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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 27

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एकत्वं व्यवहारतो न तु पुन: कायात्मनोर्निश्चयात्

नु: स्तोत्रं व्यवहारतोऽस्ति वपुषः स्तुत्या न तत्तत्त्वत: ।

स्तोत्रं निश्चयतश्चितो भवति चित्स्तुत्यैव सैवं भवेत्

नातस्तीर्थकरस्तवोत्तरबलादेकत्वमात्मांगयो: ।27।।

266―शरीर और आत्मा का वास्तव में एकत्व न होने से देहस्तवन से प्रभुस्तवन की असंभवता―इस प्रकरण में यह समझाया जा रहा था कि देह निराला है, जीव निराला है, और इससे भी और गहरी बात कही जा रही थी कि जीव में जो विकार जगते हैं उपाधिसान्निध्य पाकर, उनसे आत्मतत्त्व न्यारा है, और इससे भी गहरी बात चल रही थी कि विचार तरंग ये न्यारे हैं, आत्मस्वरूप न्यारा है । चला खूब प्रकरण, लेकिन बीच में एक जिज्ञासु ने टोक भी दिया महाराज अभी कुछ ठीक-ठीक समझ में नहीं आया । हमको तो यह दिख रहा है कि शरीर है सो ही भगवान है! शरीर है सो ही आत्मा है । यदि ऐसा न हो तो फिर ये स्तुतियाँ कैसे ठीक रहती? फिर तो मिथ्या हो जाती । यों कहना कि दो भगवान हरे रंग के हैं, दो तीर्थंकर नील वर्ण के हैं, अमुक ऐसे हैं, शरीर की बड़ी कांति है, दिव्यध्वनि बड़ी अमृतमयी है, इस तरह की जो स्तुतियाँ है वे यह सिद्ध करती हैं कि देह है सो ही भगवान है । इसका उत्तर दिया गया है संक्षेप में कि यह जानें कि देह स्तुति से तो व्यवहारनय से स्तवन होता है । देह की स्तुति करने से भगवान का निश्चय से स्तवन नहीं होता । आत्मा के गुणों का स्तवन किया जाये तब ही केवली भगवान की स्तुति कहलाती है । इसी बात को एक निष्कर्ष और उपसंहार रूप से कहते हैं कि शरीर और आत्मा का व्यवहार से तो एकत्व है, किंतु निश्चय से नहीं, यह अखंड पदार्थ है आत्मा अपने में परिपूर्ण । अब देखो―तब ही तो इस प्रकरण में उपाय सोचा है तो क्या यह बंधन जो वर्तमान में है यह क्या झूठा है? झूठ तो नहीं, आज हाँं तो रहा सब, ही स्वरूप जरूर दोनों का अलग-अलग है । जैसे एक हाथ ने दूसरे हाथ को जकड़ लिया, मरोड़ दिया, पकड़ लिया तो यह परतंत्रता और यह बंधन क्या झूठा है? झूठा तो नहीं है, लेकिन स्वरूप देखो―इस हाथ का इसी हाथ में स्वरूप है, दूसरे हाथ का उसी हाथ में स्वरूप है तो स्वरूपदृष्टि से तो यह न्यारा है, पर वर्तमान परिस्थिति संयोगरूप चल रही है, वह तो है । बस दो द्रव्यों को देखकर उनकी बात बताना सो तो व्यवहार कथन है और, एक द्रव्य को ही देखकर एक ही द्रव्य में जो एक की बात है सो कहना निश्चय कथन है । तो इसी प्रकार व्यवहार दृष्टि से तो यह स्तवन बन गया । वहाँ शरीर और आत्मा एक दिखते हैं यह बात व्यवहार दृष्टि से तो हुई और इसी कारण व्यवहारदृष्टि से, देह के स्तवन से आत्मा का स्तवन बन गया, लेकिन निश्चयदृष्टि से आत्मा की स्तुति से ही आत्मा का स्तवन कहलायेगा । चैतन्यस्वरूप के स्तवन से ही चित्स्वरूप आत्मा की स्तुति कहलायेगी ।

