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महाबल: Difference between revisions

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== सिद्धांतकोष से ==

== सिद्धांतकोष से ==
<ol>
<ol>
  <li> असुर जातीय एक भवनवासी देव–देखें [[ असुर ]]। </li>
<li> <p class="HindiText"> असुर जातीय एक भवनवासी देव–देखें [[ असुर ]]। </p></li>
   <li> ( महापुराण / सर्ग/श्लोक)–राजा अतिबल का पुत्र था।(4/133)। राज्य प्राप्त किया।(4/159)।  जन्मोत्सव के अवसर पर अपने मन्त्री स्वयंबुद्ध द्वारा जीव के अस्तित्व की सिद्धि  सुनकर आस्तिक हुआ।(5/87)। स्वयंबुद्ध मन्त्री को आदित्यगति नामक मुनिराज ने बताया  था कि ये दसवें भव में भरत क्षेत्र के प्रथम तीर्थंकर होंगे।(5/200)। मन्त्री के  मुख से अपने स्वप्नों के फल में अपनी आयु का निकट में क्षय जानकर समाधि धारण की।(5/226,230)। 22 दिन की सल्लेखनापूर्वक शरीर छोड़ (5/248-250)।  ईशान स्वर्ग में ललितांग नामक देव हुए।(5/253-254)। यह  ऋषभदेव का पूर्व भव नं. 9 है–देखें [[ ऋषभदेव ]]।</li>
   <li>  <p class="HindiText"><span class="GRef">( महापुराण / सर्ग/श्लोक)</span>–राजा अतिबल का पुत्र था।(4/133)। राज्य प्राप्त किया।(4/159)।  जन्मोत्सव के अवसर पर अपने मंत्री स्वयंबुद्ध द्वारा जीव के अस्तित्व की सिद्धि  सुनकर आस्तिक हुआ।(5/87)। स्वयंबुद्ध मंत्री को आदित्यगति नामक मुनिराज ने बताया  था कि ये दसवें भव में भरत क्षेत्र के प्रथम तीर्थंकर होंगे।(5/200)। मंत्री के  मुख से अपने स्वप्नों के फल में अपनी आयु का निकट में क्षय जानकर समाधि धारण की।(5/226,230)। 22 दिन की सल्लेखनापूर्वक शरीर छोड़ (5/248-250)।  ईशान स्वर्ग में ललितांग नामक देव हुए।(5/253-254)। यह  ऋषभदेव का पूर्व भव नं. 9 है–देखें [[ ऋषभदेव ]]।</p></li>
   <li>  महापुराण/50/ श्लोक–मंगलावती देश का राजा था।(2-3)। विमलवाहन मुनि से दीक्षा ले 11 अंग  का पाठी हो तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया।(10-12)। समाधिमरणपूर्वक विजय नामक  अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र हुआ।(13)। यह अभिनन्दन्नाथ भगवान् का पूर्व भव वं.  2 है।  </li>
   <li>  <p class="HindiText"><span class="GRef"> महापुराण/50/ श्लोक</span>–मंगलावती देश का राजा था।(2-3)। विमलवाहन मुनि से दीक्षा ले 11 अंग  का पाठी हो तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया।(10-12)। समाधिमरणपूर्वक विजय नामक  अनुत्तर विमान में अहमिंद्र हुआ।(13)। यह अभिनंदंनाथ भगवान् का पूर्व भव वं.  2 है। </p> </li>
   <li> ( महापुराण /60/ श्लोक) पूर्व विदेह के  नन्दन नगर का राजा था।(58)। दीक्षाधार।(61)। संन्यास मरणपूर्वक सहस्रार स्वर्ग में  देव हुआ।(62)। यह सुप्रभ नामक बलभद्र का पूर्व भव नं. 2 है। </li>
   <li>  <p class="HindiText"><span class="GRef">( महापुराण /60/ श्लोक)</span> पूर्व विदेह के  नंदन नगर का राजा था।(58)। दीक्षाधार।(61)। संन्यास मरणपूर्वक सहस्रार स्वर्ग में  देव हुआ।(62)। यह सुप्रभ नामक बलभद्र का पूर्व भव नं. 2 है।</p> </li>
   <li> नेमिनाथपुराण के  रचयिता एक जैन कवि। समय–(ई. 1242)–(वरांगचरित्र/ प्र. 23/पं. खुशालचन्द)</li>
   <li> <p class="HindiText"> नेमिनाथपुराण के  रचयिता एक जैन कवि। समय–(ई. 1242)–(वरांगचरित्र/ प्र. 23/पं. खुशालचंद)</p></li>
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== पुराणकोष से ==
== पुराणकोष से ==
