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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 145

From जैनकोष



अचिच्चिद्रू पयोरैक्यं बंधं प्रति न वस्तुत:।

अनादिश्चानयो: श्लेष: स्वर्णकालिकयोरिव।।145।।

प्रत्येक की एकता―हम आप जो कुछ भी नजर आ रहे हैं ये एक एक नहीं हैं, ये अनेक जीवों के पिंड बैठे हुए हैं। किसी भी एक मनुष्य को उदाहरण में ले लो, यह दिखने में तो एक मनुष्य आ रहा है किंतु जीव जरूर एक है एक भी क्या, शरीर के अंग-अंग में असंख्यात जीव और पड़े हुए हैं। खैर, उनसे हमारे व्यवहार की बात नहीं है। हम तो उस एक से व्यवहार की बात लगा रहे हैं, जो समझता है, जो इस शरीर मुख्य अधिष्ठाता है। इस पिंड में जिसे हम एक मनुष्य कहते हैं एक तो जीव है और जिन परमाणुओं से शरीर बना है ऐसे अनंत परमाणु हैं। एक चीज वह कहलाती है जिसका दूसरा हिस्सा न हो सके। एक कभी आधा नहीं होता यह स्वरूप का अटल नियम है। कोई व्यवहार में ऐसा कहे कि देखो यह एक गन्ना है ना, इसके 10 टुकड़े कर दें। अरे वह गन्ना एक चीज ही नहीं है। गन्ने में छोटे-छोटे कितने ही अंग बनते हैं वे तोड़ने से बिखर गए, जुदे-जुदे हो गये। यह चौकी है, इसे लोग कहते हैं कि यह एक है। यह एक चीज है ही नहीं। इसके अविभागी अंश अनंत हैं और उन अनंत अंशों का यह पिंड है। जो एक वस्तु होती है उसका कभी भाग नहीं होता, वह आधा नहीं होता।

प्रत्येक जीव की अखंडता―हम आप जीव हैं। एक एक चीज हैं तो इस जीव का कहीं आधा-आधा भाग हो सकता है? मैं आधा शरीर में ही बैठा रहूँ और आधा इस शरीर से कहीं बाहर बैठ जाऊँ, ऐसी सामर्थ्य है क्या किसी में? नहीं है। वह तो एक ही है। कभी ऐसा हो जाता है कि शरीर का कोई अंग टूट गया, मानो एक अंगुली टूट गयी, चार हाथ आगे गिर गयी। वहाँ तो अंगुली भी कांपती हैं, यहाँ हम भी काँपते हैं। तो वहाँ उस समय कुछ देर तक के लिए अंगुली में भी जीव है , हममें भी जीव हैं, पर इस तरह यह जीव नहीं फैला कि कुछ अंगुली में जीव है, कुछ हममें जीव है। उस अंगुली से लेकर यहाँ हम तक जो चार-छ: हाथ का अंतर है उस पूरे क्षेत्र में वह एक जीव है, पश्चात् वे हम बाहर फैले हुए प्रदेश समेट कर शरीर में प्रवेश करते हैं और वह भाग अकेला अचेतन होकर पड़ा रहता है। एक जीव का कभी भाग नहीं होता।

दृश्यमानों में भी प्रत्येक में एकता―इन दिखने वाले पदार्थों में परमाणु है वास्तविक चीज, जिन परमाणुओं के संबंध से यह पिंड बना है, उस परमाणु का भाग नहीं होता। दिखने वाले लोगों में किसी एक को उदाहरण में ले लो, इसमें जीव तो एक है और अनंतानंत शरीर के परमाणु हैं और उससे अत्यंत गुणे अनंतानंत कर्मों के परमाणु हैं। यों अनंत पदार्थों का ढेर है यह जीव, जो इसकी दृष्टि में आ रहा है और इसीलिए यह मायारूप है। यह सदा ही ऐसा रह सके ऐसा तो नहीं है, बिखर जाता है, मिट जाता है, जुदा हो जाता है। यह सब मायाजाल है। इस मायाजाल में जो लोग विश्वास रखते हैं कि यह सही वस्तु है, हमारे हितरूप है, वे जीव जो संसार में संकट सहते हैं, जन्म लेते हैं और मरते हैं और जो इन सबमें सबको जुदा-जुदा निहारते हैं, इसमें एक-एक परमाणु तत्त्व है, यह एक जीव तत्त्व है। यों भिन्न-भिन्न स्वतंत्र-स्वतंत्र निहारते हैं, उनके मोह नहीं होता। तब यह जीव मुक्ति के मार्ग में बढ़ता है और मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

