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ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 136

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साम्प्रतं योऽसौ सल्लेखनानुष्ठाता श्रावकस्तस्य कति प्रतिमा भवन्तीत्याशङ्क्याह --


श्रावकपदानि देवै-रेकादश देशितानि येषु खलु
स्वगुणा: पूर्वगुणै: सह, सन्तिष्ठन्ते क्रमविवृद्धा: ॥136॥


टीका: 

देशितानि प्रतिपादितानि। कानि? श्रावकपदानि श्रावकगुणस्थानानि श्रावकप्रतिमा इत्यर्थ: । कति ? एकादश । कै: ? देवैस्तीर्थङ्करै: । येषु श्रावकपदेषु खलु स्फुटं सन्तिष्ठन्तेऽवस्थितिं कुर्वन्ति । के ते ? स्वगुणा: स्वकीयगुणस्थानसम्बद्धा: गुणा: । कै: सह ? पूर्वगुणै: पूर्वगुणस्थानवर्तिगुणै: सह । कथम्भूता: ? क्रमविवृद्धा: सम्यग्दर्शनमादिं कृत्वा एकादशपर्यन्तमेकोत्तरवृद्ध्या क्रमेण विशेषेण वर्धमाना: ॥




ग्यारह प्रतिमा




श्रावकपदानि देवै-रेकादश देशितानि येषु खलु

स्वगुणा: पूर्वगुणै: सह, सन्तिष्ठन्ते क्रमविवृद्धा: ॥136॥


टीकार्थ:

श्रावक के जो पद—स्थान हैं, वे श्रावक की प्रतिमा कहलाती हैं । तीर्थङ्कर ने श्रावक की ग्यारह प्रतिमाएँ कही हैं, उन प्रतिमाओं में अपनी-अपनी प्रतिमाओं से सम्बन्धित गुण पिछली प्रतिमाओं से सम्बन्ध रखकर क्रम से वृद्धि को प्राप्त होते हुए (सम्यग्दर्शन को आदि लेकर ग्यारह प्रतिमा तक) विशेषरूप से बढ़ जाते हैं । अर्थात् अगली प्रतिमाओं में स्थित पुरुष को पूर्व की प्रतिमा से सम्बन्धित गुणों का परिपालन करना अनिवार्य है ।



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