  <p id="1"> (1) तीर्थंकर वृषभदेव के नौवें पूर्वभव का जीव-विजयार्ध पर्वत पर स्थित अलकापुरी के राजा अतिबल और उसकी रानी मनोहरा का पुत्र । राजा अतिबल ने राजोचित गुण देखकर इसे युवराज पद दिया था । मंत्री स्वयंबुद्ध द्वारा प्रतिपादित जीव के अस्तित्व की सिद्धि सुनकर इसने आत्मा का पृथक् और स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकार किया था । अवधिज्ञानी आदित्यगति ने इसे आगामी दसवें भव में तीर्थंकर पद की प्राप्ति होने की भविष्यवाणी की थी तथा कहा था कि जम्बूदीप के भरतक्षेत्र में यह प्रथम तीर्थंकर होगा । मुनि आदित्यगति से अपनी एक मास की आयु शेष जानकर इसने अपने पुत्र अतिबल को राज्य दे दिया और सन्यास धारण कर लिया था । आयु के अन्त में यह निरन्तर बाईस दिन तक सल्लेखना में रत रहा और शरीर छोडकर ऐशान स्वर्ग के श्रीप्रभ विमान में ललितांग देव हुआ । पूर्वभव में यह जम्बूद्वीप के विदेहक्षेत्र में गन्धिल देश के सिहर नगर के राजा श्रीषेण का जयवर्मा पुत्र था । राज्य दिये जाने में पिता की उपेक्षा से इसे वैराग्य हुआ और विद्याधरों के भोग की प्राप्ति की निदान करके यह सर्पदंश से मरकर महाबल हुआ था । <span class="GRef"> महापुराण 4.133, 138, 151, 159, 5.86, 200, 211, 221, 226, 228-229, 248-254,  </span><span class="GRef"> हरिवंशपुराण 60.18-19 </span></p>
<div class="HindiText"> <p id="1" class="HindiText"> (1) तीर्थंकर वृषभदेव के नौवें पूर्वभव का जीव-विजयार्ध पर्वत पर स्थित अलकापुरी के राजा अतिबल और उसकी रानी मनोहरा का पुत्र । राजा अतिबल ने राजोचित गुण देखकर इसे युवराज पद दिया था । मंत्री स्वयंबुद्ध द्वारा प्रतिपादित जीव के अस्तित्व की सिद्धि सुनकर इसने आत्मा का पृथक् और स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकार किया था । अवधिज्ञानी आदित्यगति ने इसे आगामी दसवें भव में तीर्थंकर पद की प्राप्ति होने की भविष्यवाणी की थी तथा कहा था कि जंबूदीप के भरतक्षेत्र में यह प्रथम तीर्थंकर होगा । मुनि आदित्यगति से अपनी एक मास की आयु शेष जानकर इसने अपने पुत्र अतिबल को राज्य दे दिया और सन्यास धारण कर लिया था । आयु के अंत में यह निरंतर बाईस दिन तक सल्लेखना में रत रहा और शरीर छोडकर ऐशान स्वर्ग के श्रीप्रभ विमान में ललितांग देव हुआ । पूर्वभव में यह जंबूद्वीप के विदेहक्षेत्र में गंधिल देश के सिहर नगर के राजा श्रीषेण का जयवर्मा पुत्र था । राज्य दिये जाने में पिता की उपेक्षा से इसे वैराग्य हुआ और विद्याधरों के भोग की प्राप्ति की निदान करके यह सर्पदंश से मरकर महाबल हुआ था । <span class="GRef"> महापुराण 4.133, 138, 151, 159, 5.86, 200, 211, 221, 226, 228-229, 248-254,  </span><span class="GRef"> [[ग्रन्थ:हरिवंश पुराण_-_सर्ग_60#18|हरिवंशपुराण - 60.18-19]] </span></p>
<p id="2">(2) एक यादव कुमार । <span class="GRef"> हरिवंशपुराण 50.125 </span></p>
<p id="2" class="HindiText">(2) एक यादव कुमार । <span class="GRef"> [[ग्रन्थ:हरिवंश पुराण_-_सर्ग_50#125|हरिवंशपुराण - 50.125]] </span></p>
<p id="3">(3) सूर्यवंशी राजा सुबल का पुत्र और अतिबल का पिता । <span class="GRef"> महापुराण 5.5,  </span><span class="GRef"> हरिवंशपुराण 13.8 </span></p>
<p id="3" class="HindiText">(3) सूर्यवंशी राजा सुबल का पुत्र और अतिबल का पिता । <span class="GRef"> महापुराण 5.5,  </span><span class="GRef"> [[ग्रन्थ:हरिवंश पुराण_-_सर्ग_13#8|हरिवंशपुराण - 13.8]] </span></p>
<p id="4">(4) चन्द्रवंशी राजा सोमयश का पुत्र और सुबल का पिता । <span class="GRef"> पद्मपुराण 5. 11-12,  </span><span class="GRef"> हरिवंशपुराण 13. 16-17 </span></p>
<p id="4" class="HindiText">(4) चंद्रवंशी राजा सोमयश का पुत्र और सुबल का पिता । <span class="GRef"> [[ग्रन्थ:पद्मपुराण_-_पर्व_5#11|पद्मपुराण - 5.11-12]],  </span><span class="GRef"> [[ग्रन्थ:हरिवंश पुराण_-_सर्ग_13#16|हरिवंशपुराण - 13.16-17]] </span></p>
<p id="5">(5) वृषभदेव के छियासठवें गणधर । <span class="GRef"> हरिवंशपुराण 12. 66 </span></p>
<p id="5" class="HindiText">(5) वृषभदेव के छियासठवें गणधर । <span class="GRef"> [[ग्रन्थ:हरिवंश पुराण_-_सर्ग_12#66|हरिवंशपुराण - 12.66]] </span></p>
<p id="6">(6) तीर्थंकर-मुनिसुव्रत के एक गणधर । <span class="GRef"> महापुराण 67. 119 </span></p>
