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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 9-25

From जैनकोष



वाचनापृच्छनानुप्रेक्षाम्नायधर्मोपदेश: ।। 9-25 ।।

वाचना पृच्छना नामक स्वाध्याय तपों का वर्णन―इस सूत्र में स्वाध्याय के 5 भेद बताये । गये है―(1)वाचना, (2) पृच्छना, (3) अनुप्रेक्षा, (4) आम्नाय और (5) धर्मोपदेश । (1) वाचना का अर्थ है निर्दोष ग्रंथ का बांच देना और उसके अर्थ का प्रतिपादन करना, या सिर्फ ग्रंथ बांचना, या अर्थ बताना, यह सब वाचना कहलाता है । निर्दोष ग्रंथ को बांचे तब ही बांचना स्वाध्याय है । अन्य अटपट ऊल जलूल पुस्तक बांचने को स्वाध्याय नहीं कहा । निर्दोष ग्रंथों का प्रतिपादन तत्वार्थ को जानने वाले पुरुष करते हैं, सो यह बांचना स्वाध्याय निरपेक्ष भाव से हो तो स्वाध्याय है । जहाँ किसी प्रकार की अपेक्षा नहीं है । केवल एक आत्मदृष्टि खुद को बने, दूसरे को बने, यह ही मात्र भावना होती है स्वाध्याय में । तो ग्रंथों का अर्थ बांचना, प्रतिपादन करना बांचना नाम का स्वाध्याय है । (2) पृच्छना―किसी विषय में अपने को संशय हो गया हों―अमुक प्रसंग का, शब्द का, वाक्य का क्या अर्थ है? तो उस संशय के निवारण करने के लिए ग्रंथ का, अर्थ का या दोनों का पूछना पृच्छना स्वाध्याय है । पृच्छना स्वाध्याय करने वाला संत आत्मोन्नति के भाव को ही करता है । लोक में मेरी उन्नति समझी जाये या लोग जानें कि यह बहुत ऊँचा है, इस भाव से पृच्छना स्वाध्याय नहीं होता, और जो लोग केवल अपने भविष्य की उन्नति बताने के लिये, लोक में अपनी श्रेष्ठता जाहिर करने के लिये यदि कोई बात पूछता है तो वह स्वाध्याय नहीं कहलाता । पृच्छना स्वाध्याय करने वाला पुरुष दूसरे को शर्मिंदा करने के ख्याल से नहीं करता । यदि कोई इस भाव से पूछे कि मैं कोई ऐसी बात पूछूँ कि वक्ता से भी उसका उत्तर देते न बने और उसे शर्मिंदा होना पड़े तो यह आशय उसका बहुत गलत है और वह स्वाध्याय से बहुत दूर है । भव्य जीव दूसरे का उपहास करने के लिए, दिल्लगी करने के लिए प्रश्न नहीं करता अथवा इससे संघर्ष करूँ, विवाद करूँ, कलह करूँ, इस भाव से भी स्वाध्याय नहीं किया जाता । ऐसे भाव से स्वाध्याय किया जाने से वह पाप का बंध करता है । हाँ यदि कोई संदेह होता है तो उसका निराकरण करने के लिये पूछा जाता है अथवा उस विषय संबंध में कुछ निर्णय कर रखा हो और मेरा निर्णय सही हो, पुष्ट हो, मेरे निर्णय में मजबूती आये । इस भाव से पूछना सो पृच्छना स्वाध्याय है ।

