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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 40

From जैनकोष



घृतकुंभाभिधानेऽपि कुंभो घृतमयो न चेत् ।

जीवो वर्णादिमज्जीवजल्पनेपि न तन्मय: ।।40।।

366―चित्स्वभावमात्र अंतस्तत्त्व का स्मरण―अपने आत्महित के लिए प्रयोजनभूत निष्कर्ष यह है कि हमको दृष्टि में ज्ञान में यह समा जाना चाहिए कि मैं एक चित्स्वभावमात्र परम पदार्थ हूँ । मेरे में अपने में, अपने ही स्वभाव में अन्य कोई बात नहीं है । किसी अन्य पदार्थ का मेरे स्वरूप में प्रवेश नहीं है । मैं शाश्वत चैतन्य स्वभाव मात्र हूँ, मैं यह हूँ और कुछ नहीं हूँ । जैसे परीक्षक उस मलिन स्वर्ण के अंदर समझता है कि स्वर्ण यह है, यह नहीं और कोई आभूषण हो लाया हो, जिसमें मल ज्यादा है उसे कह देता कि इसमें सोना नहीं है, और कोई पुन: कहे कि भाई यह क्या कहते हो, अच्छी तरह से पहिचानो, कुछ तो सोना होगा तो वह अच्छी तरह से समझाकर बता देता है कि इसमें इतना तो सोना है और बाकी सब मैल, ठीक ऐसे ही अपने आपको समझना है कि मैं तो यह चिन्मात्र हूँ और बाकी जो मुझ पर छा गये―अंधेरा, विकल्प, रागद्वेष, कषाय, ये सब मैं नहीं हूँ । जो मैं हूँ उसी में मेरी रुचि रहेगी अब, जो मैं नहीं हूँ उसमें अब मेरी रुचि नहीं है । लोक में क्षोभ करने से लाभ क्या? एक अपने आपके इस ज्ञानघन स्वरूप को पहिचानें और उसमें ही रमण करें । संसार संकट, जन्म, मरण टल जायेंगे, भवरहित हो जायेंगे । बस सदा के लिए शांति हो गई । तो समझना क्या है? सर्वविशुद्ध अविकार सहजसिद्ध अपने स्वरूप को, क्योंकि जो भी पदार्थ है उसका अपना निजी स्वरूप उसमें अवश्य है । उस स्वरूप में किसी की अपेक्षा नहीं, किसी की दया नहीं, किसी का प्रवेश नहीं, वह तो अपने ही सत्त्व से संबंधित है, ऐसा चित्प्रकाश रूप अपने आपका अनुभव करना । और जो अन्य-अन्य रूप अनुभव बनते हैं―मैं घर वाला हूँ, पुत्र हूँ, पिता हूँ, दुकानदार हूँ आदि जो-जो भी यहाँ विकल्प विचार उठते हैं वे इस ज्ञानानंद रूप परमात्मतत्त्व की बरबादी स्वरूप हैं, एक क्षण भी तो इस अनात्मतत्त्व का कटाव करके अंतःस्वरूप में अहंपने का अनुभव तो कर लो । यह काम इस जीवन में करने को पड़ा है । जैसे लोग काम की बात कहते ना, तो वहाँ आंखें खुलती है, कमर कसकर तैयार होते हैं, यह काम तो करना ही है, ऐसे ही अब मोड़ खाकर अंत-दृष्टि बनायें कि मुझको अविकार निज सहज चैतन्य स्वरूप का अनुभव करके ही रहना है । क्या हूँ यह मैं । समस्त अध्यवसानों से निराला । इस चैतन्य शक्ति से अतिरिक्त जितने भी विभाव हैं, संबंध हैं वे सब अध्यवसान हैं और उन्हें पौद्गलिक कहते हैं, क्योंकि वे पुद्गल के अनुभाग हैं और यहाँ यह अंधेरा उस अनुभाग के प्रतिबिंब रूप हैं । देखो अंत: वे आत्मा की स्वच्छता के विकार रूप हैं, वे सब मैं नहीं हूं अपने आपके स्वरूप का दर्शन करें तब समझ में आयेगा कि ये मेरे स्वरूप के भाव नहीं । इस प्रकार एक अपनी दृष्टि करने का स्वहितकारी कर्तव्य है ।

