• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

मोक्ष

From जैनकोष

Revision as of 23:25, 5 October 2014 by Vikasnd (talk | contribs)
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)



शुद्ध रत्नत्रय की साधना से अष्ट कर्मों की आत्यन्तिकी निवृत्ति द्रव्यमोक्ष है और रागादि भावों की निवृत्ति भावमोक्ष है । मनुष्य गति से ही जीव को मोक्ष होना सम्भव है । आयु के अन्त में उसका शरीर काफूरवत्‌ उड़ जाता है और वह स्वाभाविक ऊर्ध्व गति के कारण लोकशिखर पर जा विराजते हैं, जहाँ वह अनन्तकाल तक अनन्त अतीन्द्रिय सुख का उपभोग करते हुए अपने चरम शरीर के आकार रूप से स्थित रहते हैं और पुनः शरीर धारण करके जन्म-मरण के चक्कर में कभी नहीं पड़ते । ज्ञान ही उनका शरीर होता है । जैन दर्शनकार उसके प्रदेशों की सर्व व्यापकता स्वीकार नहीं करते हैं, न ही उसे निर्गुण व शून्य मानते हैं । उसके स्वभावभूत अनन्त ज्ञान आदि आठ प्रसिद्ध गुण हैं । जितने जीव मुक्त हाते हैं उतने ही निगोद राशि से निकलकर व्यवहार राशि में आ जाते हैं, इससे लोक जीवों से रिक्त नहीं होता ।

