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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 9-26

From जैनकोष



बाह्याभ्यंतरोपध्यो: ।। 9--26 ।।

भेदकथनपूर्वक व्युत्सर्ग नामक तप का प्रतिपादन―बाह्य और अंतरंग उपाधि का त्याग होना व्युत्सर्ग है । उपाधि का अर्थ है अन्य पदार्थ जो उसके ही कोई विकार का आश्रयभूत बनता हो उपाधि शब्द का शब्दार्थ है यह कि................ जो पदार्थ अन्य में बलाधान के लिए ग्रहण किया जाता है उसे उपाधि कहते हैं । बलाधान का अर्थ है विकार होने में निमित्त होना । सो जो उपाधि से दूर हैं मायने आत्मा के प्रदेशों स अलग हैं । आत्मा के साथ एकत्व को प्राप्त नहीं हुए हैं उनका त्याग करना बाह्योपाधिव्युत्सर्ग है । अंतरंग उपाधि के कितने भाव हैं? क्रोध, मान, माया, लोभ, मिथ्यात्व हास्यादिक जो आत्मा में अंतरंग दोष होते हैं उनकी निवृत्ति हो जाना यह है आभ्यंतरोपाधिव्युत्सर्ग । शरीर से भी ममता त्याग दे तो वह भी अंतरंग व्युत्सर्ग है । शरीर से ममता तो छूटी हुई ही है, तब ही तो मुनि हुआ है, पर शरीर का राग भी न होना, ख्याल भी न होना, परिचय न होना । इस प्रकार नियत काल तक इस प्रकार का उत्सर्ग होना अंतरंग उत्सर्ग है ओर यावज्जीव ममत्व मेटना आभ्यंतरोपाधिव्युत्सर्ग है ।

व्युत्सर्ग तप के प्रतिपादन की सार्थकता―यहाँ कोई शंकाकार कहता है कि जब महाव्रत का उपदेश दिया वहां परिग्रह त्याग नाम का व्रत बताया गया है । सो परिग्रह त्याग नाम के महाव्रत में ही यह उत्सर्ग तप आ गया, इसको अलग से क्यों कहा जा रहा? समाधान―परिग्रहत्याग महाव्रत में जो परिग्रह की निवृत्ति बताया है उसका अर्थ है कि सोना, चाँदी, वस्त्राभूषण आदि न रखना चाहिए । ये सब बाह्य उपाधियाँ हैं । इनका त्याग होना चाहिये, और अंतरंग में जो क्रोधादिक आते हैं उनका त्याग होना चाहिये । शंका―ये अंतरंग त्याग तो 10 प्रकार के धर्मों में आ ही गये । उत्तम त्याग नाम का धर्म है तब उसमें सब त्याग आ ही गया । तो व्युत्सर्ग का प्रकरण अलग से करना ठीक नहीं है । समाधान―10 प्रकार के धर्मों में जो त्याग बताया है वह प्रासुक निर्वेद्य आहार आदिक की निवृत्ति वाला त्याग है । अथवा दान करना भी त्याग है । यहाँ जो अपने संपर्क में कुछ भी पर पदार्थ हैं उनके ममत्व का त्याग है । शंका―जों प्रायश्चित के भेद बताए गए है उन भेदों में भी व्युत्सर्ग―शब्द आया है, तो उस व्युत्सर्ग से ही त्याग की बात सिद्ध हो जाती है फिर यह व्युत्सर्ग नाम का तप अगल से क्यों बताया गया है? समाधान―प्रायश्चित के भेदों में जो व्युत्सर्ग प्रायश्चित बताया है सो वह अतिचार को शुद्ध करने के लिए बताया है । वे निरंतर किये जाने के लिए नहीं है और व्युत्सर्ग तप सदैव किये जायें इस प्रयोग वाले तप हैं, अर्थात प्रायश्चित में व्युत्सर्ग तो प्रतिद्वंदी है । उस व्युत्सर्ग का प्रतिद्वंदी अतिचार है । अतिचार को शुद्धि के लिए व्युत्सर्ग तप है, प्रायश्चित है, किंतु यहाँ पर जो व्युत्सर्ग तप कहा है वह अपेक्षा नहीं रख रहा किंतु ममत्व का त्याग करना यह ही उद्देश्य है । शंका―तब फिर यही व्युत्सर्ग ठीक है, फिर जगह-जगह व्युत्सर्ग क्यों दिये गए? प्रायश्चित में व्युत्सर्ग न वर्ते इन भेदों में से ही सारी बात सिद्ध हो जाती है । व्युत्सर्ग शब्द देने का अर्थ यह है कि ये तप शक्ति अनुसार किए जाते हैं, कही दोषसहित भी व्युत्सर्ग चलते हैं कहीं निर्दोष वक्ता चलते हैं । कभी अवधि देकर नियत काल तक व्युत्सर्ग चलते हैं । कहीं यावज्जीव चलते हैं । तो यह व्युत्सर्ग पुरुष की शक्ति की अपेक्षा से बताया गया है इस कारण पुनरुक्ति का दोष नहीं है दूसरी बात यह है कि उत्तरोत्तर गुणों की महिमा बढ़ाने और निर्विकल्प होने में उत्साह बने इस प्रयोजन के करण पुनरुक्ति का दोष नहीं आता ।

व्युत्सर्ग तप के प्रयोजन―अब व्युत्सर्ग तप किन प्रयोजनों से किये जाते हैं उन प्रयोजनों को बतलाते हैं । व्युत्सर्ग तप करने से निस्संगता प्रकट होती है । कोई संग कोई वस्तु दूसरा साथी नहीं रहता । व्युत्सर्ग तप तपने से निर्भयता उत्पन्न होती है । भय हुआ करता है उन जीवों को जो बाह्य पदार्थों का संग्रह रखते हैं, उनमें आशा रखते हैं, पर जो बाह्य पदार्थों का त्याग करते हैं, उनकी आशा का परिहार करते उन जीवों को भय किस बात पर? व्युत्सर्ग तप करने से जीने की आशा का भी परिहार हो जाता है । मनुष्यों में जीने की आशा प्राय: रहा करती है और इस आशा के कारण पद-पद पर व्याकुल होना पड़ता है, किंतु व्युत्सर्ग तप करने वाले में जीने की आशा संबंधी विकल्प नहीं रहता, वह तो जानता कि मैं जो हूँ सो हूँ, इस कारण अंतरंग में वह अनाकुल रहता है । व्युत्सर्ग तप करने से दोषों का विनाश होता है । कोई व्रत आदिक में दोष हुआ हो तो वे दोष भी दूर हो जाते हैं, अथवा जो कुछ दोष शेष रह गए हैं रागद्वेषादिक वे भी समाप्त हो जाते हैं व्युत्सर्ग तप करने से मोक्षमार्ग की भावना मजबूत बनती है । उसको एक उत्साह बनता है कि मैं इन सब उपाधियों से रहित होकर केवल चैतन्यमात्र रहूँ । इस प्रकार अन्य भी उसके प्रयोजन हैं । उसके लिए ये व्युत्सर्ग तप किये जाते हैं जो कि नाना प्रकार के अभी बताये हैं । अब जैसे कि पहले बताया गया था 2 वें सूत्र में कि ध्यान नामक तप से पहले के भेद कहे जा रहे हैं, सो उन भेदों का वर्णन तो पूर्ण हो चुका, अब ध्यान का कथन किया जाना चाहिए । उसके विषय में सूत्र कहते हैं ।


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