367―अजीव में जीवसंगमवश जीवत्व का उपचार―अब थोड़ा बाहरी निर्णय में आओ, विशुद्ध अंतस्तत्त्व के ख्यालात तो किसी विरले के ही होते हैं बाकी जगत यह मान रहा है कि यह स्थावर है, यह त्रस है, यह वादर है, यह एकेंद्रिय है, यह दो इंद्रिय है, तो क्या ये जीव नहीं कहलाते? शुद्धनय की दृष्टि से परखें कि ये जीव नहीं है । जीव तो एक चैतन्यमात्र है । यों समझिये कि जैसे कोई स्वर्ण का डला लाये जिसमें मानो आधी खोट है, आधा सोना है तो उसे हाथ में लेकर देखकर सर्राफ कहता है―अरे यह सोना नहीं हैं―अच्छा कोई जिद्द करे कि जरा सोचकर बात करो तो वह भली प्रकार देखभाल कर कहता है कि इसमें आधा सोना है, तो ऐसे ही इन सब प्राणियों में जो एक शुद्ध चैतन्यरस सहज ज्योति आत्म स्वरूप है, जिसके कारण इसका सत्त्व है वह तो जीव है और बाकी जितने औपाधिक भाव हैं और उपाधियां है वे जीव नहीं है । बात ऐसी ही है लेकिन कोई कहे कि शास्त्रों में तो ये सब जीव बताये गए है । जीव के भेद हैं त्रस, स्थावर और यदि ऐसा एकांत कर लिया जाये कि ये सब जीव नहीं है तो इन पर पैर धरकर चले जाने में भी हिंसा न लगना चाहिए, बंध न हो फिर, किंतु ऐसा तो नहीं है । तो भाई बात यह है कि यहाँ उस जीव का प्रसंग तो है, मगर जीव का यह विशुद्ध स्वरूप नहीं है, ये तो असमान जातीय विभाव द्रव्यपर्यायें हैं, सर्वथा एकांत तो नहीं है कि यह जीव है ही नहीं, किंतु इसमें जीवत्व भाव यह है और बाकी यह सब प्रासंगिक मैल है । इसमें जो जीव कहा गया है सो यों समझिये कि जो जीव के परमार्थ स्वरूप से परिचित नहीं हैं उनको परमार्थ स्वरूप का परिचय कराने के प्रसंग में बताया जाता है कि देखो ये त्रस जीव हैं ना, जो ये मनुष्य हैं ना तो इनमें जो एक चैतन्य शक्ति है वह तो जीव है और यह वर्णादिमान् कुछ जीव नहीं है, मात्र उस संबंध के कारण इन सबको जीव कहा गया है । पर इसका अर्थ यह न होगा कि यह शरीर जीवमय हो गया । उपचार का कोई प्रयोजन होता है । विना प्रयोजन के उपचार भी नहीं किया जाता । जैसे कहा घी का घड़ा, अब यहाँ उपादान दृष्टि से कोई अर्थ लगाकर सुने घी का घड़ा याने जैसे मिट्टी का घड़ा, लोहे का घड़ा, तांबे का घड़ा वैसे ही घी का घड़ा, तो उसकी यह बात गलत हो जायेगी ना । अरे वह घी का घड़ा घी से बना नहीं हैं, उसका उपादान घी नहीं है । तो जो कोई उपादान भाषा में अर्थ समझे तो उसका समझना झूठा? प्रयोजन अवश्य इतना है कि जिसमें घी रखा गया है वह घड़ा । प्रयोजन से बात कह रहे हैं, घर में भी तो कहते हैं-जरा घी का डिब्बा उठा लाओ, तो क्या कहने वाला इतना मूढ़ है कि वह यह समझ रहा हो कि यह घी से निर्माण किया हुआ डिब्बा है? अगर ऐसा समझता होता तो अग्नि पर क्यों रखता? घी से बना हुआ डिब्बा तो अग्नि पर रखने से भस्म हो जायेगा । प्रयोजन है वहाँ, जिस प्रयोजन से उपचार किया गया, पर वहाँ यह न समझना कि जो यह आकार है सो घी है । उपादान दृष्टि वाला अर्थ घटित न करना, तो घी का कलश है, ऐसा कहने पर भी कहीं वह कलश घी मय नहीं बन गया । वहाँ पदार्थ भिन्न दो हैं, ऐसे ही इन संसारी जीवों को, त्रस, स्थावर जीवों को, वर्णादिक भावों को जानो और की तो बात क्या, कर्मानुभाग का झलक रूप जो जीव की स्वच्छता का विकार है वह भी जीव नहीं है, जीव कहीं विकारमय नहीं हो गया । तो जो जीव नहीं है उनको जीव बताया गया है वह व्यवहारनय से बताया गया है और यदि उपादान भाषा में समझो तो उपचार से कह लो जो उपचार कि मिथ्या है ।

