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योगसार - चूलिका-अधिकार गाथा 486

From जैनकोष

ज्ञानी पापों से निर्लिप्त -

न ज्ञानी लिप्यते पापैर्भानुानिव तामसै: ।
विषयैर्विध्यते ज्ञानी न संनद्ध: शरैरिव ।।४८६।।

अन्वय :- तामसै: भानुान् इव ज्ञानी पापै: न लिप्यते । संनद्ध: शरै: इव ज्ञानी विषयै: न विध्यते ।

सरलार्थ :- जिसप्रकार सूर्य अंधकारों से व्याप्त अर्थात् आच्छादित नहीं होता अर्थात् अँधकार सूर्य के प्रकाश को ढक नहीं सकता - प्रकाश को नष्ट नहीं कर सकता, उसीप्रकार ज्ञानी की भूमिका में होनेवाले योग्य/न्याय्य पापों से उसका व्यक्त धर्म व्याप्त/आच्छादित नहीं होता अर्थात् ज्ञानी के न्याय्य पाप उसके व्यक्त धर्म को ढक नहीं सकते - धर्म को नष्ट नहीं कर सकते । जिसप्रकार युद्ध में कवच (बख्तर) पहना हुआ योद्धा बाणों से नहीं बिंधता, उसीप्रकार ज्ञानी पंचेंद्रिय के विषयों को भोगने के कारण कर्मो से नहीं बंधता ।

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  • योगसार : अमितगति आचार्य
  • योगसार - चूलिका-अधिकार : अमितगति आचार्य
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