267―प्रभु के निश्चय स्तवन में इंद्रिय विजय की स्तुति के प्रसंग में स्पर्शन, रसना, घ्राण इंद्रिय के विषय की समालोचना―निश्चय स्तुति कैसे करना चाहिए? तो प्रभु की कुछ पहले की साधना बोलकर फिर आत्मा की बात कहकर पहले की साधना कुछ बीच में भी बोलें, कुछ अंत में भी बोलें―पर एक आत्मा की ही बात कहें तो वह निश्चय से स्तुति कहलाती है । हे प्रभो आपने इंद्रियों को जीता । जब मोक्षमार्ग में बढ़े प्रभु तो उनका पहला कदम था इंद्रियों को जीतना । यह इंद्रियों का प्रेम, इन इंद्रियों का मोह संसार में भगवान आत्मा को बरबाद कर रहा है और मिलना कुछ नहीं है । मान लो आज इंद्रिय प्रेम किया, उनके मोह में आकर विषय साधनों में खूब रम गए, समय तो गुजर जायेगा, मरण अवश्य होगा । आखिर अंत में मिलेगी उससे खराबी ही, लाभ कुछ न मिलेगा । हाँ इंद्रियों के प्रत्येक विषय की यह ही बात है―स्पर्शन इंद्रिय के विषयभोग संभोग से इस मनुष्य को लाभ क्या मिलेगा? सब जानते हैं कि पछतावा ही मिलता है अंत में । समय बीत गया, जवानी बीत गई, बुढ़ापा आ गया, विषयों का संस्कार लगा है तो दिल तो उस संस्कार में बस गया और बुढ़ापा आने पर बड़े कमजोर हो गए हैं, चलते नहीं बनता है । कोई ढंग बनता नहीं है, लो यह आपत्ति आ गई । एक भोग की बात या खाने पीने की बात ले लो । जब चाहे जो चाहे बहुत-बहुत बार खाने पीने से कहीं स्वास्थ्य नहीं बनता, बल्कि उससे अनेक प्रकार की बीमारियाँ बन जाती हैं । खाने में अधिक आसक्ति होने से बीमारी मिट नहीं सकती । मान लो यहाँ खाने खाने में ही खूब आसक्त रहे और यहाँ से मरकर हो गए हाथी, झोंटा वगैरह तो बस खा लो वहाँ खूब, कर्म वहाँ खूब खाने पीने की सुविधा दे देंगे । मानो कर्म कहते हैं कि ऐ बच्चू तुम खाने पीने में खूब आसक्ति रखते थे ना तो लो तुम्हें खाने पीने की खूब सुविधा दी जाती है, खा लो दो एक क्विन्टल । अरे यहाँ खाने पीने में जो अधिक आसक्ति रखे उसको ये कर्म भव-भव में खाने-पीने की बाधा बढ़ा करके बड़ी बुरी तरह से तड़फायेंगे । मानों यहाँ से मरकर पेड़ बन गए तो अब जड़ों से मिट्टी खा रहे, कैसे-कैसे औंधे होकर उल्टे से खा रहे, किस तरह की उनकी दशा बन जाती है, यहाँ जो खाने-खाने में अधिक आसक्त हैं आखिर उनको अंत में पछतावा ही हाथ आयेगा । अब गंध की बात देखिये इस गंध-गंध में ही खुश रहना बहुत बेकार बात है । इससे कहीं स्वास्थ्य कुछ बनता नहीं, बल्कि बिगड़ता है । जो लोग नाक में, कान में, कपड़ों में जगह-जगह सुगंधित इत्र फुलेल लगाकर सुगंध ही सुगंध में बस रहे हैं उनको आप स्वस्थ न पायेंगे, क्योंकि उसमें भी स्वास्थ में बाधा देने वाले अनेक तरह के कीटाणु होते हैं । जो बड़ी सुगंध में रहते हैं उनके देखा होगा कहीं खाना नहीं