आत्मभक्ति में परमात्मत्व का दर्शन―हमें अपना विश्वास अंत: यह रखना चाहिए कि मैं देह से न्यारा यह ज्ञानमात्र आत्मा हूँ और इस मुझ आत्मा को आनंद चाहिए और आनंद मिलता है इस अपने स्वरूप की सेवा से। तभी लोग कहते हैं―घट-घट में परमात्मा बसता है, वह कहाँ बसता है और कैसे उसका दर्शन होता है? इसका कुछ प्रकाश मूल से किसी को मिला है? उन्हें मिला है जो अपने को बाहर में किसी जगह प्रभु को निहारने की चेष्टा नहीं करते। जब घट-घट में परमात्म है तो हम बाहर में आँखें खोलकर कहाँ देखें जहाँ यह परमात्मा मिलेगा? जब मुझमें ही परमात्मा है, घट-घट में परमात्मा है, प्रत्येक देह में परमात्मा है तो बाहर दृष्टि न करके , बाहर से दृष्टि मोड़कर, अपने आपमें स्वयं निर्विकल्प होकर परमविश्राम लेकर निहारना चाहिए, वहाँ परमात्म का दर्शन होगा, प्रभु का दर्शन, निरुपम आनंद का अनुभव करते हुए ही हो सकता है, दु:खी रहकर परमात्मा का दर्शन नहीं होता। मैं दु:खी रहूँ, चिंताओं में बसूँ, शोक में बना रहूँ और प्रभुदर्शन हो जाय, यह नहीं हो सकता। मैं कषायों को हल्का करूँ, मोह को दूर करूँ, विकल्पों से मुख मोडूँ, अपने आप शुद्ध विश्राम से रह जाऊँ वहाँ जो एक सुगम स्वाधीन अनुपम आनंद प्रकट होता है। उस आनंद का अनुभव प्रकट करते हुए की स्थिति में परमात्मस्वरूप का दर्शन होता है। ये सब कल्याण की बातें, एकत्व भावना और अत्यंत भावना से प्राप्त होती है।

आत्मनिर्णय के लिए आवश्यक मूलज्ञान―मैं सबसे न्यारा केवल अपने स्वरूपमात्र हूँ। इस आत्मा के अनुभव के लिए अधिक परिश्रम न करना चाहें तो 50-60-70 वर्ष के जीवन में कभी दो चार मिनट तो आत्महित के लिए सच्चाई के साथ उद्यम कर लें तो कौनसा घाटा पड़ जायेगा? ये जीव सभी अपनी-अपनी कल्पनाओं के साथी हैं, अपने स्वार्थ के साथी हैं, अपने सुख के साथी हैं। किसी जीव का किसी दूसरे जीव में प्रवेश ही नहीं होता। इतना तो पहिले समझना ही होगा। ये धन वैभव, ये जड़ पदार्थ जड़ ही हैं। इन जड़ पदार्थों से मुझ आत्मा में कोई आनंद अथवा स्वरूप का विकास नहीं होता। कुछ ज्ञान तो होना ही चाहिए।

