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मुनि

From जैनकोष

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(1) सौधर्मेंद्र द्वारा स्तुत वृषभदेव का एक नाम । महापुराण 25.141

(2) महाव्रती निर्ग्रंथ साधु । इनके अट्ठाईस मूलगुण होते हैं—पाँच महाव्रत, पांच समितियाँ, पाँच इंद्रिय-निरोध, छ: आवश्यक केशलोंच, भूशयन, अदंतवावन, अचेलत्व, अस्नान, स्थितिभोजन और एक भुक्त । ये पैदल चलते हैं । इनके उद्देश्य से बनाया गया आहार ये ग्रहण नहीं करते । ये अपना आहार न स्वयं बनाते हैं न किसी से बनवाते हैं और न अनुमोदना करते हैं । तीनों गुप्तियों का पालन करते हुए ये बारह प्रकार का तपश्चरण करते हैं और बाईस प्रकार के परीषहों को समता भावों से सहते हैं । ये नवधाभक्ति पूर्वक चांद्रीचर्या से श्रावकों के घर पाणिपात्र से आहार ग्रहण करते हैं । ये अपना शरीर न कृश करते हैं और न उसे रसीले मधुर पौष्टिक आहार लेकर पुष्ट करते हैं । ये ऐसा आहार ग्रहण करते हैं जो इंद्रियों को वश में रखने में सहायक होता है । ये शारीरिक स्थिति के लिए ही आहार लेते हैं । शरीर से इन्हें ममत्व नहीं होता । ये प्राणी मात्र से मैत्री रखते हैं गुणियों को देखकर प्रमुदित होते हैं । दुःखी जीवों पर करुणाभाव और अविनयी जीवों पर मध्यस्थभाव रखते हैं । चार हाथ प्रमाण मार्ग देखकर चलते हैं । न बहुत धीमें चलते हैं और न बहुत शीघ्र । ये निशल्य होकर विहार करते, उत्तम-क्षमा आदि दस धर्म पालते तथा बारह भावनाओं का चिंतन करते हैं । ये सातों भयों से रहित होते हैं । सदैव आत्मा के अर्थ में प्रवृत्त होते हैं । इनमें स्वाभाविक सरलता होती है । अपने आचार्य की आज्ञा मानते हैं । जो पुरुष इनका वचन द्वारा अनादर करते हैं वे दूसरे भव में गूँगे होते हैं । जो मन से निरादर करते हैं उनकी स्मरणशक्ति नष्ट हो जाती है और जो शरीर से तिरस्कार करते हैं उन्हें शारीरिक व्याधियाँ होती है । ये अपने निंदकों से द्वेष नहीं करते क्योंकि क्षमाधारी होते हैं । महापुराण 6.153-155, 11. 64-65, 75, 18.5-8, 67-72, 20. 5-6, 62-66, 78-88, 169, 206, 34.169-173, 36.116, 156-161 पद्मपुराण 92.47-48, वीरवर्द्धमान चरित्र 17.82, 37.163, 106.113, 109.89


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