पचता, कहीं कोई रोग बना रहता, तो सुगंधि के प्रति आसक्ति होना, यह कोई भली बात नहीं, और फिर जिन्हें ज्ञान से रुचि है उनको सुगंध दुर्गंध क्या? इस दुर्गंध की बात अधिक प्रकरण में न लें मगर इतना तो जान लें कि बहुत-बहुत थूका थूकी करना, ग्लानि करना अच्छी बात नहीं । हाँं जान लिया, ऐसा पदार्थ है, ठीक है ! अच्छा जो गंध में यहाँ अधिक आसक्त है उसको कहो ऐसे पाप का बंध हो जाये कि अगले भव में नाक ही न मिले । फिर वहाँ कैसे गंध ले लेंगे ।

262―शेष इंद्रियों के विषय की समालोचनापूर्वक प्रभु के इंद्रियविजय की स्तुति करते हुए प्रभु के निश्चय स्तवन का एक वर्णन―अब चक्षुरिंद्रिय की बात देखो वर्तमान में लोग खूब सिनेमा देख रहे, बड़े सलोने रूप देख देखकर उनमें दिवाने बन रहे, पर उससे फायदा क्या? सिनेमा देखने गये तो वहाँ दो तीन घंटे आँखें फैला फैलाकर देखा, आंखों को भी कष्ट दिया, पैसा बिगड़ा, समय बरबाद किया, दिन में सोये तो वह दिन भी खराब किया, अपना मन भी खराब किया, फायदा क्या मिला? और आजकल तो जो नई उम्र के लोग हैं उनका मन अधिकतर इस सिनेमा से बिगड़ा है । आज जो चाकू चलते, छुरे चलते, चोरी बदमाशी करते, दूसरों को धोका देते, ये सब आदतें कहाँ से आ गई? इन सिनेमाओं के कारण । यद्यपि सिनेमा में कुछ थोड़ीसी शिक्षा की बात भी मिल जाती, कुछ ज्ञान और वैराग्य भी जगता, मगर जैसे किसी विष के घड़े में अमृत की एक दो बूंद मिली हों तो उससे क्या लाभ? उसके पीने से तो मरण ही होता है, ऐसे ही उन सारी गंदी-गंदी बातों के बीच थोड़ी भली बात भी आ गई तो उसका कोई भला असर नहीं पड़ता । इस जीव में लगे हैं विषयों के संस्कार, सो उनकी प्रवृत्ति विषयों की ओर ही लग जाती है । अब कर्णेंद्रिय की बात देखो―लोग बड़े राग रागिनी के शब्द सुनकर अपने चित्त को प्रसन्न करना चाहते । बड़े-बड़े राग रागिनी के शब्द बोलने वाले जो अभिनेता होते हैं वैसा खुद बनने के लिए मन ही मन शेख चिल्ली की भांति बड़े पोलावा बनाया करते हैं हमको भी ऐसा बनना है ऐसी बात चित्त में बसाये रहते हैं । अरे ये राग रागिनी के शब्द कुछ लाभ न देंगे, इनसे इस जीव का अहित ही होगा । अरे इन राग रागिनी के शब्द सुनकर अपने में प्रसन्नता तो जाहिर न करो । अपने में प्रसन्नता लाओ प्रभु का गुणगान सुनकर, प्रभु के प्रति भक्तिभाव प्रकट कर । देखो प्रभु का सेवक कौन? प्रभु जिस मार्ग से चले उस मार्ग में चलने के लिए जो उमंग रखे वह है प्रभु का सच्चा सेवक । प्रभु का स्तवन यह है कि हे प्रभु जैसे आपने इन इंद्रियों पर विजय प्राप्त किया, भगवत्ता प्राप्त की वैसा ही हमें करना चाहिए ।