<p id="6" class="HindiText">(6) तीर्थंकर-मुनिसुव्रत के एक गणधर । <span class="GRef"> महापुराण 67. 119 </span></p>
<p id="7">(7) उत्सर्पिणी काल का छठा नारायण । <span class="GRef"> महापुराण 76.488 </span></p>
<p id="7" class="HindiText">(7) उत्सर्पिणी काल का छठा नारायण । <span class="GRef"> महापुराण 76.488 </span></p>
<p id="8">(8) नाकार्धपुर के राजा मनोजव ओर रानी वेगिनी का पुत्र । आदित्यपुर के राजा विद्यामन्दर विद्याधर की पुत्री श्रीमाला के स्वयंवर में यह सम्मिलित हुआ था । <span class="GRef"> पद्मपुराण 6. 357-358, 415-416  </span></p>
<p id="8" class="HindiText">(8) नाकार्धपुर के राजा मनोजव ओर रानी वेगिनी का पुत्र । आदित्यपुर के राजा विद्यामंदर विद्याधर की पुत्री श्रीमाला के स्वयंवर में यह सम्मिलित हुआ था । <span class="GRef"> [[ग्रन्थ:पद्मपुराण_-_पर्व_6#357|पद्मपुराण - 6.357-358]], 415-416  </span></p>
<p id="9">(9) चौथे बलभद्र सुप्रभ के पूर्वजन्म का नाम । <span class="GRef"> पद्मपुराण 20. 232  </span></p>
<p id="9" class="HindiText">(9) चौथे बलभद्र सुप्रभ के पूर्वजन्म का नाम । <span class="GRef"> [[ग्रन्थ:पद्मपुराण_-_पर्व_20#232|पद्मपुराण - 20.232]] </span></p>
<p id="10">(10) राम का पक्षधर एक विद्याधर राजा । इसने व्याघ्ररथ पर आसीन होकर युद्ध किया था । <span class="GRef"> पद्मपुराण 58.4 </span></p>
<p id="10">(10) राम का पक्षधर एक विद्याधर राजा । इसने व्याघ्ररथ पर आसीन होकर युद्ध किया था । <span class="GRef"> [[ग्रन्थ:पद्मपुराण_-_पर्व_58#4|पद्मपुराण - 58.4]] </span></p>
<p id="11">(11) धातकीखण्ड द्वीप के पूर्व विदेहक्षेत्र में पुष्कलावती देश की पुण्डरीकिणी नगरी के राजा धनंजय और रानी जयसेना का पुत्र । नारायण अतिबल इसका छोटा भाई था । अतिबल की आयु पूर्ण हो जाने पर इसने समाधिगुप्त मुनिराज के पास दीक्षा लेकर अनेक तप तपे थे । आयु के अन्त में शरीर छोड़कर यह प्राणत स्वर्ग में इन्द्र हुआ । <span class="GRef"> महापुराण 7.80-83 </span></p>
<p id="11">(11) धातकीखंड द्वीप के पूर्व विदेहक्षेत्र में पुष्कलावती देश की पुंडरीकिणी नगरी के राजा धनंजय और रानी जयसेना का पुत्र । नारायण अतिबल इसका छोटा भाई था । अतिबल की आयु पूर्ण हो जाने पर इसने समाधिगुप्त मुनिराज के पास दीक्षा लेकर अनेक तप तपे थे । आयु के अंत में शरीर छोड़कर यह प्राणत स्वर्ग में इंद्र हुआ । <span class="GRef"> महापुराण 7.80-83 </span></p>
<p id="12">(12) अच्युत स्वर्ग का एक देव । पूर्वभव में यह जम्बूद्वीप के पूर्वविदेहक्षेत्र में वत्सकावती देश के पृथ्वीनगर का नृप था । जयसेना इसकी रानी और रतिषेण तथा घृतिषेण पुत्र थे । <span class="GRef"> महापुराण 48. 58-59, 68 </span></p>
<p id="12">(12) अच्युत स्वर्ग का एक देव । पूर्वभव में यह जंबूद्वीप के पूर्वविदेहक्षेत्र में वत्सकावती देश के पृथ्वीनगर का नृप था । जयसेना इसकी रानी और रतिषेण तथा घृतिषेण पुत्र थे । <span class="GRef"> महापुराण 48. 58-59, 68 </span></p>
<p id="13">(13) जम्बूद्वीप के पूर्वविदेहक्षेत्र में सीता नदी के दक्षिणी तट पर स्थित मंगलावती देश में रत्नसंचयनगर का नृप । इसने अपने पुत्र धनपाल को राज्य देकर विमलवाहन गुरु के पास संयम धारण कर लिया था । पश्चात् यह ग्यारह अंग का पाठी हुआ । सोलह कारण भावनाओं के चिन्तन से तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध कर आयु के अन्त में इसने समाधिमरण पूर्वक देह त्यागी और विजय नामक प्रथम अनुत्तर में अहमिन्द्र हुआ । <span class="GRef"> महापुराण 50. 2-3, 10-13, 21-22, 69  </span></p>
<p id="13">(13) जंबूद्वीप के पूर्वविदेहक्षेत्र में सीता नदी के दक्षिणी तट पर स्थित मंगलावती देश में रत्नसंचयनगर का नृप । इसने अपने पुत्र धनपाल को राज्य देकर विमलवाहन गुरु के पास संयम धारण कर लिया था । पश्चात् यह ग्यारह अंग का पाठी हुआ । सोलह कारण भावनाओं के चिंतन से तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर आयु के अंत में इसने समाधिमरण पूर्वक देह त्यागी और विजय नामक प्रथम अनुत्तर में अहमिंद्र हुआ । <span class="GRef"> महापुराण 50. 2-3, 10-13, 21-22, 69  </span></p>
<p id="14">(14) बलभद्र सुप्रभ के दूसरे पूर्वभव का जीव-जम्बूद्वीप के पूर्व विदेहक्षेत्र में नन्दन नगर का नृप । शरीर आदि के नश्वर स्वरूप का बोध हो जाने से इसने पुत्र को राज्य देकर अर्हन्त प्रजापाल से संयम धारण कर के सिंहनिष्क्रीडित तप किया । अन्त में यह संन्यास मरण करके सहस्रार स्वर्ग में देव हुआ । <span class="GRef"> महापुराण 60.58-62 </span></p>
<p id="14">(14) बलभद्र सुप्रभ के दूसरे पूर्वभव का जीव-जंबूद्वीप के पूर्व विदेहक्षेत्र में नंदन नगर का नृप । शरीर आदि के नश्वर स्वरूप का बोध हो जाने से इसने पुत्र को राज्य देकर अर्हंत प्रजापाल से संयम धारण कर के सिंहनिष्क्रीडित तप किया । अंत में यह संन्यास मरण करके सहस्रार स्वर्ग में देव हुआ । <span class="GRef"> महापुराण 60.58-62 </span></p>
<p id="15">(15) कौशाम्बी नगरी का राजा । इसकी श्रीमती नाम की रानी और श्रीकान्ता नाम की पुत्री थी । इसने श्रीकान्ता का विवाह इन्द्रसेन से किया था । श्रीकान्ता के साथ इसने अनन्तमति नाम की एक दासी भी भेजी थी । इस दासी के कारण इन्द्रसेन और उसके भाई उपेन्द्रसेन में युद्ध होने की तैयारी सुनकर यह उन्हें रोकने गया किन्तु रोकने असमर्थ रहने से विष-पुष्प सूंघकर मर गया था । <span class="GRef"> महापुराण 62. 351-355,  </span><span class="GRef"> पांडवपुराण 4.207-212 </span></p>
<p id="15">(15) कौशांबी नगरी का राजा । इसकी श्रीमती नाम की रानी और श्रीकांता नाम की पुत्री थी । इसने श्रीकांता का विवाह इंद्रसेन से किया था । श्रीकांता के साथ इसने अनंतमति नाम की एक दासी भी भेजी थी । इस दासी के कारण इंद्रसेन और उसके भाई उपेंद्रसेन में युद्ध होने की तैयारी सुनकर यह उन्हें रोकने गया किंतु रोकने असमर्थ रहने से विष-पुष्प सूंघकर मर गया था । <span class="GRef"> महापुराण 62. 351-355,  </span><span class="GRef"> पांडवपुराण 4.207-212 </span></p>
<p id="16">(16) एक केवली । ये तीर्थंकर नेमिनाथ के दूसरे पूर्वभव के जीव श्रीदत्त के पिता सिद्धार्थ के दीक्षा गुरु थे । <span class="GRef"> महापुराण 69. 12-14 </span></p>
<p id="16">(16) एक केवली । ये तीर्थंकर नेमिनाथ के दूसरे पूर्वभव के जीव श्रीदत्त के पिता सिद्धार्थ के दीक्षा गुरु थे । <span class="GRef"> महापुराण 69. 12-14 </span></p>
<p id="17">(17) बंग देश के कान्तपुर नगर के राजा सुवर्णवर्मा और रानी विद्युल्लेखा का पुत्र । इसका लालन-पालन मामा के यहाँ चम्पानगरी में हुआ था । पूर्व निश्चयानुसार मामा की पुत्री कनकलता से इसका विवाह होने ही वाला था कि विवाह के पूर्व ही दोनों का समागम हो गया । इससे लज्जित होकर दोनों कान्तपुर गये किन्तु इसके पिता ने इसे दूसरे देश जाने के लिए कहा । ये दोनों प्रत्यन्तनगर में रहने लगे । इन दोनों ने मुनिगुप्त मुनि को आहार देकर पुण्य संचय किया । वन में घूमते हुए किसी विषैले सर्प द्वारा इसे काटे जाने से यह वन में ही मर गया था । पति को मृत देखकर इसकी स्त्री कनकलता ने भी तलवार से आत्मघात कर लिया । <span class="GRef"> महापुराण 75.82-94 </span></p>
<p id="17">(17) बंग देश के कांतपुर नगर के राजा सुवर्णवर्मा और रानी विद्युल्लेखा का पुत्र । इसका लालन-पालन मामा के यहाँ चंपानगरी में हुआ था । पूर्व निश्चयानुसार मामा की पुत्री कनकलता से इसका विवाह होने ही वाला था कि विवाह के पूर्व ही दोनों का समागम हो गया । इससे लज्जित होकर दोनों कांतपुर गये किंतु इसके पिता ने इसे दूसरे देश जाने के लिए कहा । ये दोनों प्रत्यंतनगर में रहने लगे । इन दोनों ने मुनिगुप्त मुनि को आहार देकर पुण्य संचय किया । वन में घूमते हुए किसी विषैले सर्प द्वारा इसे काटे जाने से यह वन में ही मर गया था । पति को मृत देखकर इसकी स्त्री कनकलता ने भी तलवार से आत्मघात कर लिया । <span class="GRef"> महापुराण 75.82-94 </span></p>
