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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 99

From जैनकोष



चक्षुरुन्मीलित येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।

प्रत्येक संसारी जीव सुख को चाहता है और दु:ख से डरता है और उपाय भी सुख पाने व दुःख से दूर हटने के ख्याल से करता है, किन्तु न अब तक यह सुख पा सका और न दुःख दूर कर सका । आचार्य देव कहते हैं कि सुख पाने के लिए शुद्ध ज्ञानानन्द स्वरूप की उपलब्धि करना चाहिए और दुःख से हटने के लिये भ्रमभाव से मिथ्यात्व भावों से हटना चाहिये ।

जीव के भ्रम का सहयोगी―जीव के अज्ञान का सम्बन्ध मुख्यतया 2 प्रसंगों में होता है । एक तो अपने को परपदार्थों का स्वामी माना और दूसरे परपदार्थों का कर्ता माना । ये दो भ्रम ऐसे हैं कि जीव के स्वरूप पर ये यथार्थतया दृष्टि नहीं डालने देते । इस भ्रम के होने का कुछ सम्बन्ध इसलिए भी हो गया है कि पदार्थ के विकार परिणमन में दूसरे पदार्थ का विकार परिणमन निमित्त होता है । कुछ भी बात न हो और कोई एकदम भ्रम कर बैठे ऐसा तो है नहीं । जीव के विकार का कर्मोदय के साथ निमित्त नैमित्तिक सम्बन्ध है । इस निमित्तनैमित्तिक सम्बन्ध में उपादान की एक विशेषता है कि वह किसी अन्य पदार्थ का निमित्त पाकर स्वयं विकृत परिणम जाता है । वह भी निमित्तनैमित्तिक सम्बन्ध है । इस आधार पर कर्ता कर्म का भाव बन गया । कर्ताकर्मभाव के भ्रम पर ही यह कर्मबन्ध की प्रगति चल रही है ।

ऐसा इस समयसार में एक पृथक् कर्तृ-कर्म भाव का अधिकार देकर स्पष्ट किया है कि एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य के साथ कर्ता कर्म सम्बन्ध नहीं है । सभी द्रव्य अपना-अपना अस्तित्व रखते हैं । यदि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का करने वाला हो जाये तो उस पर क्या आपत्ति है इस बात को अब इस गाथा में कहते हैं ।

जदि सो परदव्वाणि य करिज्ज णियमेण तम्मओ होज्ज ।

जम्हा णा तम्मओ तेण सो ण तेसिं हवदि कत्ता ।।99।।

अंतर्बाह्य दोनों दृष्टियों से कर्तृत्व का निषेध―यदि यह आत्मा पर द्रव्यों को करने लगे तो यह आत्मा परद्रव्यमय हो जावेगा । परंतु परद्रव्यमय आत्मा होता नहीं, क्योंकि आज भी यह आत्मा अपने ही द्रव्य स्वरूप है ꠰ इससे यह सिद्ध होता है कि यह आत्मा पर द्रव्य का कर्ता नहीं है । आत्मा के कर्तृत्व का निषेध दो दृष्टियों से किया जा रहा है । एक तो यह कि यह आत्मा उपादान से पर का कर्ता नहीं है और अगली गाथा में यह बताया जायेगा कि निमित्त नैमित्तिक भाव से भी आत्मा पर का कर्ता नहीं है । उपादान दृष्टि से कर्तृत्व के निषेध के मायने यह है कि यह आत्मा अपनी ही परिणति को पर में सौंपकर पर का परिणमाने वाला होता हो ऐसा नहीं है ꠰ जैसे किसी पुरुष ने गाली दिया और दूसरा पुरुष क्रोध में आ गया तो गाली देने वाले पुरुष ने अपना परिणमन गुस्से वाले में डाला हो ऐसा नहीं दिखता है । गाली देने वाला अपनी ही जगह पर खड़ा हुआ, अपने ही शरीर में, प्रदेश में रहता हुआ मात्र अपना परिणमन कर पाता है । इससे आगे गाली देने वाले ने और कुछ नहीं किया । यह सुनने वाला उस गाली देने वाले के शब्दों का ज्ञान करके और साथ ही अपने बारे में विकल्प मचा करके कि इसने मेरा अपमान किया है, चार आदमियों में इस तरह बोल रहा है अपने ही बारे में अपना विकल्प बनाकर गुस्सा करता है । एक द्रव्य ने अपना परिणमन दूसरे द्रव्य में डालकर कुछ किया हो ऐसा न तो आज तक हुआ, न हो रहा है और न होगा ।