269―इंद्रियविजय के लिये द्रव्येंद्रियों के व्यामोह के परिहार की आवश्यकता―इंद्रियविजय के उद्यम की बात सभी के लिए लाभदायक है । चाहे कोई ज्ञानी हो तो, अज्ञानी हो तो । जो जिस योग्य है उसको वैसा लाभ मिलेगा । ज्ञानी को तो सारा ही लाभ है मोक्षमार्ग का । मगर कोई इस तरह की शिक्षा न ले कि अरे क्या फायदा खाने पीने की छोड़ छाड़ करने से, क्या फायदा व्रत उपवास तप त्याग आदि से, ये तो सब शारीरिक क्रियायें हैं, आत्मा की नहीं । अरे इस तरह की शिक्षा ले लेने से तो स्वच्छंदता आ जायेगी, लाभ की चीज न मिल पायेगी । अपना उत्साह जगे तत्त्वज्ञान की प्राप्ति के लिए । इन विषय कषायों पर विजय प्राप्त करने के लिए और इन पंचेंद्रियों को जीतने के लिए बस ये तीन काम करने हैं―एक तो द्रव्येंद्रियविजय, दूसरी, भावेंद्रिविजय, तीसरा प्रसंगविजय । देखो विषयसेवन की विधि शरीर में रहने वाली । जो इंद्रियाँ है कान, आँख वगैरह एक तो इनका उपयोग होता है, इनका काम होता है, ये काम में आ रहे ना? ये व्यापार कर रहे ना, और दूसरी बात विषय कषाय के साधनों का प्रसंग । जिस वस्तु को भोगते हैं उस वस्तु का भी संबंध है भोग कार्य में और तीसरी बात―भीतर में जो भी ज्ञान चल रहा उस भोगने का, उस इंद्रिय का तो वह भी एक काम है । ये तीन बातें हैं बाधक जो इन तीनों को हम मिटा सकें, इनको हम निर्बल कर सके, इन तीनों की उपेक्षा कर सकें, इन तीनों को महत्त्व न दे सकें, इन तीनों से निराला जो ज्ञानस्वरूप है उसका महत्त्व जाना तो हम इंद्रिय का विजय असली मायने में कर सकते हैं । यों तो कोई बच्चा दस लक्षण में मानो चौदस का उपवास ठान ले दूसरों की देखादेखी । अब जब दो बज गए, तीन बज गए, खैर किसी तरह से दिन काट लिया । रात को जब भूख लगी तो वह रोने लगा और फिर जो मन में आया सो खाया पिया । सो इस तरह जबरदस्ती का व्यवहार तो ठीक नहीं । ज्ञानपूर्वक जो बात चलती है उसका महत्त्व है । यह जानें कि मैं ज्ञानमात्र हूँ, ये इंद्रियाँ क्या? ये तो पौद्गलिक हैं । इन योग प्रसंगों में ये जो तीन काम बन रहे हैं, सो इंद्रियाँ ये जड़ हैं, अचेतन हैं, पौद्गलिक हैं, इनमें मैं मोह करूं तो इससे तो मेरी बरबादी है । जब जीव का एक भव छूटता है तो अलंकार में एक कवि का सम्वाद है कि यह जीव कहता है शरीर से कि मेरे प्यारे मित्र, मैं अब यहाँ से जा रहा हूँ, तू भी मेरे साथ चल । तू तो मेरा बड़ा मित्र है, तो वह देह मानो कुछ आनाकानी करता हुआ जवाब देता है कि अरे मैं तेरे साथ कहाँ जाऊँगा? तो फिर जीव कहता है―देख मैने तेरे लिए रात दिन कितना-कितना श्रम किया, तुझे खूब तेल साबुन से नहलाया धुलाया, तौलिया से पोंछा, खूब मन चाहा खिलाया, पिलाया, अच्छे-अच्छे साज शृंगार कराये, रात दिन तुझ पर ही मैं आसक्त रहा, तुझे खूब सिनेमा दिखाया, सुंदर-सुंदर रूप दिखाया, तू जब कभी बीमार हुआ तो मैं तेरे पीछे बड़ा दुःखी हुआ, मैंने तेरी उस समय बड़ी सेवा की, जिंदगी भर मैंने तेरी चाकरी की, तुझे बड़े आराम से रखा, फिर भी कहता है कि मैं तेरे साथ नहीं जाऊँगा । यह जीव बड़ी हद करने लगा तो शरीर ने फिर एक ही बात में दो टूक