<p id="18">(18) एक असुर । पूर्वभव में यह अश्वग्रीव का रत्नायुध नामक पुत्र था । <span class="GRef"> महापुराण 63. 135-136 </span></p>
<p id="18">(18) एक असुर । पूर्वभव में यह अश्वग्रीव का रत्नायुध नामक पुत्र था । <span class="GRef"> महापुराण 63. 135-136 </span></p>
<p id="19">(19) राजा दशरथ का सेनापति । इसने यज्ञ में होने वाले पुण्य-पाप की उपेक्षा कर यज्ञ में राम और लक्ष्मण दोनों कुमारों का प्रभाव दिखलाना श्रेयस्कर माना था । <span class="GRef"> महापुराण 67.463-464 </span></p>
<p id="19">(19) राजा दशरथ का सेनापति । इसने यज्ञ में होने वाले पुण्य-पाप की उपेक्षा कर यज्ञ में राम और लक्ष्मण दोनों कुमारों का प्रभाव दिखलाना श्रेयस्कर माना था । <span class="GRef"> महापुराण 67.463-464 </span></p>
<p id="20">(20) पलाशद्वीप सम्बन्धी पलाशपुर नगर का राजा । इसकी रानी कांचनलता तथा पुत्री पद्मलता थी । इसे इसके भागीदार ने तलवार से मार डाला था । <span class="GRef"> महापुराण 75.97-98, 118-120 </span></p>
<p id="20">(20) पलाशद्वीप संबंधी पलाशपुर नगर का राजा । इसकी रानी कांचनलता तथा पुत्री पद्मलता थी । इसे इसके भागीदार ने तलवार से मार डाला था । <span class="GRef"> महापुराण 75.97-98, 118-120 </span></p>
<p id="21">(21) सौधर्मेन्द्र द्वारा स्तुत वृषभदेव का एक नाम । <span class="GRef"> महापुराण 25. 152 </span></p>
<p id="21">(21) सौधर्मेंद्र द्वारा स्तुत वृषभदेव का एक नाम । <span class="GRef"> महापुराण 25. 152 </span></p>
<p id="22">(22) सगर चक्रवर्ती के दूसरे पूर्वभव का जीव । <span class="GRef"> महापुराण 48.143  </span></p>
<p id="22">(22) सगर चक्रवर्ती के दूसरे पूर्वभव का जीव । <span class="GRef"> महापुराण 48.143  </span></p>
<p id="23">(23) अनागत छठा नारायण । <span class="GRef"> महापुराण 76. 488 </span></p>
<p id="23">(23) अनागत छठा नारायण । <span class="GRef"> महापुराण 76. 488 </span></p>
<p id="1"> (24) जम्बूद्वीप के पूर्व विदेहक्षेत्र में पुष्कलावती देश की पुण्डरीकिणी नगरी के राजा वज्रसेन का पुत्र । यह पूर्वभव में महाबल राजा का आनन्द नामक पुरोहित था । यह मरकर सवार्थसिद्धि में अहमिन्द्र हुआ था । <span class="GRef"> महापुराण 11. 9, 12, 160 </span></p>
<p id="1" class="HindiText"> (24) जंबूद्वीप के पूर्व विदेहक्षेत्र में पुष्कलावती देश की पुंडरीकिणी नगरी के राजा वज्रसेन का पुत्र । यह पूर्वभव में महाबल राजा का आनंद नामक पुरोहित था । यह मरकर सवार्थसिद्धि में अहमिंद्र हुआ था । <span class="GRef"> महापुराण 11. 9, 12, 160 </span></p>
<p id="2">(25) विद्याधर विनमि का पुत्र । <span class="GRef"> हरिवंशपुराण 22.105 </span></p>
<p id="2" class="HindiText">(25) विद्याधर विनमि का पुत्र । <span class="GRef"> [[ग्रन्थ:हरिवंश पुराण_-_सर्ग_22#105|हरिवंशपुराण - 22.105]] </span></p>
<p id="3">(26) जरासन्ध का पुत्र । <span class="GRef"> हरिवंशपुराण 52.34 </span></p>
<p id="3" class="HindiText">(26) जरासंध का पुत्र । <span class="GRef"> [[ग्रन्थ:हरिवंश पुराण_-_सर्ग_52#34|हरिवंशपुराण - 52.34]] </span></p>
<p id="4">(27) राजा धृतराष्ट्र और रानी गान्धारी का अड़तीसवाँ पुत्र । <span class="GRef"> पांडवपुराण 8.197 </span></p>
<p id="4" class="HindiText">(27) राजा धृतराष्ट्र और रानी गांधारी का अड़तीसवाँ पुत्र । <span class="GRef"> पांडवपुराण 8.197 </span></p>
<p id="5">(28) राक्षसवंशी एक विद्याधर । यह लंका का राजा था । <span class="GRef"> पद्मपुराण 5.397 </span></p>
<p id="5" class="HindiText">(28) राक्षसवंशी एक विद्याधर । यह लंका का राजा था । <span class="GRef"> [[ग्रन्थ:पद्मपुराण_-_पर्व_5#397|पद्मपुराण -5. 397]] </span></p>
  </div>