आत्मा की अतिसूक्ष्मता―भैया ! यह आत्मा अमूर्तिक है, रूप, रस, गंध, स्पर्श से रहित है, ज्ञानानंदगुणमय है । भावात्मक यह पदार्थ है । यह भावात्मक चेतन पदार्थ कुछ कर पाता है तो मात्र भावात्मक परिणमन करता है । इसका आकार नहीं, कोई पिंड नहीं, इसकी कोई टक्कर किसी से नहीं होती । किसी अन्य पदार्थ से इसका संबंध नहीं होता । यह तो एक भावात्मक चीज है । यह भावात्मक आत्मा मात्र अपना भाव कर सकता है किसी परद्रव्य को तो छू भी नहीं सकता । जैसे कोई चीज बादलों से पार हो जाये तो बादल से टक्कर नहीं होती क्योंकि वह बादल कठिन पिंडरूप नहीं है, वह भाप रूप है, उससे भी सूक्ष्म धुवां है । धुवां से कोई चीज निकल जाये तो टक्कर नहीं लगती । धुवां से भी सूक्ष्म चीज हवा है । हवा से कोई घन चीज निकल जाये तो उससे मुठभेड़ नहीं होती । उससे भी सूक्ष्म अन्य पौद्गलिक तत्त्व है, उनसे भी ठोस चीज निकल जाये तो कोई आक्रमण नहीं होता है । जगत में जितने भी सूक्ष्म मैटर हैं उनसे भी कई गुणा अत्यंत सूक्ष्म जीव है । यह जीव रूप रस, गंध, स्पर्श से रहित है ऐसा अत्यंत सूक्ष्म ज्ञानानंदमय आत्मा है । यह न शरीर को छूता है न कर्मों को छूता है, न कुटुंब को, न घर को, न पैसों को, किसी को छू नहीं सकता ।

आत्मा की भावमयता―भैया ! यह आत्मा तो सर्वत्र भावात्मक रूप रह रहा है । यह भावात्मक चेतन अपनी ही परिणति से परिणमकर अपने में अपना परिणमन समाप्त कर लेता है । इससे बाहर इसकी गति नहीं है । यह परद्रव्यों को कभी नहीं कर सकता । फिर भी कोई हठ से परद्रव्यों का कर्ता आत्मा को माने तो उसका अर्थ यह है इस उपादान प्रसंग का कि आत्मा परमय हो गया । जो पदार्थ जिस कार्य को करता है, जिस पदार्थ को करता है वह उसमें तन्मय होता है ꠰ अंगुली सीधी है तो अंगुली सीधी में तन्मय है । ऐसा नहीं है कि सीधापन अलग पड़ा हो और अंगुली अलग रखी हो । अंगुली-अंगुली को टेढ़ी कर दे तो अंगुली टेढ़ी में तन्मय है । ऐसा नहीं है कि वह टेढ़ी अलग रखी हुई हो और यह अंगुली अलग रखी हो । अंगुली ही टेढ़ी अवस्था में परिणत होती है । अत: अंगुली टेढ़ी है । अंगुली को अंगुली ने टेढ़ी किया इसका अर्थ यह है कि समस्त अंगुली इस समय टेढ़मय है ।

