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मुनि: Difference between revisions

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Revision as of 16:56, 14 November 2020 (view source)
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Latest revision as of 22:13, 22 March 2023 (view source)
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<div class="HindiText">  <p id="1">(1) सौधर्मेंद्र द्वारा स्तुत वृषभदेव का एक नाम । <span class="GRef"> महापुराण 25.141 </span></p>
<div class="image-container">
<p id="2">(2) महाव्रती निर्ग्रंथ साधु । इनके अट्ठाईस मूलगुण होते हैं—पाँच महाव्रत, पांच समितियाँ, पाँच इंद्रिय-निरोध, छ: आवश्यक केशलोंच, भूशयन, अदंतवावन, अचेलत्व, अस्नान, स्थितिभोजन और एक भुक्त । ये पैदल चलते हैं । इनके उद्देश्य से बनाया गया आहार ये ग्रहण नहीं करते । ये अपना आहार न स्वयं बनाते हैं न किसी से बनवाते हैं और न अनुमोदना करते हैं । तीनों गुप्तियों का पालन करते हुए ये बारह प्रकार का तपश्चरण करते हैं और बाईस प्रकार के परीषहों को समता भावों से सहते हैं । ये नवधाभक्ति पूर्वक चांद्रीचर्या से श्रावकों के घर पाणिपात्र से आहार ग्रहण करते हैं । ये अपना शरीर न कृश करते हैं और न उसे रसीले मधुर पौष्टिक आहार लेकर पुष्ट करते हैं । ये ऐसा आहार ग्रहण करते हैं जो इंद्रियों को वश में रखने में सहायक होता है । ये शारीरिक स्थिति के लिए ही आहार लेते हैं । शरीर से इन्हें ममत्व नहीं होता । ये प्राणी मात्र से मैत्री रखते हैं गुणियों को देखकर प्रमुदित होते हैं । दुःखी जीवों पर करुणाभाव और अविनयी जीवों पर मध्यस्थभाव रखते हैं । चार हाथ प्रमाण मार्ग देखकर चलते हैं । न बहुत धीमें चलते हैं और न बहुत शीघ्र । ये निशल्य होकर विहार करते, उत्तम-क्षमा आदि दस धर्म पालते तथा बारह भावनाओं का चिंतन करते हैं । ये सातों भयों से रहित होते हैं । सदैव आत्मा के अर्थ में प्रवृत्त होते हैं । इनमें स्वाभाविक सरलता होती है । अपने आचार्य की आज्ञा मानते हैं । जो पुरुष इनका वचन द्वारा अनादर करते हैं वे दूसरे भव में गूँगे होते हैं । जो मन से निरादर करते हैं उनकी स्मरणशक्ति नष्ट हो जाती है और जो शरीर से तिरस्कार करते हैं उन्हें शारीरिक व्याधियाँ होती है । ये अपने निंदकों से द्वेष नहीं करते क्योंकि क्षमाधारी होते हैं । <span class="GRef"> महापुराण 6.153-155, 11. 64-65, 75, 18.5-8, 67-72, 20. 5-6, 62-66, 78-88, 169, 206, 34.169-173, 36.116, 156-161  </span><span class="GRef"> पद्मपुराण 92.47-48,  </span><span class="GRef"> वीरवर्द्धमान चरित्र 17.82, 37.163, 106.113, 109.89 </span></p>
 
  </div>
<div class="image-with-content_content-box">
<p><span class="GRef"> समयसार / आत्मख्याति/151 </span><p class="SanskritText">मननमात्रभावतया मुनिः।</p> <p class="HindiText">= मननमात्र भाव स्वरूप होने से मुनि है।</p>
<p><span class="GRef"> चारित्रसार/46/5  </span><p class="SanskritText">मुनयोऽवधिमनःपर्ययकेवलज्ञानिनश्च कथ्यंते।</p> <p class="HindiText"> = अवधिज्ञानी, मनःपर्ययज्ञानी और केवलज्ञानियों को मुनि कहते हैं।</p>
<p class="HindiText">देखें [[ साधु#1 | साधु - 1]]–(श्रमण, संयत, ऋषि, मुनि, साधु, वीतराग, अनगार, भदंत, दांत, यति ये एकार्थवाची हैं)।</p>
<p class="HindiText">* मुनि के भेद व विषय–देखें [[ साधु ]]।</p>
</div>
<div class="image-with-content_image-box_right">[[File:Muni.jpeg|400px|Muni]]</div>
</div>


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[[Category: पुराण-कोष]]
[[Category: म]]
[[Category: म]]
[[Category: चरणानुयोग]]

Latest revision as of 22:13, 22 March 2023

समयसार / आत्मख्याति/151

मननमात्रभावतया मुनिः।

= मननमात्र भाव स्वरूप होने से मुनि है।

चारित्रसार/46/5

मुनयोऽवधिमनःपर्ययकेवलज्ञानिनश्च कथ्यंते।

= अवधिज्ञानी, मनःपर्ययज्ञानी और केवलज्ञानियों को मुनि कहते हैं।

देखें साधु - 1–(श्रमण, संयत, ऋषि, मुनि, साधु, वीतराग, अनगार, भदंत, दांत, यति ये एकार्थवाची हैं)।

* मुनि के भेद व विषय–देखें साधु ।

Muni


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  • म
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