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[[Category: पुराण-कोष]]
[[Category: पुराण-कोष]]
[[Category: म]]
[[Category: म]]
[[Category: प्रथमानुयोग]]
[[Category: करणानुयोग]]
[[Category: इतिहास]]

Latest revision as of 15:20, 27 November 2023



सिद्धांतकोष से

  1. असुर जातीय एक भवनवासी देव–देखें असुर ।

  2. ( महापुराण / सर्ग/श्लोक)–राजा अतिबल का पुत्र था।(4/133)। राज्य प्राप्त किया।(4/159)। जन्मोत्सव के अवसर पर अपने मंत्री स्वयंबुद्ध द्वारा जीव के अस्तित्व की सिद्धि सुनकर आस्तिक हुआ।(5/87)। स्वयंबुद्ध मंत्री को आदित्यगति नामक मुनिराज ने बताया था कि ये दसवें भव में भरत क्षेत्र के प्रथम तीर्थंकर होंगे।(5/200)। मंत्री के मुख से अपने स्वप्नों के फल में अपनी आयु का निकट में क्षय जानकर समाधि धारण की।(5/226,230)। 22 दिन की सल्लेखनापूर्वक शरीर छोड़ (5/248-250)। ईशान स्वर्ग में ललितांग नामक देव हुए।(5/253-254)। यह  ऋषभदेव का पूर्व भव नं. 9 है–देखें ऋषभदेव ।

  3. महापुराण/50/ श्लोक–मंगलावती देश का राजा था।(2-3)। विमलवाहन मुनि से दीक्षा ले 11 अंग का पाठी हो तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया।(10-12)। समाधिमरणपूर्वक विजय नामक अनुत्तर विमान में अहमिंद्र हुआ।(13)। यह अभिनंदंनाथ भगवान् का पूर्व भव वं. 2 है। 

