• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 132

From जैनकोष



इत्थम्भूते च नि:श्रेयसे कीदृशा: पुरुषा: तिष्ठन्तीत्याह-


विद्यादर्शन-शक्ति-स्वास्थ्यप्रह्लादतृप्तिशुद्धियुज:
निरतिशया निरवधयो, नि:श्रेयसमावसन्ति सुखम् ॥132॥


टीका: 

नि:श्रेयसमावसन्ति नि:श्रेयसे तिष्ठन्ति । के ते इत्याह- विद्येत्यादि । विद्या केवलज्ञानं, दर्शनं केवलदर्शनं, शक्तिरनन्तवीर्यं, स्वास्थ्यं परमोदासीनता, प्रह्लादोऽनन्तसौख्यं, तृप्तिर्विषयानाकाङ्क्षा, शुद्धिद्र्रव्यभावस्वरूपकर्ममलरहितता, एता युञ्जन्ति आत्मसम्बद्धा: कुर्वन्ति ये ते तथोक्ता: । तथा निरतिशया अतिशयाद्विद्यादिगुणहीनाधिकभावान्निष्क्रान्ता: । तथा निरवधयो नियतकालावधिरहिता: । इत्थम्भूता ये ते नि:श्रेयसमावसन्ति । सुखं सुखरूपं नि:श्रेयसम् । अथवा सुखं यथा भवत्येवं ते तत्रावसन्ति ॥




मुक्तजीवों का लक्षण




विद्यादर्शन-शक्ति-स्वास्थ्यप्रह्लादतृप्तिशुद्धियुज:

निरतिशया निरवधयो, नि:श्रेयसमावसन्ति सुखम् ॥132॥


टीकार्थ:

नि:श्रेयस—मोक्ष में वे जीव रहते हैं, जो विद्या—केवलज्ञान, दर्शन—केवलदर्शन, शक्ति—अनन्तवीर्य, स्वास्थ्य—परम उदसीनता, प्रह्लाद—अनन्तसुख, तृप्ति—विषयों की आकाङ्क्षा का अभाव, शुद्धि—द्रव्यकर्म-भावकर्म-नोकर्म से रहितपना, इन सभी से युक्त हैं । निरतिशय—विद्या आदि गुणों की हीनाधिकता से रहित हैं और निरवधि—काल की अवधि से रहित हैं । जो इन सब विशेषणों से युक्त हैं, वे जीव नि:श्रेयस में सुख से निवास करते हैं ।



पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

रत्नकरंड श्रावकाचार अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:रत्नकरंड_श्रावकाचार_-_श्लोक_132&oldid=102393"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 November 2022, at 21:30.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki