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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 26

From जैनकोष



नित्यमविकारसुस्थितसर्वांगमपूर्वसहजलावण्यम् ।

अक्षोभमिव समुद्रं जिनेंद्ररूपं परं जयति ।।26।।

262―जिनेंद्ररूप की सुंदरता―जिनेंद्र भगवान का उत्कृष्ट रूप क्षोभरहित समुद्र की तरह गंभीर है । देखो जहाँ क्रोध नहीं रहा, मान नहीं रहा, माया नहीं है, लोभ नहीं है उसका चेहरा, उसकी मुद्रा क्षोभरहित गंभीर होती है । जहाँ कि हवा नहीं चल रही, तरंग नहीं उठ रही, वहाँ एक समुद्र अपने आप गहरा गंभीर है इस तरह की मुद्रा जिनेंद्र भगवान के रूप में झलक रही है । बतलाओ सुंदर कौन? पुरुष हो, स्त्री हो, सुंदर किसे कहेंगे? लोक में तो उसे ही सुंदर कहते ना जिसका रूप गौर हो या जैसा कुछ माना हो, वह सुंदर है तो जो गौर वर्ण वाला यदि क्रोधी है, गाली बकने वाला है और जिस चाहे को दुःख उत्पन्न करने वाला है, दगा देने वाला है उसकी शकल सुंदर लगेगी क्या? खूब व्यवहार से देख लो, और जिस समय कोई क्रोध कर रहा हो उस समय कोई कैमरे से उसकी फोटो ले ले तो फिर देख लो उसकी कितनी भद्दी फोटो आती है पर अक्सर करके होता ऐसा है कि जब कोई कैमरा लेकर क्रोधी का फोटो उतारने आता तो वह अपने क्रोध को शांत कर लेता है, क्योंकि ज्ञान साथ चल रहा है, वह इतना तो जानता है कि अगर ऐसे क्रोध की मुद्रा में फोटो उतर जायेगी तो हमारा बड़ा अपमान होगा, गंदी शकल रहेगी । तो चलो यह भी अच्छा है कि कैमरे से फोटो लेते समय उस क्रोधी पर कुछ असर तो पड़ता । तो जब कोई क्रोध कर रहा हो तो वहाँ सुंदरता रहती क्या? नहीं रहती । ऐसे ही जब कोई मान कर रहा हो तो उसके भी नाक भौंह ऊपर चढ़े हुए होते हैं, वह दूसरों को तुच्छ देखता है तो वहाँ भी कुछ सुंदरता रहती है क्या? नहीं रहती । मायाचारी करनेवाले की मुद्रा तो बहुत ही बिगड़ जाती है, उसको अंदर से बड़ा भय और कड़ा शल्य बन जाता है । लोभ कषाय वाले को देख लो वहाँ भी सुंदरता नहीं रहती । और कोई स्त्री हो या पुरुष, श्याम वर्ण का है, किंतु मंदकषाय है, परोपकारी है तो वह मनोज्ञ लगता । काला वर्ण तो भगवान के भी बताया गया, नेमिनाथ भगवान और पार्श्वनाथ भगवान को श्यामवर्ण कहा गया उनके स्तवन में उन्हें साँवरिया कहते हैं । और पार्श्वनाथ हो तो लोग राधेश्याम कह सकते हैं । तो राधेश्याम का अर्थ क्या? राधा मायने सिद्धि, सिद्धि अर्थ में राधा कहा है । समयसार में जहाँ अपराध शब्द की व्याख्या किया है वहाँ बताया है कि जिस भाव में राधा न रहे वह भाव अपराध है । जब तक राधा रहे तब तक जीव अपराधी नहीं । राधा मायने स्वानुभूति, राधा मायने आत्मसिद्धि । ऐसी जो राधा की सिद्धि है ऐसे श्याम । यों अनेक तरह से उसका वर्णन किया तो सुंदरता वहाँ जची कि नहीं? लोग कहते हैं छवि बड़ी ठीक है रूप जरूर काला है मगर छवि बहुत अच्छी है, उस छवि का अर्थ क्या है? शांत है, क्रोध नहीं आता, घमंड न हो, लोभ न हो, ऐसा मुख बड़ा अच्छा लगता, तो सुंदरता किसमें हुई? कषाय न करने में सुंदरता आयी । चमड़ी से सुंदरता नहीं आती । देह में सुंदरता की जो झलक है वह कषाय न होने से झलक है, तो भगवान तो वीतराग हैं, अकषाय हैं । जहाँ कोई कषाय नहीं तो उनका रूप इतना परम गंभीर है कि क्षोभरहित समुद्र की तरह गंभीर है ।

263―जिनेंद्ररूप की अविकार सुस्थितता―भगवान का शरीर और कैसा है? अविकार होने की वजह से सारे अंग सुस्थित है । अभी जिसके अंदर क्रोध हो उसके हाथ मुख ये भी चलते हैं, हिलते हैं, कभी-कभी तो इतना क्रोध आ जाता कि बोला भी नहीं जाता और क्रोध में कोई बोले तो उसका बोल साफ न निकलने से समझ में भी नहीं आता । जैसे घर का कोई बड़ा व्यक्ति बच्चों को देखकर जोर से नाराज होकर चिल्लाता है तो उसके मुख से साफ-साफ शब्द निकलते तो नहीं, और वे छोटे-छोटे बच्चे भी उसका कुछ अर्थ समझ पाते नहीं । चलो यह भी अच्छा है जो समझते नहीं, किंतु वे यह तो समझ लेते कि वास्तव में पापाजी ने अपने नाम को सार्थक किया है । क्योंकि एक तो पाप और एक पापा । पाप से पापा बड़ा है, जैसे कलसिया से कलसा बड़ा हुआ । यदि वे बच्चे उस अस्पष्ट बोली को समझते होते तो वे भी जान जाते कि पापाजी ने वास्तव में अपने नाम को सार्थक किया । देखो तेज गुस्सा आने पर बोल साफ नहीं निकलता । तो जहाँ कषाय है वहाँ सुंदरता नहीं । उसके अंग में सुस्थितता नहीं । तो भगवान अविकार हैं, राग द्वेष रहित हैं, अतएव उनके सर्वांगों में सुस्थितता है, और उनकी मुद्रा देखो, उनकी प्रतिमा ही तो बनाते हैं, पैर स्वस्थ, शरीर सही, आँख, नाक, कान आदि सर्वांगों में सुस्थितता आयी है, वह किसका प्रभाव है? वह प्रभाव है निर्विकारता का । एक बार हम गुरुजी से बात कर रहे थे, बात चली ब्रह्मचर्य के विषय में, तो वहाँ गुरुजी ने कहा कि यह ब्रह्मचर्यव्रत बहुत ऊँचा है और बड़ा कठिन है । फिर गुरुजी बोले कि भाई यह ब्रह्मचर्य व्रत तो हम से भी ठीक-ठीक नहीं चल रहा । हमने कहा कैसे ठीक-ठीक नहीं चल रहा? तो उन्होंने कहा कि देखो कोई स्त्री दर्शन करने आयी तो उस समय हमारे नेत्र नीचे होने लगते हैं, भगवान के नेत्र तो नहीं किसी को देखकर लज्जा से नीचे होते । तो किसी स्त्री को देखकर आँख उसकी ओर से हटाकर नीचे कर लेना यह भी तो कुछ दोष की बात है । आँखें सीधी जैसी थी वैसी क्यों न रही, ये नेत्र उस स्त्री की ओर से हटकर पृथ्वी की ओर क्यों गए? देखिये 18 हजार दोषों में इसे भी एक दोष बताया है, तो उनका कहना है कि इस प्रवृत्ति में भी ब्रह्मचर्य की कमी सिद्ध होती है याने निवृत्ति का तो कोई रूप रख रहा हो और उसकी ऐसी प्रवृत्ति बने तो वह भी एक ब्रह्मचर्य में कमी है । देखिये―गुरुजी का यह एक कितना गंभीर उत्तर था । तो जब किसी भी प्रकार की कषाय नहीं रहती, अविकार हो गए, निर्विकार हो गए तो सर्वांग उनके सुस्थित हैं । यह प्रभु के शरीर का स्तवन चल रहा है ।