  4. ( महापुराण /60/ श्लोक) पूर्व विदेह के नंदन नगर का राजा था।(58)। दीक्षाधार।(61)। संन्यास मरणपूर्वक सहस्रार स्वर्ग में देव हुआ।(62)। यह सुप्रभ नामक बलभद्र का पूर्व भव नं. 2 है।

  5. नेमिनाथपुराण के रचयिता एक जैन कवि। समय–(ई. 1242)–(वरांगचरित्र/ प्र. 23/पं. खुशालचंद)


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पुराणकोष से

(1) तीर्थंकर वृषभदेव के नौवें पूर्वभव का जीव-विजयार्ध पर्वत पर स्थित अलकापुरी के राजा अतिबल और उसकी रानी मनोहरा का पुत्र । राजा अतिबल ने राजोचित गुण देखकर इसे युवराज पद दिया था । मंत्री स्वयंबुद्ध द्वारा प्रतिपादित जीव के अस्तित्व की सिद्धि सुनकर इसने आत्मा का पृथक् और स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकार किया था । अवधिज्ञानी आदित्यगति ने इसे आगामी दसवें भव में तीर्थंकर पद की प्राप्ति होने की भविष्यवाणी की थी तथा कहा था कि जंबूदीप के भरतक्षेत्र में यह प्रथम तीर्थंकर होगा । मुनि आदित्यगति से अपनी एक मास की आयु शेष जानकर इसने अपने पुत्र अतिबल को राज्य दे दिया और सन्यास धारण कर लिया था । आयु के अंत में यह निरंतर बाईस दिन तक सल्लेखना में रत रहा और शरीर छोडकर ऐशान स्वर्ग के श्रीप्रभ विमान में ललितांग देव हुआ । पूर्वभव में यह जंबूद्वीप के विदेहक्षेत्र में गंधिल देश के सिहर नगर के राजा श्रीषेण का जयवर्मा पुत्र था । राज्य दिये जाने में पिता की उपेक्षा से इसे वैराग्य हुआ और विद्याधरों के भोग की प्राप्ति की निदान करके यह सर्पदंश से मरकर महाबल हुआ था । महापुराण 4.133, 138, 151, 159, 5.86, 200, 211, 221, 226, 228-229, 248-254, हरिवंशपुराण - 60.18-19

(2) एक यादव कुमार । हरिवंशपुराण - 50.125

(3) सूर्यवंशी राजा सुबल का पुत्र और अतिबल का पिता । महापुराण 5.5, हरिवंशपुराण - 13.8

(4) चंद्रवंशी राजा सोमयश का पुत्र और सुबल का पिता । पद्मपुराण - 5.11-12, हरिवंशपुराण - 13.16-17

(5) वृषभदेव के छियासठवें गणधर । हरिवंशपुराण - 12.66

(6) तीर्थंकर-मुनिसुव्रत के एक गणधर । महापुराण 67. 119

(7) उत्सर्पिणी काल का छठा नारायण । महापुराण 76.488

(8) नाकार्धपुर के राजा मनोजव ओर रानी वेगिनी का पुत्र । आदित्यपुर के राजा विद्यामंदर विद्याधर की पुत्री श्रीमाला के स्वयंवर में यह सम्मिलित हुआ था । पद्मपुराण - 6.357-358, 415-416

(9) चौथे बलभद्र सुप्रभ के पूर्वजन्म का नाम । पद्मपुराण - 20.232

(10) राम का पक्षधर एक विद्याधर राजा । इसने व्याघ्ररथ पर आसीन होकर युद्ध किया था । पद्मपुराण - 58.4

(11) धातकीखंड द्वीप के पूर्व विदेहक्षेत्र में पुष्कलावती देश की पुंडरीकिणी नगरी के राजा धनंजय और रानी जयसेना का पुत्र । नारायण अतिबल इसका छोटा भाई था । अतिबल की आयु पूर्ण हो जाने पर इसने समाधिगुप्त मुनिराज के पास दीक्षा लेकर अनेक तप तपे थे । आयु के अंत में शरीर छोड़कर यह प्राणत स्वर्ग में इंद्र हुआ । महापुराण 7.80-83

(12) अच्युत स्वर्ग का एक देव । पूर्वभव में यह जंबूद्वीप के पूर्वविदेहक्षेत्र में वत्सकावती देश के पृथ्वीनगर का नृप था । जयसेना इसकी रानी और रतिषेण तथा घृतिषेण पुत्र थे । महापुराण 48. 58-59, 68