368―सर्व कथनों का प्रयोजन तत्त्व की खोज―उपचार से जो बताया गया है सो यह प्रतिबोधन के लिए बताया गया है । कहीं यह न जानना कि जड़ हो गया जीव, यह शरीर ही जीव हो गया । जीव तो निज चैतन्य ज्ञानरस निर्भर एक अमूर्त बस ज्ञान ज्योति मात्र है, उसमें अनुभव करें कि यह मैं हूँ, यह बहुत बड़ा काम है, और उस कार्य के लिए पहले हृदय की शुद्धि अति आवश्यक है । यही किसी भी प्रकार का भ्रम न हों, भ्रमरहित जीव ही इस अंतस्तत्त्व के दर्शन का पात्र बनता है, मायने वह आत्मा इस अंतस्तत्त्व का दर्शन करता है । अब इस अंतस्तत्त्व के दर्शन करने के लिए जितने-जितने तरीकों से ज्ञान बताए गए हैं उन सबका उपयोग ठीक बनना चाहिए । जब एक द्रव्य की दृष्टि से देखें तो उस दृष्टि में तो केवल एक ही द्रव्य नजर में आयेगा । पर्याय दिखा, स्वरूप दिखा, गुण दिखा, एक द्रव्य की दृष्टि करने के मूड में अर्थात् निश्चयनय की दृष्टि में एक ही पदार्थ आया―जीव । लो यह जीव अभी यों परिणम रहा, अब यों परिणम गया, ये जीव की पर्यायें हैं । इन पर्यायों में जीव अनुगत है, यह दृष्टि में आया । इस दृष्टि का प्रतिलोम क्या है कि अन्य पदार्थ हमारी दृष्टि में नहीं । न अन्य पदार्थों के हां करने की दृष्टि है, न अन्य पदार्थों को न करने की दृष्टि हैं, केवल एक जीवतत्त्व या जिसका विचार चल रहा हो निश्चय दृष्टि में, केवल वही दृष्टिगत है, वहाँ यह सब बात आ रही कि ये सब इसके हो रहे, इसके चल रहे तो उस दृष्टि में अन्य का, आश्रयभूत का ख्याल न होने से इसके उपयोग की मुद्रा व्यक्त नहीं हो पाती । अबुद्धिपूर्वक विकार रह जाता है, बुद्धिपूर्वक विकार में अनुभाग अधिक हुआ करता है । अच्छा यों देखो-पर यों देखने में यह तो बात सही नहीं है कि जीव में जो रागद्वेष आये वे यों ही आ गए । उसमें कोई परपदार्थ के सन्निधान की बात नहीं है, विकार यों ही आ गए । जैसे हम आप जब मार्ग में चलते हैं तो पेड़ों की छाया बीच-बीच पड़ती जाती है, तो उस छाया रूप से परिणमा यह शरीर उस काल में जितनी देर वह छाया है । वह छाया केवल उस मुसाफिर से चलने के ही कारण उसी के निमित्त से नहीं हुई किंतु वहाँ उस वृक्ष का सन्निधान है, जिसका निमित्त पाकर छाया हुई है, यह बात असत्य नहीं है, मगर दो तरह की बात कही जा रही है -इस कारण यह व्यवहारनय से है । यह असत्य नहीं, इस ही बात को तब यों कह दीजिए कि यह तो वृक्ष की ही परिणति है तो यह सत्य नहीं । तो यह उपचार बन गया ।

