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महाबन्ध

From जैनकोष



   30,000 श्लोक प्रमाण यह  सिद्धान्त ग्रन्थ आचार्य भूतबली (ई.66-156) द्वारा रचित षट्खंडागम का अन्तिम खंड  है, जो अत्यन्त विशाल तथा गम्भीर  होने के कारण एक स्वतन्त्र ग्रन्थ के रूप में प्रसिद्ध हो गया है । विवरणात्मक  शैली में अति विस्तार युक्त तथा सुबोध होने के कारण किसी भी आचार्य ने इस पर कोई  टीका नहीं लिखी । आचार्य वीरसेन स्वामी ने भी 5 खण्डों पर तो विस्तृत टीका लिखी, परन्तु इस षष्टम खण्ड पर टीका लिखने की आवश्यकता नहीं समझी  । (जै./1/152) । इस ग्रन्थ में स्वामित्व भागाभाग आदि अनुयोग द्वारों के द्वारा  विस्तार को प्राप्त प्रकृति, स्थिति, अनुभाग व प्रदेश बन्ध का और उनके बन्धकों तथा बन्धनीयों का  विवेचन निबद्ध है । (जै./1/153) । इस ग्रन्थ की प्रारम्भिक भूमिका ‘सत्कर्म’ नाम से प्रसिद्ध है, जिस पर ‘सत्कर्म पत्रिका’ नामक व्याख्या उपलब्ध है । (देखें सत्कर्म पंञ्जिका ) । 


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