जवाब दिया कि अरे बावले, तू ज्ञानवाला होकर भी पागल बन रहा है । तुझे कुछ पता भी है? मेरी तो यह रीति है सबके साथ कि मैं किसी के भी साथ न जाऊँ? तू अपना धर्म छोड़ता है तो छोड़, पर मैं अपना धर्म नहीं छोड़ सकता । शरीर का धर्म यही है कि मरण होने पर किसी के साथ न जाना । फिर शरीर मानो बोला―अरे मैं तो बड़े-बड़े तीर्थंकर जैसे महापुरुषों के साथ भी नहीं गया, मोक्ष जाने वालों के साथ भी नहीं गया, भले ही कपूर की तरह अलग-अलग मैं बन गया पर मैंने यह जिद्द कभी नही छोड़ी । हमेशा मेरी यह जिद्द रही, फिर मैं तुझ जैसे मूर्ख के साथ कहाँ जा सकता । तू हट जा मेरे पास से । तो ये इंद्रियां पौद्गलिक हैं, अचेतन हैं, इनका व्यामोह तू छोड़ दे ये दूसरी चीज है तू दूसरी चीज है । तो जीव बोला―कैसे छोड़ें इनका व्यामोह? अरे तू यह जान कि मैं चेतन हूँ, ये अचेतन हैं । जहाँ विरुद्ध बात समझ में आयी वहाँ फिर मित्रता नहीं रहती । दोस्ती खतम कर दी इस ज्ञान ने यह निर्णय करके कि मैं चेतन हूँ ये अचेतन, इनसे भिड़कर मैं क्या करूंगा? विरुद्ध के व्यामोह में बरबादी ही बरबादी ।

270―इंद्रिय विजय के अर्थ प्रसंगव्यामोह व भावेंद्रियव्यामोह के परिहार की आवश्यकता व मोहक्षय का कथन करते हुए प्रभु के निश्चयस्तवन का उपसंहार―अब दूसरा बाधक प्रसंग देखिये―ये बाहरी पदार्थ हैं, इनको देखकर प्रीति होती है, आसक्ति होती है, मोह होता है । ये तो बाहरी पदार्थ हैं, सत्ता में पड़े हैं । देखो ये पदार्थ हैं, इनका नाम क्या क्या है? संग, परिग्रह । तू अपने को विचार कि मैं असंग हूँ, मैं तो इनसे बहुत दूर हूं, इनका तो अत्यंत अभाव है मेरे में । मेरा क्या है? इन बाह्य पदार्थों में असंग अपने आत्मतत्त्व को विचारें । और भीतर में जो ज्ञान चलता रहता, अच्छा है, बुरा है इत्यादि ज्ञान का विकल्प है, इसको कैसे निरखें? ये तो बड़े प्राण खा रहे भीतर में, और देखो―अपनी बात सम्हालो । तुम ज्ञानस्वरूप हो, मगर ऐसे जो टुकड़े-टुकड़े ज्ञान चल रहा, खंड-खंड ज्ञान का चक्र चल रहा, कभी रूप जाना, कभी रस जाना....ऐसा तो जीव का खंड स्वभाव नहीं है । तू तो अखंड ज्ञानस्वरूप है, अलौकिक लोक प्रतिबिंब है । भीतर में देख तो एक जगमग स्वरूप, वह है तेरा स्वरूप । तू खंड-खंड क्यों हो रहा? प्रभु ने ऐसी ही भावना से, ऐसी ही उपासना से इंद्रियों को जीता, यह कौनसी हुई स्तुति? यह निश्चय से स्तुति हुई । इंद्रियों को जीता और जीतकर फिर इस मोह को जीत डाला, इंद्रिय पर विजय प्राप्त हुई, तो मोह को जीता, मोह पर विजय प्राप्त हुई तो वह बिल्कुल खतम हो गया । हे प्रभु यह उपाय किया है आपने जिससे कि आप इतने महान हो गए । वही उपाय मेरा भी बने, ऐसी जो भक्ति करे वह भगवान का सच्चा भक्त है । बात यथार्थ यह ही है चाहे जब हो सके कर लो ।