369―व्यवहारैकांत व निश्चयैकांत को त्यागकर सत्य विज्ञान करने में हित―यह समझना चाहिए कि तत्त्व की बात एक निष्पक्ष चिंतन में मिलेगी । न व्यवहार एकांत में है तत्त्व की बात, न निश्चय एकांत में तत्त्वदर्शन, किंतु व्यवहार निश्चय दोनों को समझकर प्रमाण रूप ज्ञान बनाकर फिर यथार्थ बात जानने के बाद समस्त नय पक्षों को छोड़ने पर इस अंतस्तत्त्व के दर्शन होंगे । अब रही यह बात कि उपयोग सबका करना, व्यवहारनय यह बता रहा है कि उस मुसाफिर पर जो छाया आयी है तो वृक्ष का सन्निधान पाकर इस शरीर की ही ऐसी योग्यता है कि छाया आ गई, ऐसे ही यहाँ समझना है कि ये जो रागादिक विकल्प विचार वगैरह गुजर रहे है सो ये कर्मानुभाव का उदय, यह तो सन्निधान में है, और जीव में ऐसी वर्तमान योग्यता है कि ऐसा सन्निधान पाये तो जीव अपनी कला से इस प्रकार खेल खेलने लगा, मगर यहाँ निमित्त को कर्ता मान लिया वह हो गया व्यवहार एकांत और यहाँ यदि द्रव्य निरपेक्ष वृक्ष के सन्निधान का निमित्त बिना ही इस मनुष्य पर छाया आ गयी, ऐसा मानो तो वह कहलाता है निश्चय एकांत । और, प्रमाण की बात यह है कि उस वृक्ष का सन्निधान पाकर देह ने, देह पर, देह की योग्यता से इसका छाया रूप खेल खेल लिया । ऐसा जानकर हमको क्या लाभ मिलेगा? विभावों से हटना और स्वभाव में लगना । बस काम करने की यही एक है आत्मकला । अब इस ही कुंजी से सब जगह निर्णय स्वयं कर सकते हैं कि किस प्रकार का ज्ञान, कैसा कौन यथार्थ गुण इस काम में मदद दें कि विभावों से हटे और स्वभाव में लगे? शुद्धनय से देखो―स्वभाव अविकार है, स्वभाव में विकार नहीं होता । वह तो अपने आपमें शाश्वत चैतन्यरस निर्भर है । यह देखा शुद्धनय से, जिससे स्वभाव की दृष्टि की प्रेरणा हम पा सकेंगे विभावों से असहयोग करके, क्योंकि अनादि से यह जीव विभावों में रत रहा आया है । तो जब तक यह परिचय न मिल जायेगा कि ये विभाव मेरे स्वरूप की चीज नहीं, ये औपाधिक भाव हैं, मेरे में आगंतुक है, नैमित्तिक हैं । जैसे दर्पण में रंगीन वस्त्र का प्रतिबिंब हो जाये तो यह मान रहता है कि यह दर्पण प्रतिबिंब का है वस्तुत: प्रतिबिंब दर्पण का नहीं है । दर्पण आधार है, दर्पण की स्वच्छता का विकार है, उस काल में दर्पण की परिणति हैं, मगर दर्पण के स्वरूप से निकला हुआ वह प्रतिबिंब नहीं, किंतु उस समक्ष निमित्त का सन्निधान पाकर दर्पण अपनी स्वच्छता के कारण उस प्रकार विकार रूप परिणम गया है । परिणमन दोनों का अपने में अपना-अपना है, तो ऐसे ही जब यहाँ यह निरखना बनता कि यह मैं चैतन्य स्वरूपत: निरपराध हूँ, इसका स्वरूप तो चेतने का है, इस पर यह कर्मरस लद गया है, क्योंकि कर्मानुभाग का उदय है, लद गया है, यह मेरा स्वरूप नहीं । साक्षात् उसे समझ में आने लगता है कि यह सब कर्मफल है, मैं तो अपने आपके स्वरूप में केवल चैतन्यरस निर्भर हूँ ।

370―वस्तु स्वातंत्र्य और निमित्तनैमित्तिक भाव का एकत्र दर्शन―जहाँ ज्ञाता को स्वभाव विभाव के भेद की बात समझ में आयी कि इस विशुद्धि के प्रताप से, इस ज्ञान और वैराग्य के प्रताप से सत्त्व में पड़े हुए कर्मों में गुण श्रेणी निर्जरा की विधि से बहुत बड़ी हलचल मच जाती है, आगे के निषेक खिंच खिंचकर नीचे समय के निषेकों में परिवर्तित होते, उस समय कितना गड़बड़ होता है? जैसे मानो चूहों की सभा लगी हो और उसमें आ जाये कोई अचानक मनुष्य तो वहाँ कितनी गड़बड़ मच जाती है । कर्मों की इन सब हलचलों को परमावधि ज्ञानी और सर्वावधि ज्ञानी तो साक्षात् जानते हैं और हम आप अपनी युक्ति से और अनुभव से जानते हैं । जैसे नदी में बाढ़ आ गई तो हम जानते हैं कि ऊपर बहुत तेज वर्षा हुई है, अन्यथा यह पूर यहाँ न आ सकता था । ठीक ऐसे ही जब हमने यह देखा कि मैं तो एक विशुद्ध चैतन्यमात्र हूँ, स्वत: केवल एक चैतन्य की ही तरंग आना चाहिए लेकिन यहाँ जो ये ठाठ आ गए, अंधेरा छा गया, विकल्प हो गए, इस चेतन में ऐसा विकल्प करने की क्या बात थी? लेकिन स्वभाव के विपरीत जो कुछ भी यह अंधकार आ गया यह अंधकार उपाधि के संबंध से है, जब उपाधि का उदय आया, यहाँ तब अंधकार आया अन्यथा कैसे आया? स्वयं तो परिणमन स्वभाव वाला है किंतु स्वयं विकार का निमित्त नहीं होता । अगर यह आत्मा स्वयं विकार का निमित्त हो जाये तो देखो निमित्त सदा, उपादान सदा । विकार कभी मिटना ही न चाहिए । ये विकार भी तब तो स्वभाव बन जायेंगे । विकार में भी परिणति उपादान की है पर इसमें कोई दूसरा उपाधि का संबंध है । अगर उस उपाधि को कर्ता रूप में देखेंगे तो वह अज्ञान है । कर्म चैतन्य स्वच्छता से विकार रूप नहीं परिणम सकेगा । वह तो अपने आपमें पुद्गल सीमा में जैसा हो सकता है वैसा परिणमेगा, तो किसी के भी स्वभाव विभाव पर्यायरूप कोई दूसरा पदार्थ नहीं परिणम सकता, यह बात अमिट है अन्यथा यह सारा जगत शून्य हो जायेगा । किसी ने इस पदार्थ को परिणमन दिया तो यह रहेगा या वह उस रूप परिणम गया तो यह न रहेगा । कहीं अन्य रूप परिणम जायेगा, तो अव्यवस्था होगी, जगत शून्य हो जायेगा । पदार्थ का यह अकाट्य नियम है कि एक पदार्थ दूसरे पदार्थ के द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव रूप से नहीं परिणमता । यह बात तो साधारण गुणों ने ही स्पष्ट कर दी । विशेष आगे हैरानी की चीज नहीं हैं, वस्तुत्व गुण और अगुरूलघुत्व गुण ये ही पहिले से वस्तु स्वातंत्र्य की घोषणा कर रहे हैं । वस्तुत्व गुण बतला रहा है कि प्रत्येक द्रव्य अपने स्वरूप से सत् है, पर रूप में असत् है और इसी कारण वस्तु में अर्थ क्रिया होती है, परिणमन होता है । अगुरुलघुत्व गुण जता रहा है कि कोई भी पदार्थ किसी दूसरे के स्वरूप को कभी नहीं परिणमा सकता । तो यहाँ जीव और कर्म का संबंध है तो कर्म अपने में परिणम रहा जीव अपने में परिणम रहा, मगर जितना विभावों का प्रसंग है वह कर्मोदय का सन्निधान पाकर ही प्रकट होता है । होता है जीव की स्वच्छता के विकार रूप से ।

