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निकाचित व निधत्त

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Revision as of 15:11, 27 November 2023 by Maintenance script (talk | contribs) (Imported from text file)
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  1. लक्षण
    गोम्मटसार कर्मकांड व जी.प्र./440/593 उदये संकममुदये चउसु वि दादु कमेण णो सक्कं। उवसंतं च णिधत्तिं णिकाचिदं होदि जं कम्मं। यत्कर्म...उदयावल्यां निक्षेप्तं संक्रामयितुं चाशक्यं तन्निधत्तिर्नाम। उदयावल्यां निक्षेप्तुं संक्रामयितुमुत्कर्षयितुमपकर्षयितुं चाशक्यं तन्निकाचित्तं नाम भवति।=जो कर्म उदयावलीविषै प्राप्त करने कौ वा अन्य प्रकृतिरूप संक्रमण करनेकौ समर्थ न हूजे सो निधत्त कहिये। बहुरि जो कर्म उदयावली विषै प्राप्त करनेकौ, वा अन्य प्रकृतिरूप संक्रमण करनेकौ, वा उत्कर्षण करनेकौ समर्थ न हूजे सो निकाचित कहिए।
  2. निकाचित व निधत्त संबंधी नियम
    गोम्मटसार कर्मकांड व जी.प्र./450/599 उवसंतं च णिधत्तिं णिकाचिदं तं अपुव्वोत्ति।450। तत् अपूर्वकरणगुणस्थानपर्यंतमेव स्यात् । तदुपरि गुणस्थानेषु यथासंभवं शक्यमित्यर्थ:।=उपशांत, निधत्त व निकाचित ये तीनों प्रकार के कर्म अपूर्वकरण गुणस्थान पर्यंत ही है। ऊपर के गुणस्थानों में यथासंभव शक्य अर्थात् जो उदयावली विषै प्राप्त करनेकू समर्थ हूजै ऐसे ही कर्मपरमाणु पाइए है।
  3. निधत्त व निकाचित कर्मों का भंजन भी संभव है
    धवला 6/1,9-9,22/427/9 जिणबिंबदंसणेण णिधत्तणिकाचिदस्स वि मिच्छत्तादिकम्मकलावस्स खयदंसणादो। =जिनबिंब के दर्शन से निधत्त और निकाचित रूप भी मिथ्यात्वादि कर्मकलाप का क्षय होता देखा जाता है।

 


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