  1. भेद व लक्षण
    1. मोक्ष सामान्य का लक्षण ।
    2. मोक्ष के भेद ।
    3. द्रव्य व भाव मोक्ष के लक्षण ।
    • अजीव, जीव व उभय बन्ध के लक्षण ।−दे. बन्ध/१/५ ।
    1. मुक्त जीव का लक्षण ।
    2. जीवन्मुक्त का लक्षण ।
    3. सिद्धजीव व सिद्धगति का लक्षण ।
    4. सिद्धलोक का स्वरूप ।
  2. मोक्ष व मुक्त जीव निर्देश
    • सिद्ध भगवान्‌ के अनेकों नाम ।−दे. परमात्मा ।
    1. अर्हन्त व सिद्ध में कथंचित्‌ भेदाभेद ।
    2. वास्तव में भावमोक्ष ही मोक्ष है ।
    3. मुक्तजीव निश्चय से स्व में रहते हैं, सिद्धालय में रहना व्यवहार है ।
    4. अपुनरागमन सम्बन्धी शंका-समाधान ।
    5. जितने जीव मोक्ष जाते हैं उतने ही निगोद से निकलते हैं ।
    6. जीव मुक्त हो गया है, इसके चिह्न ।
    • सिद्धों में कथंचित्‌ विग्रहगति ।−दे. विग्रह गति ।
    1. सिद्धों को जानने का प्रयोजन ।
    • सिद्धों की प्रतिमा सम्बन्धी विचार ।−दे. चैत्य चैत्यालय/ १ ।
  3. सिद्धों के गुण व भाव आदि
    1. सिद्धों के आठ प्रसिद्ध गुणों का नाम- निर्देश ।
    • आठ गुणों के लक्षण आदि ।−दे. वह वह नाम ।
    1. सिद्धों में अन्य गुणों का निर्देश ।
    • सिद्धों में गुणस्थान, मार्गणास्थान आदि २० प्ररूपणाएँ ।−दे. सत्‌ ।
    • सर्वज्ञत्व की सिद्धि ।−दे. केवलज्ञान/५ ।
    1. उपरोक्त गुणों के अवरोधक कर्मों का निर्देश ।
    2. सूक्ष्मत्व व अगुरुलघुत्व गुणों के अवरोधक कर्मों की स्वीकृति में हेतु ।
    3. सिद्धों में कुछ गुणों व भावों का अभाव ।
    4. इन्द्रिय व संयम के अभाव सम्बन्धी शंका ।
  4. मोक्ष प्राप्ति योग्य द्रव्य क्षेत्र आदि
    1. सिद्धों में अपेक्षाकृत कथंचित्‌ भेद- निर्देश
    2. मुक्तियोग्य क्षेत्र- निर्देश ।
    3. मुक्तियोग्य काल- निर्देश ।
    • अनेक भवों की साधना से मोक्ष होता है एक भव में नहीं ।−दे. संयम/२/१० ।
    1. [[मोक्ष प्राप्ति योग्य द्रव्य क्षेत्र आदि#4.4 | मुक्तियोग्य गति निर्देश ।
    • निगोद से निकलकर सीधी मुक्तिप्राप्ति सम्बन्धी ।–दे. जन्म/५ ।
    1. मुक्तियोग्य लिंग निर्देश ।
    • सचेल मुक्ति निषेध ।−दे. अचेलकत्व।
    • स्त्री व नपुंसक मुक्ति निषेध ।−दे. वेद/७ ।
    1. मुक्तियोग्य तीर्थ निर्देश ।
    2. मुक्तियोग्य चारित्र निर्देश ।
    3. मुक्तियोग्य प्रत्येक व बोधित बुद्ध निर्देश ।
    4. मुक्तियोग्य ज्ञान निर्देश ।
    • मोक्षमार्ग में अवधि व मनःपर्यय ज्ञान का कोई स्थान नहीं ।−दे. अवधिज्ञान/२/६ ।
    • मोक्षमार्ग में मति व श्रुतज्ञान प्रधान हैं।–दे. श्रुतज्ञान/१/२।
    1. मुक्तियोग्य अवगाहना निर्देश ।
    • मुक्तियोग्य संहनन निर्देश ।−दे. संहनन ।
    1. मुक्तियोग्य अन्तर निर्देश ।
    2. मुक्त जीवों की संख्या ।
    • गति, क्षेत्र, लिंग आदि की अपेक्षा सिद्धों में अल्पबहुत्व ।−दे. अल्पबहुत्व/३ /१ ।
  5. मुक्तजीवों का मृत शरीर आकार ऊर्ध्वगमन व अवस्थान
    1. उनके मृत शरीर सम्बन्धी दो धाराएँ ।
    2. संसार के चरम समय में मुक्त होकर ऊपर को जाते हैं ।
    3. ऊर्ध्व ही गमन क्यों इधर- उधर क्यों नहीं ।
    4. मुक्त जीव सर्वलोक में नहीं व्याप जाता ।
    • सिद्धलोक से ऊपर क्यों नहीं जाते ।−दे. धर्माधर्म/२ ।
    1. मुक्तजीव पुरुषाकार छायावत्‌ होते हैं ।
    2. मुक्तजीवों का आकार चरमदेह से किंचिदून है ।
    3. सिद्धलोक में मुक्तात्माओं का अवस्थान ।
  6. मोक्ष के अस्तित्व सम्बन्धी शंकाएँ
    1. मोक्षभाव के निराकरण में हेतु ।
    2. मोक्ष अभावात्मक नहीं बल्कि आत्मलाभरूप है ।
    • सिद्धों में जीवत्व सम्बन्धी ।−दे. जीव/२, ४ ।
    • मोक्षसुख सद्भावात्मक है ।−दे. सुख/२ ।
    • शुद्ध निश्चय नय से न बन्ध है न मोक्ष ।−दे. नय/V/१/५ ।
    • सिद्धों में उत्पाद व्यय ध्रौव्य ।−दे. उत्पाद/३ ।
    • मोक्ष में पुरुषार्थ का सद्भाव ।−दे. पुरुषार्थ/१ ।
    1. बन्ध व उदय की अटूट शृंखला का भंग कैसे सम्भव हो ।
    2. अनादि कर्मों का नाश कैसे सम्भव हो ।
    3. मुक्त जीवों के परस्पर उपरोध सम्बन्धी ।
    4. मोक्ष जाते जाते जीवराशि का अन्त हो जायेगा ?

Previous Page Next Page

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=मोक्ष&oldid=12783"
Category:
  • म
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 5 October 2014, at 23:25.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki