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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 39

From जैनकोष



वर्णादिसामग्य्रमिद विदंतु निर्माणमेकस्य हि पुद्गलस्य ।

ततोऽस्त्विदं पुद्गल एव नात्मा यत: स विज्ञानघनस्ततोऽन्यः ।।39।।

361―वर्णादिक रागादि भावों की पुद्गलनिर्माणरूपता का दिग्दर्शन―वर्णादिक समग्र भाव, इनमें अध्यवसान, रागद्वेषादिक, गुणस्थान आदिक सभी भाव आ गये, यह सब पुद्गल का निर्माण है । इतना स्पष्ट आचार्य महाराज कह रहे हैं और इतने स्पष्ट वर्णन को भी कुछ अगल बगल तोड़ मरोड़कर कुछ अर्थ किया जाये तो जिनशासन के अर्थ को तोड़ना यह एक अपने लिए बड़े अकल्याण की बात है । पुद्गल का निर्माण हैं, ये वर्णादिक समग्र । यहाँ अंत: पुद्गल कर्म है । उसका अनुभाग उदय में आया कि उसका प्रतिफलन होता है इस उपयोग में क्योंकि यह स्वच्छ है ना । जैसे दर्पण के समक्ष स्थित रंग बिरंगी चीज का प्रतिबिंब होता है, प्रतिफलन होता है । अज्ञानी यह समझता है कि मैं यह ही हूँ, अंतर में जो अंतस्तत्त्व है ज्ञानघन चैतन्य अविकार अपने आपके स्वरूप से सहज इसकी तो सुध नहीं रह पाती और जो यहाँ छा गया वह अंधकार, वह प्रतिफलन, उसको मानता कि यह मैं हूँ । देखिये―आत्मा के विशुद्ध चैतन्य स्वरूप की तब दृष्टि जगती है जब विभावों का असहयोग बन जाये । ये मेरे कुछ नहीं, और यह बात तब बनती है जब किसी ओर का एकांत न करके निमित्त नैमित्तिक भाव का सही परिचय हो जाये कि ये विभाव क्या हैं? यह तो पुद्गल कर्म की झाँकी है । मैं तो अपने आपमें विशुद्ध ज्ञान दर्शन स्वरूप हूँ, बल्कि अचरज करना चाहिए कि यह मैं ज्ञानस्वरूप आत्मा जिसका काम जानना देखना, उसमें यह विकल्प और गड़बड़ी कैसे हो जाती? होना तो न चाहिए । मैं जब एक ज्ञानघन हूँ, सहज ज्ञानस्वरूप हूँ तो क्या गुंजाइश है कि मेरे में सहज अपने आपके भीतर से रागद्वेष निकलते रहें । कोई गुंजाइश नहीं । यह सब एक निमित्त नैमित्तिक योगवश बन रहा है, जिसमें इसका कोई स्वत्व नहीं । मेरा इस पर कोई मालिकपना नहीं । मैं इससे अत्यंत निराला मात्र शुद्ध चैतन्यस्वरूप हूँ । अनादिकाल से संसार में भटकने वाले पुरुषों ! जिनवाणी में बताये हुए ढंग से समझ बूझकर इस अविकार चैतन्य स्वरूप का एक बार तो अनुभव कर लो, एक बार भी अगर इस चैतन्यस्वरूप का अनुभव बना सम्यक्त्व हुआ तो पीछे चाहे चरित्रमोह के प्रतिफलनों से गड़बड़ियाँ होकर फिर से चाहे परंपरा थोड़ी बन जाये मगर यह जन्म मरण की परंपरा चिरकाल के लिए कभी नहीं रह सकती । अनुभव करो अपने आपके चैतन्य स्वरूप का, एक दृष्टि रखो कि हमें आत्मकल्याण करना है । मैं आत्मा हूँ, ज्ञानस्वरूप हूँ, मुझे आत्महित चाहिए, अन्य सब बेकार है, अन्य सबका संग प्रसंग मेरे लिए कुछ महत्त्व की चीज नहीं है । एक अपनी ही दया करना है, अपने पर कृपा कर लो अपने लिए ।

362―भेदविज्ञान और स्वभाव दृष्टि―भेदविज्ञान करना होता है दो में, जैसे चावल में कूड़ा पड़ा है तो भेदविज्ञान दो में बनाना है चावल और अचावल । जो चावल है उसे ग्रहण करो और जो अचावल हैं उन्हें छोड़ों । चावल को ग्रहण कर लो, शोधन क्रिया हो गई । ऐसा ही अपने आपमें जानना है चैतन्यस्वरूप और अचैतन्यस्वरूप अर्थात् अनात्मतत्त्व, रागद्वेषादिक भाव आत्मा के कुछ नहीं लगते । ये आत्मा के इस पूज्य स्वरूप से निकले हुए नहीं है, यह सब पुद्गल कर्म की छाया मात्र है । तू इसे सच क्यों समझता है कि ये मेरे स्वरूप की चीज है और मेरे स्वरूप से निकले हैं और ये निरपेक्ष होकर बनते हैं, सब मेरा ही मेरा मामला है । अरे ऐसा सोचकर तू क्यों राग से चिपक रहा है? यह राग छाया है, तेरा स्वभाव नहीं, तेरा स्वरूप नहीं, तू अविकारस्वरूप है, यहाँ तो इसको इस दृष्टि से निरखिये कि समझने में कुछ हैरानी या कुछ अचरज सा हो जाना चाहिए कि मैं तो चैतन्यस्वरूप हूँ, (अपने स्वरूप को निरखकर) मैं चिन्मात्र हूँ, जिसकी तरंग, विशुद्ध अर्थपर्याय बस चिद᳭द्रव्य में अगुरुलघुगुण के प्रताप से हो रहे हैं , इस चित् में ये रागद्वेष कहाँ से उठ खड़े हुए हैं ? ये स्वरूप हैं ही नहीं और यही बात है भेदविज्ञान की । जो सम्यग्दृष्टि ज्ञानी पुरुष इस तरह से निरख रहा है इन रागादिक भावों को कि ये रागद्वेष भाव यहाँ से तो उठे नहीं,( और पुद्गल की परिणति है नहीं । है कर्मगत राग अनुभाग पुद्गल की परिणति, मगर पुद्गल परिणाम की झाँकी जो यह है, यह जीव की स्वच्छता का विकार है । यह स्वच्छता का विकार पुद्गल की परिणति नहीं है । पुद्गल कर्म में रहने वाला अनुभाग रस पुद्गल कर्म का है, पर उस अनुभाग रस की यह झलक, यह झाँकी प्रतिफलन स्वच्छता का विकार यह कर्म का नहीं है, जैसे दर्पण के सामने कोई चीज रखी है, प्रतिबिंब सामने आ गया तो प्रतिबिंब भी उसी रंग का वह चीज भी उसी रंग की और दर्पण को देखो तो दर्पण के स्वरूप से यह प्रतिबिंब नहीं उठता । दर्पण इस लायक है, इस योग्य है कि बाह्य पदार्थों का सान्निध्य पा ले तो यह दर्पण अपने आपकी कला से योग्यता से, अपनी स्वच्छता के विकाररूप परिणम जाता है । इस स्वच्छता का विकार रूप दर्पण में है, पर निरपेक्षतया दर्पण से उठा हुआ नहीं है, यह एक नैमित्तिक भाव है, ऐसे ही आत्मा में जितने रागद्वेष विरोध आदिक जो गड़बड़ियां होती हैं, विकल्प तर्क विचार जो भी हलचल होती है, यह हलचल पुद्गल कर्म में हो रही हैं । कर्म के अनुभाग में चल रही हैं ।