अनुप्रेक्षा, आम्नाय व धर्मोपदेश नाम से स्वाध्याय तपों का निर्देशन―(3) अनुप्रेक्षा स्वाध्याय―पदार्थ का स्वरूप जानकर बार-बार इस तरह से विचारना, मनन करना कि मैं अपने चित्त में तद्रूप बन जाऊँ, ऐसी भावना को अनुप्रेक्षा स्वाध्याय कहते हैं । जैसे आत्मा के स्वरूप का मनन किया तो जैसे जाना कि मैं चैतन्यमात्र हूँ, विकार से रहित हूँ । स्वरूपत: मैं जैसा सहज हूँ, सो हूँ । इस तरह की दृष्टि बनाते हुए इन वचनों के आधार से अपने आपको ढालना यह है अनुप्रेक्षा स्वाध्याय । (4) आम्नाय स्वाध्याय―रोज का पाठ फेरना, जैसे भक्तामर स्तोत्र का पाठ करना यह सब आम्नाय नाम का स्वाध्याय है । जो आचरण में पारगामी है, व्रत पालन करने वाला है वह किसी लौकिक फल की इच्छा नहीं रखता और एक विनयपूर्वक पाठ को फेरता है, स्तवन आदिक करता है तो यह उसका आम्नाय नामक स्वाध्याय है । पाठ का फेरना न तो बहुत जल्दी-जल्दी हो और न बहुत धीरे-धीरे । किंतु ऐसी रफ्तार में हो कि जिससे शब्दों का अर्थ भलीभाँति अपनी समझ में और दूसरों की समझ में आता जाये । तो पाठ पढ़ने के ये सब दोष हैं―जल्दी-जल्दी पढ़ना, अव्यक्त पढ़ना, धीरे-धीरे पढ़ना, मन ही मन गुनगुनाना आदि । ऐसे दोषों से रहित होकर पाठ स्तवन का फेरना आम्नाय नामक स्वाध्याय है । (5) धर्मोपदेश स्वाध्याय―धर्म संबंधी कथा करना, तत्त्व का प्रकाशन करना धर्मोपदेश स्वाध्याय है । प्रत्येक स्वाध्याय में स्व का अध्ययन मुख्य है । सो धर्म कथा करता हुआ साधु भी बोलते समय अपने आत्मा की दृष्टि रखा करता है । धर्मोपदेश करने वाला महापुरुष लौकिक ख्याति या किसी वस्तु का लाभ, आशा कुछ भी फल को नहीं चाहता । वह तो उन्मार्ग (कुमार्ग) की निवृति के लिए धर्मोपदेश करता है । लोक वस्तु स्वरूप से विरुद्ध तत्त्व को न पकड़े और यथार्थ तत्त्व को जानें अथवा उनको किसी प्रकरण में संदेह हो गया हो तो उनका संदेह दूर हो अथवा अपूर्ण तथ्यभूत पदार्थ का प्रशासन हो, लोग समझें, इसके लिए धर्मकथा हुआ करती है । ऐसे प्रयोजन के लिये स्वाध्याय करना कल्याणार्थी जनों का मुख्य कर्तव्य है ।

स्वाध्याय तप करने के प्रयोजन―स्वाध्याय तप करने के प्रयोजन क्या हैं? उन प्रयोजनों में कुछ इस प्रकार हैं―(1) स्वाध्याय करने से बुद्धि का अतिशय बढ़ता है क्योंकि स्वाध्याय में ज्ञान का ही तो लाभ होता है और उससे बुद्धि विशिष्ट हो जाती है । (2) दूसरा लाभ है शुभसंकल्प । अच्छे काम के लिए चित्त में दृढता आ जाती है । जब प्रथमानुयोग का स्वाध्याय है तो महापुरुषों के चारित्र सुनकर उसके अनुसार चलने की मन में भावना होती है । करणानुयोग का स्वाध्याय हुआ तो लोक और काल का जब परिचय होता है तब संसार भ्रमण का भय हो जाता है और उस समय उसके शुभ विचार हो जाते है । चरणानुयोग में शील व व्रत का वर्णन सुनकर स्वयं में व्रत, शीलादिक की भावना जग जाती है । द्रव्यानुयोग में जब प्रत्येक वस्तु का पृथक-पृथक अस्तित्त्व जाना जाता है तब बाह्य पदार्थों में क्या करना, ऐसी बुद्धि जगने से उसका अच्छे काम के लिए ही भाव बनता है । (3) तीसरा प्रयोजन है ज्ञान की स्थिति, ज्ञान ठहरा रहता है । कोई कितना ही सीखा हो, यदि स्वाध्याय बंद कर दे तो कुछ काल बाद वह सीखा हुआ भी विस्मृत हो जाता है । (4) चौथा प्रयोजन है संशयविनाश । जब स्वाध्याय करते हैं और बीच-बीच में कोई संशय होता है तो स्वाध्याय करने से वह संशय स्वयं दूर हो जाता है । (5) 5वां प्रयोजन है स्वाध्याय का कि परवादियों में शंका नष्ट हो जाती है याने दूसरे सिद्धांत से लेकर यदि कोई शंका हुई हो तो वह दूर हो जाती है । (6) छठा प्रयोजन है कि स्वाध्याय करने से परम संवेग होता है । धर्म में अनुराग बढ़ता है, संसार, शरीर और भोगों से वैराग्य बढ़ता है । (7) स्वाध्याय का 7वाँ प्रयोजन है कि तपश्चरण में वृद्धि होती है इच्छा निरोध होना । (8) 8वां प्रयोजन है कि यदि कोई अतिचार लगता हो तो उनकी मौलिक शुद्धि हो जाना आदिक अनेक प्रकार के प्रयोजन स्वाध्याय से सिद्ध होते है । इस कारण स्वाध्याय करना परम आवश्यक है । अब व्युत्सर्ग नामक तप के भेद कहते हैं ।


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