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अनुपलब्धि

From जैनकोष

अनुपलब्धि रूप हेतु सामान्य व विशेष के लक्षण

परीक्षामुख/3/79-89

नास्त्यत्र भूतले घटोऽनुपलब्धे:।79। नास्यत्यत्र शिंशपावृक्षानुपलब्धे:।80। नास्त्यत्र प्रतिबद्धसामर्थ्योऽग्निर्धूमानुपलब्धे:।81। नास्त्यत्र धूमोऽनग्ने:।82। न भविष्यति मुहूर्तांते शकटं कृत्तिकोदयानुपलब्धे:।83। नोदगाद्भरणिर्मुहूर्तात्प्राक्तत एव।84। नास्त्यत्र समतुलायामुन्नामो नामानुपलब्धे:।85। यथास्मिन् प्राणिनि व्याधिविशेषोऽस्ति निरामयचेष्टानुपलब्धे:।87। अस्त्यत्र देहिनि दु:खमिष्टसंयोगाभावात् ।88। अनेकांतात्मकं वस्त्वेकांतस्वरूपानुपलब्धे:।89।

विधिरूप

  1. इस भूतल पर घड़ा नहीं है क्योंकि उसका स्वरूप नहीं दीखता।79।
  2. यहाँ शिंशपा नहीं क्योंकि कोई किसी प्रकार का यहाँ वृक्ष नहीं दीखता।80।
  3. यहाँ पर जिसकी सामर्थ्य किसी द्वारा रुकी नहीं ऐसी अग्नि नहीं है, क्योंकि यहाँ उसके अनुकूल धुआँ रूप कार्य नहीं दीखता है।81।
  4. यहाँ धुआँ नहीं पाया जाता क्योंकि उसके अनुकूल अग्नि रूप कारण यहाँ नहीं है।82।
  5. एक मुहूर्त के बाद रोहिणी का उदय न होगा, क्योंकि इस समय कृत्तिका का उदय नहीं हुआ।83।
  6. मुहूर्त के पहले भरणी का उदय नहीं हुआ है क्योंकि इस समय कृत्तिका का उदय नहीं पाया जाता।84।
  7. इस बराबर पलड़े वाली तराजू में (एक पल्ले में) ऊँचापन नहीं क्योंकि दूसरे पल्ले में नीचापन नहीं पाया जाता है।85।

प्रतिषेध रूप

  1. जैसे इस प्राणी में कोई रोग विशेष है क्योंकि इसकी चेष्टा नीरोग मालूम नहीं पड़ती।87।
  2. यह प्राणी दु:खी है क्योंकि इसके पिता माता आदि प्रियजनों का संबंध छूट गया है।88।
  3. हरएक पदार्थ नित्य, अनित्य आदि अनेक धर्मवाला है क्योंकि केवल नित्यत्व आदि एक धर्म का अभाव है।89।


देखें हेतु- 1.5 ।


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