363―अंतस्तत्त्व की विविक्तता―करणानुयोग के सिद्धांत से समझें तो एक-एक बात बिल्कुल स्पष्ट समझ में आयेगी कि जो हलचल जो अनुभाग पहले हमने अपने अज्ञान से बाँध रखा था । कटते-कटते जो कुछ भी रह गया वह अनुभाग उदय में है और उसका यह प्रतिफलन है, जिससे आत्मा की स्वच्छता का विकार बन गया । यह विकार मेरा नहीं है, मेरे स्वरूप से उठा हुआ नहीं है । मैं तो एक आधार बन गया, पिस गया मैं एक आधार बन-बनकर और अज्ञान से मैं ऐसा आधार बन गया कि मानो मैं कुछ रहा ही नहीं । जो कुछ है सो यह कर्मरस । भेदविज्ञान कर लो, यह निरखने में आता रहे कि यह कर्मरस, ये विभाव, ये कषाय, ये विषय मुझसे ऐसे ही न्यारे हैं जैसे कि अन्य ज्ञेय पदार्थ झलकते हैं, वैसा ही न्यारा यह पुद्गलकर्म का विपाक है । अपने को स्वच्छ ज्ञानमात्र निरख लो । नयों का प्रयोग किस प्रयोजन के लिए है कि विभावों से हट लें, स्वभाव में लीन हो जावें । तो बस यह कुंजी, यह लक्ष्य, यह बात जिसके निर्णय में है वह तत्त्व कौतूहली वह खिलाड़ी सब नयों के प्रयोग में अपनी ही ज्ञान-लीला का विस्तार करता है । उसे कहीं विवाद, संदेह कुछ नहीं । स्पष्ट ये कर्मरस विभाव हैं उसके लिए कर्मरस भिन्न नजर आते हैं, यह है कर्मरस । झाँकी भर हैं, तू तो यहाँ स्वरूप में अन्य कुछ बना ही नहीं विकृत रूप में । तू अज्ञान से क्यों उसे अपना रहा है ? आचार्य महाराज यह कह रहे हैं कि वर्णादिसामग्रमिदं विदंतु निर्माणमेकस्य हि पुद्गलस्य । ये वर्णादिक से लेकर गुणस्थान पर्यंत कषाय इच्छा वितर्क विचार आदि यह पुद्गल का निर्माण है, तू अपनी चीज क्यों समझ रहा है? तेरे में यह प्रतिबिंब होता है, तेरी स्वच्छता का विकार होता है सो यह तेरा अनिष्ट है, यह तेरी बरबादी है । तू अपनी ही बरबादी से प्रीति रखता है, बालक किसे कहते है? अज्ञानी किसे कहते है ? जिसे हित अहित का विवेक नहीं, बालक तो जलते हुए उस कोयले को भी कहो पकड़ लें, उसे हित अहित का क्या विवेक? जो उस बालक की बरबादी का हेतुभूत है कहो उसे भी अपना ले । तो इसी तरह यह उपयोग, यह अज्ञानी, इसको यह भेदविज्ञान की बात दृष्टि में नहीं आती कि ये सब पौद्गलिक हैं, जैसा कि आचार्य स्पष्ट शब्दों में घोषणा कर रहे है । अहो मोह का उदय आया, कुछ कला समझने की आ गई तो यह व्यवहारनय से कहा इसलिए झूठ है, तब तो फिर सिर्फ 20 गाथायें ही सत्य रह गई । बाकी समस्त जैन ग्रंथ असत्य हो गये । अरे अन्याय न करो तुम कला बनाओ । अगर अंगूर के फल नहीं पा सकते तो खट्टा कहकर भाग जाने की बात तो लोमड़ियों में होती है । यदि ग्रंथों में बुद्धि नहीं चलती तो उन्हें झूठ कहकर पाप तो न कमाओ । करणानुयोग के माध्यम से हर बात को समझो । यह सब कर्मरस है, यह सब कर्माक्रमण है । ये सब शास्त्र एक आत्मानुभूति के ही पोषक हैं, मिथ्या नहीं, पर कला आनी चाहिए । निष्पक्षता का भाव आये तो वह सब यहीं स्पष्ट है । यहीं परख लो, विभाव स्वभाव को जुदा-जुदा करना है, ये सारे वर्णादिक समग्र विषय कषाय यह सब पुद्गल का निर्माण है, ऐसा विदंतु जानो ।