आत्मनिर्णय के लिए सत्याग्रह की आवश्यकता―अब इस ज्ञान के आधार से अपने आपको सत्य के आग्रह में ले जाइए। यहाँ के ये सारे समागम असत्य हैं मेरे लिए। सत्य तो मेरे लिए मेरा ही एक स्वरूप है। अब पर में उपेक्षा कर दीजिए, किसी परतत्त्व का ख्याल न रखिये। इस चित्त में जो भी (परवस्तुयें) आती हों ज्ञान से तुरंत उनको रोक दें, मत आने दें। मैं इस समय सत्य के आग्रह में लगा हूँ, मैं अपने आप सत्य का निर्णय करना चाहता हूँ, मैं लोगों की बातों में आकर निष्पक्ष दर्शन का निर्णय कर सकूँगा, इसमें मुझे शंका हैं क्योंकि गुरु बहुत हैं, मजहब बहुत हैं, परिपाटियां बहुत हैं। जो जिस कुल में पैदा हुआ है वह अपने कुल की गाता है। तो हम क्या आशा रखें किसी दूसरे से कुछ सुनने की कि मैं समझ जाऊँ कि सत्य क्या है? अब तो इसका यह निर्णय किया है कि जब मैं स्वयं ज्ञानरूप हूँ, समझनहार हूँ तब मैं स्वयं अपने आपमें सत्य का क्यों न निर्णय कर लूँ? मुझे किसी परपदार्थ से प्रयोजन नहीं। जो भी चित्त में आये उस सबको रोको। मेरे ज्ञान में मत आओ, मुझे किसी पर को नहीं जानना है। इन सब परपदार्थों के ख्याल को दूर करके एक परमविश्राम से बैठ तो जाइए। जैसी जो स्थिति हो वह मुझमें अपने आप प्रकट होकर बतायेगी कि तत्त्व यह है सत्य जानने के लिये आग्रह करके बैठ तो जाइये।

सत्याग्रह के साथ असहयोग का आंदोलन―सत्य का आग्रह करने के साथ-साथ परपदार्थों का असहयोग भी कर दो। सत्याग्रह और असहयोग―इन दोनों उपायों को तो करो। अपने आपमें बसे हुए सत्य का तो आग्रह करो। मैं अपने आप समझूँ कि सत्य क्या है और समस्त परपदार्थों से असहयोग कर दो कि मुझे तुम्हें नहीं जानना है। तुम ख्याल में मत आओ, बाहर हट जाओ। इस प्रकार इस सत्याग्रह और असहयोग के साधन से अपने आपको आनंद का मार्ग स्वयं विदित हो जायेगा और वह इस अनुभूति के साथ विदित होगा कि मैं प्रति क्षण यह प्रेरणा कर लूँ कि बस मैं अपने आपके आत्मा का नाता लगाऊँ। मुझे आनंद पाना है, शांति पानी है, मुझे धन वैभव परिजन इत्यादि किसी से कुछ प्रयोजन नहीं। मुझे तो एक शुद्ध होना है, आनंदमय होना है, सत्यज्ञानी बनना है, उसमें ही हमारा कल्याण है ऐसा आग्रह करें और परपदार्थों से अपने को दूर रखने का प्रयत्न करें तो अवश्य की कल्याण प्रकट होगा।

आत्मविजय का प्रयोग―यह देह और यह देह मैं आत्मा, यह दोनों ही भिन्न-भिन्न हैं। देह तो अचेतन है और यह मैं आत्मा अचेतन हूँ, और इस वर्तमान स्थिति में इस देह से बंधा हुआ हूँ, अनादिकाल से बंधन है। जैसे स्वर्णपाषाण और उस स्वर्ग में अनादि से बंधन है, पर प्रयोग द्वारा मशीनों द्वारा उस स्वर्णपाषाण को दूर करके स्वर्ण निकाला जाता है, ऐसे ही भेदविज्ञान द्वारा इस शरीर को दूर करके अपने आपके स्वरूप को ज्ञान में ग्रहण करके इस शरीर से छुटकारा पाया जा सकता है। बस यही है मोक्ष। मोक्ष ही परम हित है, क्योंकि मोक्ष में आकुलता नहीं है, वहाँ कैवल्य है और उपाधि का संबंध नहीं है। उस कैवल्य अवस्था को पाने के लिए हम अभी से अपने को केवल निरखने लगें तो हम उस अवस्था को पा सकते हैं। मैं शरीर से जुदा हूँ, ज्ञानमात्र हूँ केवल ज्योतिस्वरूप हूँ, ऐसी रुचि ऐसी प्रतीति और ऐसा अनुभव करने का यत्न हो, यही है वास्तविक धर्मपालन और इसमें ही परम शांति प्राप्त होती है।


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