आत्मा की परद्रव्यमयता का निषेध―जो जिसको करता है वह उसमें तन्मय होता है । यदि यह जीव किसी परद्रव्य को, कर्मों को अन्य पदार्थों को करे तो इसका अर्थ है कि यह आत्मा परद्रव्यमय हो गया । पर कहीं दिखता भी है कि कोई आत्मा परद्रव्यमय हो गया हो । जब आत्मा परद्रव्यमय नहीं होता है तो इससे सिद्ध होता है कि आत्मा परद्रव्यों का कर्ता नहीं है । यदि यह आत्मा परद्रव्यमय कर्मों को करता होता तो एक नियम है कि परिणाम और परिणामी भाव भिन्न-भिन्न पदार्थों में नहीं हुआ करते । अथवा आत्मा परद्रव्यों को करने लगे तो परिणाम और परिणामी भाव का अभाव ही हो जायेगा । इस कारण खुदरूप तो परिणमा नहीं, खुद बन बैठा दूसरे रूप, किंतु ऐसा होता नहीं । प्रत्येक द्रव्य परिणमनशील है, अपने आपके प्रदेश में, अपने आपकी शक्ति से ही परिणमता है । इस कारण यह सिद्ध है कि यदि यह आत्मा परद्रव्यात्मक कार्यों को करे तो उसको परद्रव्यमय हो जाना चाहिये किंतु ऐसा कभी होता नहीं ।

परद्रव्यमयता में स्व का उच्छेद―भैया ! कोई कहे कि हो जाय परद्रव्यमय आत्मा; हमारा क्या जाता, बात तो रह जायेगी । कहते हैं कि कोई पदार्थ परद्रव्यमय है तो उस पदार्थ का ही विनाश हो गया । इस कारण आत्मा व्यापक भाव से परद्रव्यों का कर्ता नहीं है, परिणाम परिणामी भाव से परद्रव्यों का कर्ता नहीं है, आत्मा अपने आपको ही करता है, चाहे जिस रूप से करे । परद्रव्य, परद्रव्य को ही करता है चाहे किसी भी रूप करे । आत्मा परद्रव्यों का कर्ता कदाचित् भी नहीं है । यह निश्चय दृष्टि का कथन चल रहा है । निश्चय दृष्टि में द्रव्य केवल दिख जाया करते हैं केवल एक पदार्थ को देखा तो वह एक दिख रहा है और यह भी दिख रहा है कि यह निरंतर परिणमता जाता है । जो परिणमता है वह तो उसका कार्य और जो परिणम गया वह है कर्ता ।

अन्योन्यकर्तृत्व का निषेध―कर्ताकर्मभाव एक का दूसरे पदार्थ में नहीं होता । परंतु संसार में रुलाने का कारण यह है कि बुद्धि में यह बैठा हुआ है कि मैं किसी परद्रव्य को कर देता हूँ, मैं मकान बनवाता हूँ, मैं दुकान चलाता हूँ, मैं घर के इतने आदमियों को पालता पोषता हूँ, मैं इतने गरीबों की रक्षा किया करता हूँ इत्यादि नाना प्रकार की परद्रव्यों में कर्तृत्व बुद्धि लगी है । किंतु जैसे तुम भगवत्स्वरूप हो इसी प्रकार ये गरीब लोग भी, व्यवहार में आश्रय लेने वाले लोग भी भगवत्स्वरूप हैं । और इतना ही नहीं है, ये कीड़े मकोड़ों के भव में रहने वाले जीव भी भगवत्स्वरूप हैं । ये पेड़-पौधे जो खड़े हैं, जो अत्यंत लाचार हैं इन्हें कोई तोड़ ले, काट ले, बना ले, छेद ले, अपनी ओर से ये जरा भी हरकत नहीं कर सकते हैं, ये भी भगवतस्वरूप हैं । पर इन जीवों की अपनी-अपनी भ्रांति और करतूत का यह फल है कि कोई किसी हीन अवस्था में, कोई किसी हीन अवस्था में रह कर क्लेश भोग रहा है ।

स्वभाव की अपरिणामिता―कोई भी जीव हो हीन अवस्था में आत्मा किंतु स्वभाव कभी नहीं बदला जा सकता है । स्वभाव स्वभाव ही रहेगा । यह ज्ञायक स्वभाव यह चैतन्यभाव उनका यह वही है जो सिद्ध प्रभु का है । अंतर केवल विकाश में है । कहो आज जो पेड़ के रूप में खड़ा है 20 साल बाद यह मोक्ष में पहुँच जाये । कोई आश्चर्य नहीं है । मनुष्य भव पाये और 20 साल तो बहुत अधिक हैं, 8 वर्ष बाद कहो मोक्षमार्ग में लग जाये और थोड़े ही दिनों बाद केवली बन जाये । हम किस जीव को हीन समझें और संसार के नाते से हम किसको बड़ा समझें । आज जिसे बहुत बड़ा माना जाता है कहो दो मिनट बाद उसे नर्क में पड़ा हुआ जान सकते हैं । तो यहाँ किसे छोटा माना जाये और किसे बड़ा माना जाये ।

सर्वजीवों में शक्ति की समानता―भैया ! शक्ति की सर्वजीवों में समानता है । असंख्य जीवों में भी केवल ज्ञान की शक्ति पड़ी हुई है । यदि अभव्य में केवलज्ञान की शक्ति न हो तो द्रव्य 6 तरह के न होकर 7 तरह के बन जाते । यों जीव के तो दो हिस्से हो जाते और पदार्थ 6 की जगह पर 7 तरह के हो जाते । केवलज्ञान की शक्ति के अभाव से ये अभव्य जीव नहीं कहलाते, किंतु शक्ति की व्यक्ति कभी भी न हो सकने से, शक्ति की व्यक्ति की शक्ति न होने से इनको अभव्य कहा जाता है । जैसे केवलज्ञानावरण कर्म भव्य जीवों पर लगे हुए हैं, इसी प्रकार केवलज्ञानावरण अभव्य जीवों पर भी लगे हुए हैं । यदि अभव्य जीवों में केवलज्ञान की शक्ति न हो तो अभव्य जीव में ज्ञानावरण के लदने की क्या आवश्यकता थी । वहाँ डर ही न था कि यह केवली बन जायेगा । तो केवलज्ञानावरण कर्म क्यों बंधते । जगत के सर्व जीवों में एक ही स्वभाव है―चित्स्वभाव ।

जीव का स्वरूप भैया ! चित्स्वभाव को जब निरखा जाता है तो वहाँ संसार और मोक्ष भी नहीं देखा जाता है । जीव के स्वरूप को यदि देखो तो वहाँ न संसार है, न मोक्ष है । संसार और मोक्ष तो एक प्रक्रियाएं हैं, स्वरूप नहीं है । स्वरूप तो अपना जीव का चित्स्वभाव है निश्चयक सीमा में । व्यवहार से भी देखो तो यह जीव अपने आपका ही कर्ता है, किसी अन्य पदार्थ का कर्ता नहीं है । प्रत्येक पदार्थ अपने आपके ही परिणमन का कर्ता होता है, किसी भी परद्रव्य का कर्ता नहीं होता । इसी प्रकार चूंकि यह जीव सहजशुद्ध स्वाभाविक ज्ञानानंदस्वरूप को छोड़कर परद्रव्यों के साथ तन्मय नहीं होता, इस कारण यह आत्मा उन परद्रव्यों का उपादानरूप से कर्ता नहीं होता ।अब यह बतलाते हैं कि आत्मा परद्रव्यों का उपादान रूप से तो कर्ता है ही नहीं, किंतु निमित्त नैमित्तिक भाव से भी आत्मा परद्रव्य का कर्ता नहीं है ।



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