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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2140

From जैनकोष



इदमत्र तु तात्पर्यं श्रुतस्कंधमहार्णवात् ।

अर्थमेकं समादाय ध्यायंनर्थांतरं व्रजेत् ।।2140।।

पृथक्त्ववितर्कवीचार शुक्लध्यान में अर्थांतरब्रजन―इस शुक्लध्यान के लक्षण में तात्पर्य यह है कि इस ध्यान में अर्थादिक पलटते हैं । महान श्रुतस्कंध अर्थात् द्वादशांग शास्त्ररूप महासमुद्र लेकर किसी पदार्थ का अभी कोई ध्यान कर रहा था, अब थोड़े ही क्षण बाद दूसरे अर्थ का ध्यान करने लगता है । वीतराग ध्यान में जो पदार्थो के जानने का परिवर्तन चला करता है वह केवलज्ञान अथवा समूल चारित्र न होने से होता है । समूल चारित्र नष्ट होने से पहिले ऐसी ही आसक्ति रहती है कि ज्ञान का परिवर्तन चला करता है । इस ज्ञप्ति परिवर्तन की दशा में यह पृथक्त्ववितर्कवीचार शुक्लध्यान होता है ।


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