271―मोह की वेदना में मोहियों के मोह करने के इलाज की सूझ―अहो प्राणियो में कैसा मोह छाया है ? मोह से दु:खी होते और मोह को ही पसंद किये जाते । कभी किसी का किसी से मनमोटाव हो गया फिर भी वहीं चिपट रहेगी, घिसस पिसल भी चलती रहेगी, ऐसा कोई नहीं सोचता कि जब मन नहीं मिलता तो मैं मोह को बिलकुल मिटा दूं । मगर कैसे सुमति जगे यह ज्ञान की लड़ाई थोड़े ही चल रही है, वह तो अज्ञान की लड़ाई है, और गुजारा भी कैसे हो रहा, लड़ रहे फिर उनमें रह रहे, अनेकों बातें होती फिर भी वहीं रह रहे । तो मोह-मोह से ही जब दुःख हो रहा फिर भी मोह करते जाते । सारे क्लेश, सारी आपत्तियां इस मोह से ही हो रहीं, लेकिन उस विपत्ति को दूर करने का उपाय है मोह को मिटाना । जिस मोह से दुःख होता उसी मोह को करके ही दुःख मिटाना चाहते तो बताओ इस मोहजन्य दुःख को मिटाने का कोई तरीका बन सकेगा क्या? नहीं बन सकता । जैसे कोई वेश्यागामी हो, परस्त्रीगामी हो और आसक्त हो गया, व्यसनी हो गया तो भले ही उसे वेश्या बार-बार ठुकराये फिर भी वह उसी वेश्या के द्वार पर ही जाकर, द्वार खटखटाता है―खोलो खोलो ।....कौन ?....मैं नहीं खुलता । परस्त्रीगामी के लिए भी नाना विपत्तियाँ खड़ी रहती हैं, उसका दिल चलता है, अमुक चीज लाये, यह लाये, वह लाये, सब सेवा करें, फिर भी वह परस्त्री रूठ जावे तो उसे मनावें । जिसको परस्त्री का व्यसन लग गया, उसकी धुन उसी ओर लगी रहती । उसको अनेक प्रकार की आपत्तियाँ भी आती रहती हैं फिर भी वह उसी में लगा रहता अपने दिल को शांति देने के लिए उसी को भोग रहा जुआ खेलने में क्या है? उससे तो बड़ी आपत्तियाँ हैं, निर्धन भी हो गए, गिरफ्तार भी हो गए, पीटा मारी भी किसी ने की, चोरी भी करने लगे, मांस भक्षण भी करने लगे, मदिरापान भी करने लगे, शरीर खराब हो गया, मगर दिल को चैन कब मिलती, जब जुआ खेल लें । झूठा मौज, जिस जुआ से आपत्ति आयी, विडंबना आयी उसको यह ही उपाय सूझता है । हर एक व्यसन में यही बात है । लोग बीड़ी सिगरेट पीते हैं तो उसी से यद्यपि पेट दर्द करता है क्योंकि कुछ न कुछ धुआं तो पेट के अंदर पहुंच ही जाता है मगर उस पेट दर्द को ठीक करने के लिए बीड़ी सिगरेट पीना ही उसकी दवा समझते हैं । भला बताओ जिस चीज से पेट दर्द होता उसी चीज से उसे ठीक करना चाहते तो यह बात कैसे हो सकती है? हर एक व्यसन की यही बात है । मदिरापान करने वालों की बात देखो जो लोग मदिरापान करते हैं उनकी क्या दशा हो जाती है । कहीं बेहोश होकर नाली में गिर जाते, कुत्ते उनके मुख पर मूतते या दसों लोग उन पर जूते बरसाते, यों हैरान भी होते रहते, फिर भी कहते कि और लाओ शराब । जिस शराब के कारण पिट रहे दुःखी हो रहे उसी में चैन मान रहे । इस मदिरा की तरह ही तो यह मोह है । कहा भी तो है “मोह महामद पियो अनादि”, याने इस जीव ने मोहरूपी मदिरा का पान अनादिकाल से कर रखा है । उसी मोह के कारण यह सदा दुःखी रहा और उसी मोह को करके समझ रहा कि इससे हमें शांति मिलेगी ।