364―विभावों से हटने में विभावों की नैमित्तिकता के परिचय का सहयोग―स्वच्छता के विकार को नैमित्तिक समझो अच्छा फिर क्या करो? यह जानो कि ये सब पौद्गलिक हैं, पुद्गल हैं, आत्मा नहीं, जैसे दर्पण में आये हुए प्रतिबिंब से भेद करने में आपकी क्या बुद्धि जगती है? आप कैसे समझ पाते हैं कि यह प्रतिबिंब दर्पण का स्वरूप नहीं, जरा यह ही तो बतलाओ? इस तरह तो नहीं कि दर्पण जब लाल कपड़े की ओर देखता है तब प्रतिबिंब आता है । अरे झुकना बेझुकना क्या, ऐसा निमित्त सन्निधान पाकर यह दर्पण अपनी कला से ऐसी योग्यता रख रहा है, भींट में तो योग्यता नहीं दरी में तो योग्यता नहीं, वहाँ तो झलक नहीं होती । यह अपनी-अपनी योग्यता की बात है । इस दर्पण ने अपनी कला से अपने में खेल खेल लिया, इसको निमित्त ने खेल नहीं दिया । निमित्त की कोई परिणति उपादान में नहीं आयी, लेकिन यह योग स्पष्ट तो हो रहा है, अन्यथा यह प्रतिबिंब दर्पण से जुदी बात है इसके निर्णय का और क्या साधन है? जो जब है वही तो सही साधन बन सकेगा । यह सब जानकर करना क्या है? भेदविज्ञान । जिससे विभावों से असहयोग हो जाये और अपने स्वभाव में मग्नता का मार्ग निकल आये । यह कर्मरस है, कर्मलीला है, यह मैं नहीं हूँ, मैं तो ज्ञाता द्रष्टा चैतन्यस्वरूप मात्र हूँ, इसमें यह विज्ञानघन अंदर है । कहते हैं कि प्रज्ञा छैनी से इस सूक्ष्म अंत: संधि पर प्रहार कर दें, दो टूक हो जायें, जीव अलग, अजीव अलग, ज्ञान में दो टूक हो जावें, वह अंत: संधि है कहां? वह अंत: संधि यहाँ हैं कि जिसका निमित्तनैमित्तिक भाव अच्छी तरह से परिचय करा रहा है । हाँ अज्ञान तब है जब निमित्त नैमित्तिक भाव मात्र तक न रहे और निमित्त का कर्तृत्व अंगीकार कर ले कि इसने इसकी परिणति की, याने यह निमित्त ही इस परिणमन रूप बन गया जो उपादान में विवक्षित है । यह तो अज्ञान की बात है, मगर विशुद्ध निमित्तनैमित्तिक योग का परिचय हमको भेदविज्ञान में सहायक हो रहा है, उसी का प्रयोग आचार्य कुंदकुंद देव ने समयसार में बहुत-बहुत जगह समझा कर वर्णन किया है । इस कलश में कह रहे हैं कि वर्णादिक से लेकर गुणस्थान पर्यंत भाव सब पुद्गल का निर्माण है । देखिये-जो शुद्धता है वह तो उपाधि के अभाव से उत्पन्न हुई और जहाँ-जहाँ जितनी-जितनी भी बात रह गई वह सब एक पुद्गल कर्मदशा का निमित्त पाकर है । इसी कारण ये भी पौद्गलिक हैं और पुद्गल कर्म में तो अनुभागबंधपरिणति का विस्फोट है सो पुद᳭गल है । मैं ज्ञानघन उससे अन्य हूँ ।

