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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:कार्तिकेय अनुप्रेक्षा - गाथा 316

From जैनकोष



देह-मिलियं पि जीवं णिय-णाण-गुणेण मुणदि जो भिण्णं ।

जीव-मिलियं पि देहं कंचुव-सरिसं वियाणेइ ।।116।।

देहमिलित भी जीव का निजज्ञानगुण से भिन्नरूपतया बोध―जो भव्य जीव देह से मिले हुए भी अपने आत्मा को भेदविज्ञान के द्वारा भिन्न जानता है वह जीव सम्यग्दृष्टि है । यह जीव अनादि से अब तक शरीर में बंधा हुआ चला आया है । शरीर 5 प्रकार के कहे हैं―औदारिक, वैक्रियक, आहारक, तैजस और कार्माण । तैजस और कार्माण से तो सदा बँधा हुआ यह जीव आया, किसी भी क्षण इनसे अलग न हो सका । जैसे जब मनुष्य का मरण होता है तो उसका देह यहीं रह जाता है, मगर जीव के साथ तैजस और कार्माण शरीर जाता है तो मरने पर यह जीव अकेला जाता हो सो नहीं । तैजस व कार्माण शरीर वहाँ भी रहता है रास्ते में और जहाँ जन्म लेता है वहां फिर नया शरीर मिलता है । तो शरीर यों दो प्रकार के कह लीजिये―सूक्ष्म और स्थूल । तो इस प्रसंग में सूक्ष्म शरीर तो समझिये तैजस और कार्माण और स्थूल शरीर हुए ये औदारिक, वैक्रियक, आहारक । आहारक भी सूक्ष्म है, पर इससे भी सूक्ष्म तैजस कार्माण हैं तो यह जीव देह के मिला हुआ सदा रहता है जब तक इसकी मुक्ति न हो, पर औदारिक आदिक शरीरों से कभी मिला हुआ रहता है । कभी उसे छोड़ देता है, पर निग्रह गति पूर्ण होने पर दूसरा शरीर अवश्य मिल जाता है । तो यहाँ इस देह में मिले हुए जीव को भी भेदविज्ञान से यों जानना है कि शरीर न्यारा है, में न्यारा हूँ । भेद की पहिचान लक्षण से होती है । तो शरीर का लक्षण जुदा है और मुझ आत्मा का लक्षण जुदा है । शरीर अचेतन है, जानने समझने वाला नहीं है । जीव चेतन है, यह जानता और समझता है ।

जीव की देह से भिन्नता के संबंध में शंका व समाधान―कुछ लोग ऐसी आशंका कर सकते हैं कि जीव न तो कभी दिखा और न उसका कोई स्पष्ट लक्षण मिला तो जीव क्या है उनकी मान्यता में ? ये पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, ये शरीर है, ये पेंच पुर्जा सब इकट्ठे मिल गए तो इसमें फिर कोई जानने देखने वाली ताकत उत्पन्न हो गयी, और वे दृष्टांत दे सकते हैं कि जैसे घड़ी के पेंच पुर्जे न्यारे-न्यारे रखे हैं तो नहीं चलते हैं और जब उन्हें फिट कर देते हैं तो वह चलने लगते हैं । ऐसे ही पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आदि ये अलग-अलग रह रहे तो

इनमें जानने वाला नहीं बनता और इकट्ठे हो जायें, फिट बैठ जायें तो जानने की बात बनने लगती है । ऐसा कहने पर इस जीवतत्त्व के निषेध की आशंका कर सकते हैं, लेकिन जब लक्षणों पर विचार करते हैं तो यह आशंका युक्त नहीं बैठती । भले ही घड़ी के पेंच पुर्जे मिल गए तो घड़ी चलने लगी, तो जो वहाँ चलना है वह पेंच पुर्जों की ही तो क्रिया है । सो पेंच पुर्जे जिस रूप में हैं उसी रूप की क्रिया बनेगी । पर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु ये तो जानने देखने वाले नहीं हैं । तो इनके मेल से विजातीय बात कैसे बन जायेगी ? जिसमें जो धर्म है उससे वह ही धर्म प्रकट हो सकता है । तो जानन देखनहार कोई तत्त्व इस शरीर से पृथक् है । जिसमें सुख-दुःख की बुद्धि होती है, अनेक वितर्क विचार उठते हैं, ऐसा यह जीव इस शरीर से निराला है ।

देह से भिन्न जीव के परिज्ञान में संपन्नता―तो औदारिक शरीर से संयुक्त हुये भी आत्मा को अपने ज्ञान गुण के बल से जो भिन्न जानता है वह सही दृष्टि वाला है । जीव का गुण है ज्ञानदर्शन और शरीर का धर्म है रूप, रस, गंध, स्पर्श । तो यों स्व और पर का भेदज्ञान कराने वाले ज्ञानगुण के द्वारा जो जीव को पृथक् रूप समझता है वह सम्यग्दृष्टि है । दूसरी निरख यों चलती है ज्ञानी की कि यह शरीर इस प्रकार है जैसे कि किसी पुरुष का कोट कुर्ता वगैरह । कोट कमीज आदिक में, पैन्ट आदिक में पूरा पुरुष समाया है, लेकिन पैंट कोट आदि भिन्न चीजें हैं और वह पुरुष भिन्न चीज है, यह दृष्टांत प्रसिद्ध दृष्टांत है, जिसे कोई मना नहीं कर सकता । कपड़ा अलग है, पुरुष अलग है । इसी प्रकार इस शरीर में जो जीव रह रहा है तो शरीर कोट आदिक की तरह जीव से निराला है और यह जीव (पुरुष) देह से निराला है । तो जो जीव से मिले हुए शरीर को कोट कमीज की तरह जानता है कि जैसे सफेद पीला हरा आदिक किसी रंग का वस्त्र पहिन लिया तो वह वस्त्र ही तो हरा, पीला है, पुरुष हरा पीला नहीं हो जाता, इसी प्रकार जीव के आश्रित जो शरीर है उसमें जो रूप रंग आदिक हैं वे शरीर के हैं, जीव के नहीं हो जाते । तो यों जो शरीर से निराला जीव को जानता है वह सम्यग्दृष्टि है । संतोष, आनंद, अनाकुलता आदि भी इसी कला में प्राप्त होते हैं । जब अपने आपको ज्ञानस्वरूप अनुभव किया, मैं ज्ञानमात्र हूँ, परिपूर्ण हूँ, संपन्न हूँ, स्वरक्षित हूँ, अमर हूँ, निरापद हूँ, मुझ में किसी दूसरी चीज का प्रवेश नहीं, जब इस विचार पर दृढ़ रहता है कोई पुरुष, तो उसके अनेक संकट दूर हो जाते हैं, और जिनको अपने आत्मा का बोध नहीं है वे संसार की किसी भी स्थिति में पहुंच जायें वे तृप्त, संतुष्ट, अनाकुल नहीं हो सकते ।


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