैं आत्मा हूँ, ज्ञानदर्शन-स्वरूप हूँ, स्वभावत: आनंदमय हूँ, ज्ञान से भरा हुआ हूँ, परिपूर्ण सत्तावान हूँ, और परिणमता रहता हूँ । अब इस मुझको कुछ करने की जरूरत नहीं है, वस्तु है, परिणमती रहती है । बस तत्त्व के ज्ञातादृष्टा रहे जावो, बाह्य पदार्थों में मैं कुछ कर ही नहीं सकता हूँ इसलिए उसमें कुछ कर डालने की कमर नहीं कसना है । मैं सर्व पदार्थों से निराला अपने स्वभावमात्र, ऐसी अपने स्वरूप की श्रद्धा रखना ꠰ जो सही श्रद्धा रखेगा वह संसार से पार हो गया, और जिसकी श्रद्धा में ही भूल है वह कितना ही धर्म के नाम पर कितने ही पूजा, व्रत, विधान, तपश्चरण आदिक करता जाये वह संसार से पार नहीं हो सकता ꠰ क्योंकि जिसको संसार से पार होना है उसका ही सही ज्ञान नहीं है और संसार से पार होने का अर्थ क्या है? उसका भी ज्ञान नहीं है तो अपने आपका भी ज्ञान कैसे होगा कि यह मैं समस्त अन्य पदार्थों से अत्यंत निराला अपने स्वरूप में तन्मय ज्ञानमय पदार्थ हूँ । जिसको आत्मा का परिचय नहीं वह मोक्षमार्ग में एक कदम भी नहीं डाल सकता ।


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