371―वस्तु स्वातंत्र्य व निमित्तनैमित्तिक भाव का यथार्थ परिचय करने वालों का यत्न―वस्तु स्वातंत्र्य व निमित्तनैमित्तिक भाव का तत्त्व जिसने जान लिया वह यह संबोधन करता है कि हे कर्मरस, हे अंधकार, हे अध्यवसानों, तुम मेरे कुछ नहीं लगते । तुम मेरे कुछ स्वरूप नहीं हो, यह सब परख लिया । अपने स्वरूप को निर्विघ्न निरख रहा । मैं तो शुद्ध चैतन्यमात्र हूँ, रागादिक भाव, ये विषय कषाय तुम मेरे से दूर हटो, तुम पर हो । जैसे दर्पण में प्रतिबिंब रूप इनमें यह जीव अपना उपयोग लगाता था, इनको अपना मानकर इन आश्रयभूत पदार्थों में जुटा करता था । अब तथ्य की बात इतनी समझ ली कि मैं एक चैतन्यस्वरूप मात्र हूँ । इस ज्ञान के बल से उन विभावों से सहज विरक्ति हुई है और इस सहज वैराग्य और इस ज्ञान के प्रताप से उन कर्मो की गुणश्रेणी निर्जरा, असंख्यात गुणी क्रम से निषेकों का नीचे की स्थिति वाले निषेकों में मिलना और ऐसा सहज बढ़ते चले जाना और स्थिति खंड, अनुभाग खंड होना यह कर्म में आटोमेटिक चल रहा है , जीव के विशुद्ध परिणामों का निमित्त पाकर और जब यह उदय में आयेगा तो वह चूंकि पुद्गलकर्म विपाक भवेभ्यो भावेभ्य आत्मानं निवर्तयति बताया है, इसी समयसार में कि यह जानो जीव पुदगल कर्म के उदय से होने वाले भावों से अपने को हटाता है । मैं यह नहीं हूँ । मैं चैतन्यस्वरूप मात्र हूँ । सो यह बात ज्ञानी में बन रही है ना । इसी बल पर जितना अनुभाग उदय में है और जो एक प्रतिफलन है, ज्ञान और वैराग्य के बल से, अब उसके बंध इतना भी नहीं चल रहा, कम बंध होता जा रहा और वह मौका पा लेता है, इस चैतन्यरस निर्भर ज्ञानघन चैतन्यस्वरूप की उपासना के प्रताप से निकट काल में यह जीव सर्व बंधनों से मुक्त हो जायेगा ।

372―स्वैकत्व के प्रति खरतर दृष्टि की आवश्यकता―निज के एकत्व की दृष्टि हो, और ऐसी हो, जैसे एक कथानक में बताया है कि एक बार पांडवों के गुरू द्रोणाचार्य ने अपने पाँचों शिष्यों को अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव की धनुर्विद्या की परीक्षा हेतु बुलाया । एक पेड़ पर काठ की चिड़िया टाँग दी और शिष्यों को बुलाकर उनकी धनुर्विद्या की परीक्षा करते गए । जब एक को धनुष बाण दिया, चिड़ियां की आंख में निशाना लगाने को कहा तो निशाना लगाकर खड़ा हुआ । द्रोणाचार्य ने पूछा―बताओ तुम्हें क्या दिखता? तो वह बोला-महाराज मुझे तो धनुषबाण दिखता, पेड़ की पत्तियां दिखती, चिड़ियां दिखती, आप दिखते । बस-बस परीक्षा हो गई तुम बैठ जाओ । ठीक यही बात शेष तीन ने कही, पर जब अर्जुन की बारी आई तो पूछा―आपको क्या दिखता? तो अर्जुन बोला―बस तीर की नोक और चिड़िया की आँख । बस-बस धर दो धनुष बाण, हो गई तुम सबकी परीक्षा । अर्जुन एक तुम ही इस परीक्षा में उत्तीर्ण हुए । तो ऐसी ही बात तो ज्ञानी के पास होती है जिससे वह सर्व परीक्षाओं में उत्तीर्ण होती है जिस ज्ञानी को इस शुद्ध चैतन्यस्वरूप का अनुभव होता है वह संसार के किसी भी दुःख से घबड़ाता नहीं है । देखो इस बात को पाने के लिए समयसार में अनेक जगह बताया गया हैं कि देख भाई तू ऐसा अध्यवसान मत कर कि मैं इसको सुखी करूं, मैं इसको दुःखी करूं, मैं इसको बरबाद करूं । अरे उनका यह सब कर्मोदय के अनुसार होता है । इस बात को बहुत-बहुत विवरण से समझाया ।

