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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1622

From जैनकोष



अपायविचयं ध्यानं तद्वदंति मनीषिण:।

अपाय: कर्मणां यत्र सोपाय: स्मर्यते बुधै:।।1622।।

अब दूसरा धर्मध्यान है अपायविचय। विनाश का चिंतवन करना सो अपायविचय है। कर्मों में रागादिक भावों की मुख्यता है। रागादिक भावों के विनाश का चिंतवन कर सो अपायविचय है, हमें ऐसे कर्मों की खबर तो कुछ है ही नहीं। कर्मपरमाणु दिखते नहीं कर्मों का तो अनुमान है और अनुमान प्रमाण सच्चा होता है। लोग तो अनुमान का अर्थ अंदाजा कहते हैं, पर सिद्धांत ग्रंथों में अनुमान को प्रमाण माना गया है। नि:संदेह अनुमान प्रमाण है। कर्मों में हेतु और साध्य जो होते हैं उनके अविनाभाव का तर्क द्वारानिश्चय हो सके तब तर्क जोड़ें। अनुमान प्रमाण से हम कर्मों की सत्ता जानते हैं। कर्मों के जीव में जो विभावपरिणमन हो रहा है वह विभावपरिणमन किसी पर संबंध बिना नहीं हो सकता। यदि विजातीय आरंभ के संबंध बिना हो जाय तो आत्मा में ये रागादिक सदाकाल रहना चाहिए, क्योंकि उपाधि के बिना, निमित्त के बिना हुए हैं। अपने आपके अस्तित्त्व के कारण हुए हैं, किंतु रागादिक भाव सदाकाल रहते हों ऐसा ज्ञात नहीं होता। दूसरी बात यह है कि यदि परद्रव्य के सन्निधान बिना रागादिक विभावपरिणमन हुए तो ये रागादिक विभावपरिणमन न होना चाहिए। कभी कम हों, कभी ज्यादा हों, कभी बदला करते हों, तो यह बात न होनी चाहिए। यदि परद्रव्यों के सन्निधान बिना ये रागादिक नहीं हुए तो फिर आत्मा के अस्तित्त्व से सदा ये उठे हुए हैं। जैसे केवलज्ञान में विषमता नहीं है क्योंकि केवलज्ञान आत्मा के स्वभाव से उत्पन्न होता है अतएव वह ज्ञान सम परिणमन है और केवलज्ञान इतना सम परिणमन है कि उसमें यह भाव भी नहीं टाला जा सकता कि भगवान के ज्ञान का परिणमन इस प्रकार होता है कि जिस चीज को वह अभी वर्तमान पर्यायरूपसे जान रहा थातो अगले समय में उसे भेदपर्याय से जान गये। और जिसे भविष्य पर्यायरूप से जान रहे थे उसे वर्तमान पर्याय रूप से जान गए। इतना विकल्प ऐसा भेद ऐसा परिवर्तन केवलज्ञान में नहीं है। इतना समपरिणमन है। वहाँ तो समस्त पर्यायें एक साथ झलकती हैं और वे सब पर्यायें जिस क्रम से हैं हुई होंगी उस क्रम की रचना में पड़ा हो तो झलके, किंतु उनके ज्ञान में यह विकल्प न पड़ेगा कि यह भूतपर्याय है यह वर्तमान है यह भविष्य है। अथवा उनके ज्ञान का परिणमन परिवर्तन पर्याय के कारण न होगा कि अब इस तरह से उसका उत्पाद है व्यय है, इतना श्रम परिणमन केवलज्ञान का। तो जो निरुपाधि परिणमन है, स्वभावपरिणमन है वह परिणमन सदाकाल रहता है और सम हुआ करता है। लेकिन ये रागादिक भाव न तो सदाकाल होते हैं और न समपरिणमन हैं अतएव यह रागादिक भावरूप जो हेतु है वह कर्मों की सत्ता सिद्ध करता है। कम है अन्यथा याने विनाशीक और विषम। रागादिक परिणमन नहीं हो सकता था। इस देह के द्वारा कर्मों का अस्तित्त्व सिद्ध हो सकता है, लेकिन हम कर्मों को अनुमान प्रमाण के बिना अन्य प्रकार इस समय नहीं जानते।