264―जिनेंद्ररूप का सहज लावण्य―और कैसे है वे प्रभु । अपूर्व सहज सुंदरता जहाँ प्रकट है । अच्छा एक बात और परख लो, जरा खुद भी जान जाये, स्वानुभव के समय जब आत्मदृष्टि हो रही, स्वानुभूति हो रही, आत्मा की ओर ध्यान जग रहा उस समय मुख के ऊपर आई मंद स्मित मुद्रा विलक्षण प्रकार के आनंद को दर्शाती है, एक अत्यंत मंद अपूर्व मुस्कान होती, आत्मीय आनंद का एकरूप प्रकट मुख पर आ जाता है स्वानुभूति के समय आत्मध्यान के समय उस प्रकार के आनंद की मुद्रा अन्य किसी बात में तो हो नहीं सकती । यह तो पुद्गल की ही बात हम कह रहे । जो मुद्रा इस मुझमें, इस स्वस्थिति में है, आत्मानुभव के समय जो बात बनती है वह मुद्रा आपके किसी भी वैषयिक सुख में नहीं बनती, उसकी मुद्रा ही अलग है । तो भला जो कषाय रहित पुरुष हैं उनके तो निरंतर आत्मानुभव है । हम लोग तो कभी-कभी कर पाते, पर भगवान तो अनंतकाल के लिए अनंत आनंदरस में लीन है । तो वहाँ अपूर्व सहज सुंदरता है ऐसे जिनेंद्र देव जो उत्कृष्ट रूपवान, क्षोभरहित समुद्र की तरह हैं वे जयवंत हैं । प्रभु मन को हरने वाले हैं, ऐसी भगवान की स्तुति की ।

265―शरीरस्तवन से प्रभुस्तवन न होने का कारण―देखो शरीर की स्तुति करने से प्रभुस्तुति नहीं होती यद्यपि उस शरीर के अधिष्ठाता तीर्थंकर देव हैं, एकक्षेत्रावगाह हैं, कुछ संबंध भी है, नहीं तो केवलज्ञान हो जाने पर शरीर में अतिशय क्यों हो जाता केवलज्ञान से पहले ही 12वें गुणस्थान में निगोद जीवों का नष्ट होना शुरू हो जाता है । 12वें से 13वें में आ गए, अरहंत बन गए तो वे 12वें में निगोद हैं अभी । वहाँ निगोद कैसे समाप्त होता? तो उसका सब करणानुयोग में वर्णन किया गया । जैसे कषायों के नाश करने के लिए स्पर्धक बताये गए, कब कैसा होता है । यहाँ पर भी कोई जीव मरा तो अपनी आयु से मरता है, वहाँ तो एक श्वांस में आठ दस बार मरण होता है । नया निगोद जन्मता नहीं, पुराने मर जाते, सो इस तरह से 12वें गुणस्थान के अंत में उनका देह निगोदरहित हुआ कि केवलज्ञान हुआ । आत्मध्यान में अतिशय तो है कि शरीर भी प्रभावित हो गया, भगवान बन गए । कोई शरीर भी भगवान बनने से पहले वृद्ध था, पर भगवान होने पर जवान शरीर रहता है । वह बालक तीर्थंकर है तो क्या, वहाँ एक समान शरीर मिलता है । तो शरीर का अधिष्ठाता यद्यपि जीव है तो भी शरीर के वर्णन करने पर भगवान का वर्णन क्यों नहीं होता कि जो बात कह रहे हो कि सारे अंग सुस्थित है पूर्ण सुंदरता आ गई तो यह देह ही तो है, आत्मा तो नहीं है इसलिए यह भगवान का वर्णन नहीं हुआ । भगवान का वर्णन तो भगवान के गुणों का वर्णन करने से ही होगा ।


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