272―मोहविजय, मोहक्षय करके अनंत ज्ञानानंद प्राप्त करने का सुझाव―यह मोह ही इस जीव का प्रधान दुश्मन है तभी तो कहते हैं―अरिरजरहस विहीन, अरि मायने मोहनीय कर्म, रज मायने ज्ञानावरण, दर्शनावरण और रहस माने अंतराय इन चारों प्रकार के कर्मों से रहित है प्रभु । मोह को हे प्रभु आपने जीता और जैसे ही मोह पर विजय प्राप्त हुआ, मोह नष्ट हुआ वैसे ही आपके ज्ञान का इतना विकास हुआ कि तीनों लोकालोक सब आपके ज्ञान में आ गए । भैया, यह ही चाहते हो ना, कि हम खूब महान बनें, अच्छे बनें, आनंदमग्न बने शांत बनें । तो उसी का ही उपाय कह रहे, जो तुम चाहते उसी का उपाय कह रहे उसके सुनने में तुमको ऊब न आनी चाहिए । आत्मा है ज्ञानानंद का पुंज, इसमें उपयोग दो, अपने को ऐसा अनुभव करो कि मेरा कहीं कुछ नहीं, मैं अकिंचन हूँ । अगर मानोगे कि मेरा कुछ है तो अज्ञान बनेगा, अज्ञान में उसका फल बड़ा भयंकर है । भीतर में ज्ञानज्योति जगाओ । ज्ञानप्रकाश बना रहे, ज्ञानी विवेकी श्रावक बनो, सद्गृहस्थ बनो, भीतर में यही दृष्टि रखो कि मेरा कहीं कुछ नहीं । भले ही वह मुनिधर्म नहीं पाल रहा, गृहस्थी के वातावरण में है इसलिए वह अधिक पालन नहीं कर पाता, शुभोपयोग ही उसके लिए प्रधान है, जो ज्ञान पाया, जो सम्यक श्रद्धा पायी अभी उसकी पूरकता तो धर्मिवात्सल्य से है । वात्सल्य जो मुनि में है वही श्रावक में होना चाहिए । जैसे प्रतिदिन गाँवों में गायें चराने के लिए ग्वाले लोग करीब 8-9 बजे जंगल में ले जाते हैं, दिन भर चराते हैं और जहाँ शाम हुई, सूर्यास्त होने को हुआ कि सभी गायों को वे घर की ओर खदेड़ देते हैं । तो होता क्या है कि जिन गायों के बछड़े (बच्चे) घर में हैं वे बड़ी तेजी से उछलती फाँदती घर की ओर दौड़ती हुई आती हैं अपने बच्चों के प्यार के कारण तो उन गायों में कोई तो पूरी लंबी पूछ वाली होती हैं कोई गाय कटी पूछ की याने जिसकी बहुत छोटी पूछ रह गई ऐसी भी होती हैं । तो जिस गाय की जैसी पूछ है वह उसी को डुलाती हुई भागती हुई आती है । चाहे छोटी पूछ की गाय हो चाहे बड़ी पूछ की गाय हो, पर उनको अपने बच्चों के प्रति प्रेम तो एक जैसा ही है तो इसी तरह तत्त्व का प्रेम चाहे श्रावक हो, चाहे मुनि हो दोनों का एकसा है, हाँ मुनि की स्थिति निष्परिग्रहता को है इसलिए वह अधिक सुगमता से अपना काम बनायेगा और गृहस्थ के निष्परिग्रहता कम है तो वह उस अनुरूप वात्सल्य बनायेगा, पर श्रद्धा यथार्थ हो । देह न्यारा मैं आत्मा न्यारा हूँ । आत्मगुणों के स्तवन से प्रभु के गुणों की स्तुति है निश्चय से । देह के गुणों के स्तवन से निश्चय से प्रभु की स्तुति नहीं है । इस तरह तीर्थंकर या आचार्य देव, उनकी स्तुति का प्रकरण लेकर यहाँ खुलासा बताया गया कि देह न्यारा है और यह जीव न्यारा है ।


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