373―निमित्तनैमित्तिक भाव के सही परिचय का प्रयोजन विभाव से उपयोग का हटाव―प्रियवर इन तीन बातों का सही-सही परिचय कर । तेरे में जो उपयोग की विकार वाली व्यक्त लीला है सो इसमें तीन कारण हैं । उपादान कारण, निमित्तकारण, और आश्रयभूत कारण । उपादान कारण तो जीवद्रव्य है, याने पूर्व पर्याययुक्त द्रव्य उपादान कारण है । याने वह चीज, वह कार्य, वह नैमित्तिक तो उपादेय है, याने ग्राह्य नहीं, किंतु उपादान में परिणति आने योग्य है, सो बस यही आधार उपादान कहलाता है । वह अगर नहीं है तो चीज आयेगी कहाँ और कहां से? और यह पंचेंद्रिय व मन का विषयभूत पदार्थ समुदाय है आश्रयभूत कारण, जिसको दृष्टि में लेकर तू अनेक तरह से उथल पुथल करता है । यह दृश्य पदार्थ विकार का निमित्त नहीं है और स्वयं आश्रयभूतकारण भी नहीं बनता, तू उपयोग जुटाता है तो कारण बनता है, उपयोग नहीं जुटाता तो यह कारण नहीं बनता । निमित्त कारण तो कर्म का उदय है, वह अनुभाग दशा हुई । यहाँ प्रतिबिंब हुआ, स्वच्छता का विकार हुआ । यह हुआ नैमित्तिक । अब जो जीव ज्ञानी है वह ज्ञान और वैराग्य के बल से स्वच्छता के विकार से उपयोग हटाकर एक चैतन्यरस में अपना उपयोग जुटाता है । मैं यह हूँ, ऐसे इस चैतन्यस्वरूप की समझ रखने वाले ज्ञानी जन बतलाते हैं कि दृष्टि यह लाओ फिर सब जीवों में देखो तो प्रथम यह ही नजर में आयेगा । यह तेरे इस अंतस्तत्त्व की दृष्टि के अभ्यास का परिचय है कि अगर जगत के जीवों को देखकर वहाँ एकदम सहज चैतन्यरस निर्भर अंतस्तत्त्व दृष्टि में आता है कि यह सब यह है तो समझे तूने अपने आप अपनी परीक्षा कर ली कि मैंने इस ज्ञायक भाव की दृष्टि को अपना दृढ़ बना पाया है । अपराध पीछे दिखेंगे कर्मोदय है ऐसा ही कर्मरस है, उसमें यह एकत्व कर रहा है । यह बेचारा स्वरूपत: निरपराध है, मगर परिस्थिति होने से यह सापराध है । यह उदय में आया । तो मतलब यह है कि अपने आपमें आत्मत्व का ही नाता रखियेगा धर्म के प्रसंग में ।

374―पार्टी की शल्य छोड़कर मात्र आत्मत्व के नाते धर्मपालन का पौरुष करने का संदेश―हमें आत्महित करना है इस प्रकार के प्रसंग में अपने को मात्र आत्मा का नाता रखें पार्टी का नहीं, पक्षपात का नहीं । मैं आत्मा हूँ, मुझको अपना भला करना है और उस भले के लिए आचार्य संतों ने जो-जो उपाय बताये उन सब उपायों को एक ज्ञानस्वभाव की दृष्टि से समुचित बनाने का प्रयत्न किया, क्योंकि अभी असहयोग बिना सत्याग्रह काम न देगा । विभावों से हटना और स्वभाव में लगना यह काम करना है । तो विभाव पर है यह बात जैसे स्पष्ट ज्ञान में आये वह उपाय बनायें । स्वभाव मेरा स्वरूप है, यह बात जिस दृष्टि से दृढ़ बने वह उपाय बना, सो है, विषय से हटना स्वभाव में लगने के उपाय वैसे बनायें । और देखो यह मनुष्य जन्म बड़ा कठिन है,―एक अपना ऐसा ही संकुचित भाव न बनायें कि हमने थोड़ी सी बात जान ली कि जीव जीव है और शरीर अजीव है, तो इतने से स्पष्टता न आयेगी । करणानुयोग, चरणानुयोग, प्रथमानुयोग और द्रव्यानुयोग इन चारों अनुयोगों में अपना प्रवेश रखें तो बड़ी प्रेरणा मिलेगी । अत्यंत स्पष्टता नजर आयेगी और भेदविज्ञान सही होगा व अपने आपके स्वरूप की प्राप्ति होगी ।


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