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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 70

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अप्पा झायंताण दंसणसुद्धीण दिढचरित्ताणं ।

होदि धुवं णिव्वाणं विसऐसु विरत्तचित्ताणं ꠰꠰70।।

दर्शनविशुद्ध आत्मध्यानियों की निर्वाणपात्रता―जो आत्मा का ध्यान करते हैं, जिनका सम्यग्दर्शन अत्यंत विशुद्ध है, जिनका चारित्र दृढ़ है, जिनका चारित्र विषयों से विरक्त है उन पुरुषों का निर्वाण निश्चित रूप से होता है ꠰ आत्मा का ध्यान-ज्ञान वह ही पुरुष करेगा जिसको कम-से-कम इतना तो परिचय हो कि जगत् का जितना भी समागम है यह सब समागम मेरे लिए असार है, दुःख का कारण है, यह सदा रहता नहीं है, इनका होना न होना, इनका परिणमना मेरे सोचने से नहीं होता । यहाँ मेरे को कुछ शरण नहीं है, ऐसा जो इन बाहरी समागमों को अनित्य अशरण और असार समझे उनको ही यह जिज्ञासा होगी कि नित्य क्या है, शरण क्या है और सार क्या है । मेरे लिए नित्य मेरा यह आत्मस्वरूप है जो कभी मेरे से अलग न होगा, कभी मिटेगा नहीं, अनादि से चला आया, अनंतकाल तक रहेगा ꠰ मेरे लिए शरण मेरा यह आत्मस्वरूप है । जब मेरे इसको ही अपना सर्वस्व समझे, इस ही में संतुष्ट रहे तो मेरे को कोई संकट नहीं रहता, शरण है तो मेरा स्वरूप और सार है तो मेरा स्वरूप । जो अपने आत्मस्वरूप के परिचय में ज्यादह बढ़ेगा, आत्मस्वरूप के ध्यान में चलेगा वह पुरुष निर्मल सम्यग्दर्शन का धारण करने वाला है । कोई भी पदार्थ अब इस ज्ञानी को बहका नहीं सकता । चाहे कितने ही सुंदर, कितने ही इष्ट पदार्थ मिलें, पर ज्ञानी यह श्रद्धा नहीं ला सकता कि यह पदार्थ मेरा हित कर देंगे । उनका सम्यग्दर्शन अत्यंत दृढ़ रहता है ।

दृढचारित्र विषयविरक्त मुनिजनों को निर्वाण का लाभ―अपने स्वरूप को जाने और जानकर उस ही स्वरूप के ज्ञान में स्थिर रहें इसे कहते हैं चारित्र । हाथ पैर चलाने का नाम चारित्र नहीं, किंतु आत्मा का स्वरूप जानकर उस ही स्वरूप में ज्ञान को बनाये रहना इसका नाम चारित्र है, पर इस चारित्र के लिए जो पुरुष पुरुषार्थ करता है आंतरिक उसको पूर्वकृत कर्म के उदयवश अनेक बाधायें आती हैं तो वे बाधायें क्या? परवस्तुवों के ख्याल उनके विषय में कुछ भी सोचना, जब ये विघ्न सामने आते हैं तो उन विघ्नों को तत्काल दूर करने के लिए ये व्रत, तप, नियम, संयम, दर्शन आदिक हैं, सो इन्हें करता है, पर किसलिए कि मेरा आंतरिक चारित्र निर्मल बने । तो जो पुरुष दृढ़ चारित्रवान हैं और जिन योगियों का चित्त विषयों से विरक्त है, विषय क्या है? विपत्तियां । जो लोग विषयों में प्रीति करते हैं, विषयों का उपभोग करते हैं, सभी विषय हैं रस, गंध, रूप देखना, शब्द सुनना, नामवरी चाहना आदि, इन विषयों को जो भोगता है सो वह भोगना क्या है? जैसे शरीर में फोड़ा हो जाये तो उस फोड़ की मलहम पट्टी लोग करते हैं ऐसे ही मूढ़ लोग विषय की वेदना नहीं सही जाती है तो उसका उपयोग करते हैं । तो बताओ विषयों के उपभोग में शांति है या विषयों की वेदना ही न जगे उसमें शांति है? बताओ फोड़ा-फुंसी के मलहम पट्टी करने में सुख है या फोड़ा-फुंसी पैदा ही न हो इसमें सुख शांति है? जैसे यहाँ उत्तर यह होगा कि फोड़ा-फुंसी का न बनना, वह आराम की चीज है ऐसे ही यहाँ उत्तर है कि विषयों की वासना ही न बने वह आराम की चीज है । विषय-वासना बनाना और उसका उपभोग करना ये दोनों ही बुरी बातें हैं । तो जो पुरुष आत्मा का ध्यान करते हैं, जिनका सम्यग्दर्शन शुद्ध है, जिनका चारित्र दृढ़ है, जिनका चित्त विषयों से विरक्त है उनका निर्वाण होता है, यह बिल्कुल निश्चित बात है । तो इन बातों का हम आपको आदर करना चाहिए । भीतरी आत्मा की उपासना में जितना समय गुजरे उतना समय लगाना चाहिए । इसके प्रताप से यह दुर्लभ मानव जीवन पाना, यह जैनशासन की शरण पाना, जिनवाणी का श्रवण करना आदि सार्थक हो जायेगा ।


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  • मोक्षपाहुड
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