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ग्रन्थ

ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 114

From जैनकोष



इत्थं दीयमानस्य फलं दर्शयन्नाह --


गृहकर्मणापि निचितं कर्मविमार्ष्टि खलु गृहविमुक्तानाम्
अतिथीनां प्रतिपूजा रुधिरमलं धावते वारि ॥114॥


टीका: 

विमाष्र्टि स्फेटयति । खलु स्फुटम् । किं तत् ? कर्म पापरूपम् । कथम्भूतम् ? निचितमपि उपार्जितमपि पुष्टमपि वा । केन ? गृहकर्मणा सावद्यव्यापारेण । कासौ कत्र्री ? प्रतिपूजा दानम् । केषाम् ? अतिथीनां न विद्यते तिथिर्येषां तेषाम् । किंविशिष्टानाम् ? गृहविमुक्तानां गृहरहितानाम् । अस्यैवार्थस्य समर्थनार्थं दृष्टान्तमाह -- रुधिरमलं धावते वारि । अलंशब्दो यथार्थे । अयमर्थो रुधिरं यथा मलिनमपवित्रं च वारि कर्तृ निर्मलं पवित्रं च धावते प्रक्षालयति तथा दानं पापं विमार्ष्टि ॥




दान का फल




गृहकर्मणापि निचितं कर्मविमार्ष्टि खलु गृहविमुक्तानाम्

अतिथीनां प्रतिपूजा रुधिरमलं धावते वारि ॥114॥


टीकार्थ:

जिनके सभी तिथियाँ एक समान हैं, ऐसे गृहत्यागी अतिथियों को दान देने से पापरूप व्यापारादि कार्यों से उपार्जित किये हुए घोर पाप भी नष्ट कर दिये जाते हैं । इसी अर्थ का समर्थन करने के लिए दृष्टान्त देते हैं -- जिस तरह मलिन रक्त को पवित्र जल धो डालता है, उसी प्रकार दान देने से पापकर्म नष्ट हो जाते हैं ।



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