(13) जंबूद्वीप के पूर्वविदेहक्षेत्र में सीता नदी के दक्षिणी तट पर स्थित मंगलावती देश में रत्नसंचयनगर का नृप । इसने अपने पुत्र धनपाल को राज्य देकर विमलवाहन गुरु के पास संयम धारण कर लिया था । पश्चात् यह ग्यारह अंग का पाठी हुआ । सोलह कारण भावनाओं के चिंतन से तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर आयु के अंत में इसने समाधिमरण पूर्वक देह त्यागी और विजय नामक प्रथम अनुत्तर में अहमिंद्र हुआ । महापुराण 50. 2-3, 10-13, 21-22, 69

(14) बलभद्र सुप्रभ के दूसरे पूर्वभव का जीव-जंबूद्वीप के पूर्व विदेहक्षेत्र में नंदन नगर का नृप । शरीर आदि के नश्वर स्वरूप का बोध हो जाने से इसने पुत्र को राज्य देकर अर्हंत प्रजापाल से संयम धारण कर के सिंहनिष्क्रीडित तप किया । अंत में यह संन्यास मरण करके सहस्रार स्वर्ग में देव हुआ । महापुराण 60.58-62

(15) कौशांबी नगरी का राजा । इसकी श्रीमती नाम की रानी और श्रीकांता नाम की पुत्री थी । इसने श्रीकांता का विवाह इंद्रसेन से किया था । श्रीकांता के साथ इसने अनंतमति नाम की एक दासी भी भेजी थी । इस दासी के कारण इंद्रसेन और उसके भाई उपेंद्रसेन में युद्ध होने की तैयारी सुनकर यह उन्हें रोकने गया किंतु रोकने असमर्थ रहने से विष-पुष्प सूंघकर मर गया था । महापुराण 62. 351-355, पांडवपुराण 4.207-212

(16) एक केवली । ये तीर्थंकर नेमिनाथ के दूसरे पूर्वभव के जीव श्रीदत्त के पिता सिद्धार्थ के दीक्षा गुरु थे । महापुराण 69. 12-14

(17) बंग देश के कांतपुर नगर के राजा सुवर्णवर्मा और रानी विद्युल्लेखा का पुत्र । इसका लालन-पालन मामा के यहाँ चंपानगरी में हुआ था । पूर्व निश्चयानुसार मामा की पुत्री कनकलता से इसका विवाह होने ही वाला था कि विवाह के पूर्व ही दोनों का समागम हो गया । इससे लज्जित होकर दोनों कांतपुर गये किंतु इसके पिता ने इसे दूसरे देश जाने के लिए कहा । ये दोनों प्रत्यंतनगर में रहने लगे । इन दोनों ने मुनिगुप्त मुनि को आहार देकर पुण्य संचय किया । वन में घूमते हुए किसी विषैले सर्प द्वारा इसे काटे जाने से यह वन में ही मर गया था । पति को मृत देखकर इसकी स्त्री कनकलता ने भी तलवार से आत्मघात कर लिया । महापुराण 75.82-94

(18) एक असुर । पूर्वभव में यह अश्वग्रीव का रत्नायुध नामक पुत्र था । महापुराण 63. 135-136

(19) राजा दशरथ का सेनापति । इसने यज्ञ में होने वाले पुण्य-पाप की उपेक्षा कर यज्ञ में राम और लक्ष्मण दोनों कुमारों का प्रभाव दिखलाना श्रेयस्कर माना था । महापुराण 67.463-464

(20) पलाशद्वीप संबंधी पलाशपुर नगर का राजा । इसकी रानी कांचनलता तथा पुत्री पद्मलता थी । इसे इसके भागीदार ने तलवार से मार डाला था । महापुराण 75.97-98, 118-120

(21) सौधर्मेंद्र द्वारा स्तुत वृषभदेव का एक नाम । महापुराण 25. 152

(22) सगर चक्रवर्ती के दूसरे पूर्वभव का जीव । महापुराण 48.143

(23) अनागत छठा नारायण । महापुराण 76. 488

(24) जंबूद्वीप के पूर्व विदेहक्षेत्र में पुष्कलावती देश की पुंडरीकिणी नगरी के राजा वज्रसेन का पुत्र । यह पूर्वभव में महाबल राजा का आनंद नामक पुरोहित था । यह मरकर सवार्थसिद्धि में अहमिंद्र हुआ था । महापुराण 11. 9, 12, 160

(25) विद्याधर विनमि का पुत्र । हरिवंशपुराण - 22.105

(26) जरासंध का पुत्र । हरिवंशपुराण - 52.34

(27) राजा धृतराष्ट्र और रानी गांधारी का अड़तीसवाँ पुत्र । पांडवपुराण 8.197

(28) राक्षसवंशी एक विद्याधर । यह लंका का राजा था । पद्मपुराण -5. 397


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