अवधिज्ञानी पुरुष कर्मों के सत्त्व को स्पष्ट अवधिज्ञान के बल से जान लेता हे, किंतु उत्कृष्ट विशिष्ट अवधिज्ञानी पुरुष जानता है और उस अवधिज्ञान की ही सीमा में वातावरण में कर्मों के प्रमेय और उपशम को भी जान लेता है, जैसे―अवधिज्ञानी पुरुष उदयागत कर्मों को जान सकता है। उदयागत कर्म हैं, वे अस्तित्त्वरूप हैं, विधिरूप हैं, उन्हें जान लेता है तो उन्हें साक्षात् जान लेता हैअवधिज्ञानी। लेकिन कर्मों के उपशम और क्षयोपशम से एक तात्कालिक हेतुरूप वृत्ति है, किंतु उपशम और क्षयोपशम से उत्पन्न हुई जो अवस्था है वह अवस्था चूंकि पौद्गलिक नहीं है और अवधिज्ञान पौद्गलिक को ही जानता हे तो क्षायोपशमिक सम्यक्त्व हुआ औपशमिक सम्यक्त्व है। जो प्रमाण हों उनको अनुमान जानता है। जो कम पौद्गलिक हैं और पौद्गलिक कर्मों की जो अवस्था हैउस अवस्था को ज्ञानी जान लेगा। क्षायोपशमिक अवस्था हे तो चूंकि कर्म सद्भावरूप में हैं तो उसे जान लेगा, लेकिन कर्मों के उपशम और क्षयोपशम का निमित्त पाकर जो आत्मा में औपशमिक और क्षायोपशमिक स्थिति हुई उसे अनुमान जानता है क्योंकि औपशमिक और क्षायोपशमिक का भाव अमूर्त है। प्रयोजन यह है कि कर्मों को जब हम जानते ही नहीं और परपदार्थों में हमारे सोचने से उनका विनाश नहीं, हम उन पर कुछ अधिकार नहीं रखते तो कर्मों का विनाश हो, ऐसा चिंतन अपायविचयी मुख्य न मानकर रागादिक भावों का विनाश हो ऐसा चिंतन चलता है। कर्म यद्यपि पौद्गलिक हैं और रागादिक भाव पुद्गल की अवस्था नहीं, आत्मा की विभाव अवस्था है इस कारण रागादिक भाव कर्मों से भी अधिक सूक्ष्म हैं। लेकिन रागादिकभाव हैं आत्मा के परिणमन, इस कारण उनका तो स्वसम्वेदन प्रत्यक्ष चलता है लेकिन कर्मों का परिज्ञान प्रत्यक्षरूप से नहीं होता।

रागादिक भावों का जो प्रत्यक्षज्ञान हुआ वह स्वसम्वेद्यरूप प्रत्यक्षज्ञान है, पारमार्थिक प्रत्यक्षज्ञान नहीं है। जैसे केवलज्ञानी पुरुष धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्य को प्रत्यक्ष जानता है इस तरह हम रागादिक भावों को प्रत्यक्ष नहीं जानते, किंतु स्वसम्वेद्य को पद्धति से प्रत्यक्ष जानते हैं। जैसे किसी चीज को हाथ में धरकर ‘यह’ शब्द का प्रयोग कर सकते हैं ना।‘यह’घड़ी है तो ‘यह’शब्द का प्रयोग होता है प्रत्यक्ष की चीज में और वह उस शब्द का प्रयोग होता है परोक्ष की चीज में। तो जब तक हम रागादिक भावों में बाहर हुए, इन रागादिक का विनाश हुआ, इस प्रकार जब तक हम ‘यह’ इस शब्द का प्रयोग न कर सकेंगे तो रागादिकभाव हमारे सुसम्वेदन में आते हैं और हम उसे सुसम्वेद्य के प्रत्यक्ष पाते हैं, उनका चिंतन करते कि ये नष्ट हों, दूर हों, ये मेरी बरबादी के कारण हैं। इस प्रकार के चिंतन करने का नाम है अपायविचय धर्मध्यान, इसका दूसरा नाम उपायविचय भी कह सकते। मोक्षमार्ग में उपायभूत जो निवृत्ति तत्त्व है उसका चिंतन होना सो अपायविचय धर्मध्यान है। जो भी उपाय है मोक्ष में लगने का है। यहाँ एक प्रत्यक्ष का प्रसंग चलाया है, और जिसमें ‘यह’प्रयोग करे, इसका विनाश करे, इससे होता है उसका घात। जैसे वैभव में इस शब्द का प्रयोग करते हैं वह हमारे स्वसम्वेदन में आकर प्रत्यक्षीभूत है, उसका उपाय विचारना सो अपायविचय धर्मध्यान है।


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