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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 100

From जैनकोष



जीवो ण करेदि घडं णेव पडं णेव सेसगे दव्वे ।

जोगुवओगा उप्पादगा य तेसिं हवदि कत्ता ।। 1॰॰ ꠰꠰

यह जीव घट पट और मकान आदि अनेक द्रव्यों, सभी परद्रव्यों का कर्ता नहीं है, परद्रव्यों को निमित्त रूप से भी जीव का योग और उपयोग करता है, जीव करता नहीं है ।

दृष्टांतपूर्वक आत्मा के परविविवक्तता की सिद्धि―जैसे लोग कहने लगते हैं कि पापी से घृणा मत करो, पाप से घृणा करो क्योंकि पापी का अपराध नहीं है, अपराध पाप का है । इसी प्रकार घड़ा वस्त्र या पेंच पुर्जा जो कुछ भी बनाये जाते हैं वहाँ पर कारीगर का आत्मा कर्ता नहीं है, किंतु कारीगर के आत्मा में जो योग और उपयोग हुआ है, इच्छा हुई है, प्रदेशपरिस्पंद हुआ है वह निमित्त नैमित्तिक रूप से कर्ता है, उपादान रूप से तो न कारीगर का आत्मा कर्ता है, न शरीर कर्ता है, न इच्छा कर्ता है, न ज्ञान कर्ता है । उपादान रूप से तो कुछ भी कर्ता नहीं है । क्या पेंच पुर्जा बनाने पर कारीगर उसका कर्ता हो गया? नहीं । कारीगर अपने में अपना श्रम कर रहा है, पेंच पुर्जे अपने आप में घट बढ़ रहे हैं । कोई किसी में तन्मय नहीं होता । तो व्यापने की दृष्टि से तो यह कर्ता है ही नहीं, किंतु निमित्त नैमित्तिक भावों से भी आत्मा कर्ता नहीं है । जीव के स्वरूप का निमित्त पाकर ये घट पट मकान नहीं बने किंतु जीव में इच्छा हुई, ज्ञान हुआ, प्रदेश परिस्पंद हुआ, भावना हुई, विकार हुआ, उसका निमित्त पाकर धीरे-धीरे परंपरा में वह कार्य होने लगा ।

निमित्त दृष्टि से योग व उपयोग में कर्तृत्व―निमित्त की दृष्टि से भी जीव कर्ता नहीं है, किंतु वहाँ जीव का योग और उपयोग कर्ता है । यह जीवद्रव्य न कर्मों का निमित्तरूप से कर्ता है, न पुद्गल का, न शरीर का, न किसी बाह्य वस्तु का । केवल उनका योग और उपयोग ही उत्पादक है । योग और उपयोग तो अवस्था है और जीव स्वयं द्रव्य है । स्वयं यदि निमित्त रूप से पर का कर्ता बन जाये तो निरंतर पर का कर्ता रहना चाहिये क्योंकि स्वरूप सदा है, किंतु योग उपयोग सदा नहीं रहते अत: किसी वस्तु के करने विषयक योग और उपयोग हो तब वह वस्तु बनी रहती है और योग उपयोग मिट गया तो वह नहीं बनता है । वहीं चाक पड़ा है वही गोला मिट्टी पड़ी है, चाक पर मिट्टी रख दिया । घड़ा बन ही रहा था इतने में घड़ा वाले की उसके बाप से लड़ाई हो गई, बस वह उठकर चला गया और खाट पर पैर पसारकर सो गया । कुम्हार यदि घड़े को बनाता होता तो कुम्हार तो अब भी है, घड़े क्यों नहीं बनते? घड़े के बनाने में कुम्हार निमित्त नहीं है, कुम्हार की क्रिया निमित्त है । अब उसकी क्रिया नहीं हो रही है, वह खाट पर, सो रहा है, घड़े नहीं बन रहे हैं । इसी प्रकार कर्म नोकर्म की रचना में जीव निमित्त नहीं है, किंतु जीव का योग और उपयोग निमित्त है ।