365―सब अनुयोगों से ज्ञान वर्द्धनकर अविकार ब्रह्मस्वरूप का परिचय पाने में आत्महित―भैया अपना ज्ञानवर्द्धन का माध्यम चारों अनुयोगों को बनावें। आपको निश्चित रूप से ऐसा प्रकाश प्राप्त होगा आत्महित वांछा से स्वाध्याय करने पर कि सब बातें जुदी-जुदी मालूम होगी । यह भी स्पष्ट हो जायेगा कि इतनी गड़बड़ होने पर भी इतना निमित्तनैमित्तिक योग का प्रवाह चलने पर भी अणु-अणु प्रत्येक का अपने-अपने उत्पाद व्यय से चल रहा है । किसी का उत्पाद व्यय कोई दूसरा नहीं करता, यह है एक उत्पाद व्यय सामान्य की बात । अब जो विशेषता आती, जिसे कहते विकार, यह विकार किसी भी पदार्थ के स्वरूप में नहीं बसा । क्या विकार जीव के स्वरूप से होता है? जैसे कि बंदर बहुत से चने चबा लेते और अपने मुख में भर लेते, उनके मुख में एक ऐसी थैली है, फिर एक निर्विघ्न स्थान में जाकर धीरे-धीरे चबाता है । विकार कहीं ऐसे भरे नहीं हैं कि यह जीव अपने में विकार कर रहा है ऐसा इस जीव को शौक नहीं है, ऐसा इस जीव को बरबादी का प्रेम नहीं है कि अपनी बरबादी की बात स्वरूप में रखे । और स्वरूप में से निकलकर अपनी बरबादी थोपे । यह स्वरूप अविकार विशुद्ध है । द्रव्यदृष्टि से देखिये शुद्ध चैतन्यमात्र । उस पर दृष्टि दीजिए । यह आत्म दृष्टि जब बनेगी तब यह ध्यान में आयेगा कि ये सब पुद्गल के परमाणु हैं । देखिये-यह बात दो जगह है । जैसे कि समयसार में ही खुद बताया गया है कि कषाय, अज्ञान, मिथ्यात्व अविरति सब दो-दो प्रकार के हैं―जीवरूप, अजीवरूप । अजीवरूप कषाय का तादात्म्य उस अजीव पुद्गल कर्म में है । एक द्रव्य का तादात्म्य दूसरे में हो नहीं सकता । अन्यथा तत्त्व ही खतम हो जायेगा । तो अजीव पुद्गल कर्म में जो कषाय है, राग है, अनुभाग है उसका तादात्म्य उस काल में, पुद्गल कर्म में है, जीव में नहीं है । और उस अनुभाग का जब उदय हुआ, मायने उस पुद्गल कर्म में ही वह अनुभाग खिल गया, उसका सन्निधान पाकर है ना यहीं का यहीं । चाहे उसे प्रतिबिंब कहो, स्वच्छता का विकार कहो, यह जीव की उस काल की परिणति है, पर जैसे दर्पण में लोग बड़ी अच्छी विधि से समझ डालते हैं कि यह प्रतिबिंब दर्पण का नहीं, इसके स्वरूप से, इसके स्वच्छ स्वभाव से उठी हुई बात नहीं, ये तो नैमित्तिक हैं औपाधिक हैं, इन सबके समझने का प्रयोजन मात्र एक है । पर जानें, हेय जानें, अपने लिये अहित जानें और उससे हटे, इन विभावों को, रागद्वेषादिक भावों को हेय जताने के लिए भिन्न जताने के लिए यों आचार्यो का यह निरूपण जो समझ ले उसके लिए वे विभाव प्रकट भिन्न हेय, दूर नजर आयेंगे । यह एक मैं चेतना मात्र हूँ, इन सबसे निराला विज्ञानघन हूँ ।


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