ज्ञानी संत की भद्र दृष्टि―इसी प्रकार निमित्तरूप से देखा जाये तो जीव कर्ता नहीं है, उपादान से भी देखो कर्ता नहीं है । यह ज्ञानी संतपुरुष निज जीवद्रव्य को सर्वथा अकर्ता देखता रहता है । निज जीव को चित्स्वभावमय निर्णय करके इसको अकर्ता तक रहा है । यह अनादि अनंत अहेतुक शुद्ध ज्ञानानंदस्वरूप आत्मतत्त्व किसी भी पर द्रव्य का न तो उपादान से कर्ता है और न निमित्तरूप से कर्ता है । जो ये घट आदिक क्रोधादिक परद्रव्यात्मक कर्म हैं उनकी यह आत्मा व्याप्यव्यापकभाव से कर्ता है ही नहीं, क्योंकि यदि व्याप्यव्यापक भाव से अर्थात् उपादानरूप से या यों कहिए परिणाम परिणामी भाव से कर्ता बन जाये तो आत्मा को परपदार्थमय बनना पड़ेगा । सो यह आत्मा घट आदिक का, और क्रोधादिक का उपादान से तो कर्ता है ही नहीं, पर यह जीव निमित्त नैमित्तिक भाव से परभाव का कर्ता बन जाये तो सदा कार्य होते रहना चाहिये और परद्रव्यों का सदा कर्ता बना रहना चाहिये । सो ऐसा देखा नहीं जाता । इससे सिद्ध है कि यह आत्मा परद्रव्यों का निमित्त नैमित्तिक भाव से भी कर्ता नहीं है । तब कौन कर्ता है इस बात को इस ही गाथा की दूसरी पंक्ति में कहा जाता है ।

विकार का विकार में निमित्तत्व―द्रव्य द्रव्य का कर्ता नहीं होता है । एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का उपादान से भी कर्ता नहीं है और निमित्त से भी कर्ता नहीं है, किंतु एक द्रव्य का विकारी परिणमन दूसरे द्रव्य के विकारी परिणमन का निमित्त होता है । जीवद्रव्य कर्मप्रकृति का निमित्त भी नहीं है । किंतु जीवद्रव्य का योग और उपयोग कर्मबंध का निमित्त होता है तो निमित्तदृष्टि से योग और उपयोग ही कर्ता होता है और उपयोग योग जो है वे हैं आत्मा के विकल्प और व्यापार । योग तो है आत्मा का व्यापार, आत्मा की चेष्टा, प्रदेशपरिस्पंद, क्रिया और उपयोग है आत्मा का विकल्प, सो इनका यह अज्ञान से ही विधाता होता है, कर्ता होता है, अत: यह जब योग और उपयोग है उनके, तब तो जीव को योग और उपयोग का कर्ता कह सकते हैं उपादान दृष्टि से, क्योंकि एक ही द्रव्य में ये विकल्प और व्यापार होते हैं । सो इस आत्मा को योग और उपयोग का करने वाला तो कदाचित् कहा जा सकता है, किंतु परद्रव्यात्मक कार्यों को करने वाला आत्मा को नहीं कहा जा सकता ।

द्रव्य के कर्तृत्व का निषेध―यहां द्रव्य और पर्याय का विश्लेषण करके कथन है । द्रव्य की क्रिया का नाम जीवद्रव्य नहीं है, किंतु वह जीवद्रव्य का योग और उपयोग है । हां योग और उपयोग का जीवद्रव्य कदाचित् कर्ता होता है । नित्य कर्ता तो वह भी नहीं है । जीव के योग और उपयोग होने में उपादान कर्ता तो जीव है और निमित्त है कर्मप्रकृति का अवस्था । कर्मों में जो पुद्गल द्रव्य है वह पुद̖गल द्रव्य जीव के योग और उपयोग का निमित्तरूप से भी कर्ता नहीं है क्योंकि कोई भी द्रव्य किसी भी अन्य द्रव्य का या उनके गुणों का या उनकी पर्यायों का कर्ता नहीं होता । परिणति ही परिणति का निमित्त हुआ करती है । द्रव्य स्वयं निमित्त नहीं होता है ꠰ अभेद विवक्षा में यह कहा जा सकता है कि विकार परिणति से परिणत द्रव्य अन्य द्रव्यों के विकारपरिणति का निमित्त होता है । इस प्रकार यह जीवद्रव्य घट पट आदि का, क्रोधादिक का याने कर्मप्रकृति का न निमित्त से कर्ता है और न उपादान से कर्ता है ।

जीव के कर्तृत्व का विषय―भैया ! जब दोनों दृष्टियों से कर्तृत्व का निषेध किया है तब यहाँ प्रश्न होता है कि तो फिर जीव किसे कहते हैं? उत्तर―यहां जीव में दो प्रकार हैं । एक ज्ञानी जीव और दूसरा अज्ञानी जीव । अज्ञानी जीव किसका कर्ता है और ज्ञानी जीव किसका कर्ता है इन दोनों बातों को क्रम से दो गाथाओं में बतायेंगे । जिसमें यहाँ प्रथम तो यह प्रश्न किया जा रहा है कि ज्ञानी जीव किसका कर्ता है । उत्तर दिया जा रहा है कि ज्ञानी जीव ज्ञान का ही कर्ता होता है ।


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