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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2199

From जैनकोष



शक्यते न यथा ज्ञातुं पर्यंतं व्योमकालयो: ।

तथा स्वभावजातानां गुणानां परमेष्ठिन: ।।2199।।

परमेष्ठी प्रभु के गुणों का ज्ञान किये जाने की अशक्यता―जैसे कोई आकाश और काल को मापे तो क्या उसके अंत को पा सकता है? नहीं पा सकता । इसी तरह स्वभाव से उत्पन्न हुए परमेष्ठियों के गुणों का कोई अंत भी पा सकता है क्या? नहीं पा सकता । कोई आकाश का आखिरी ढूंढ़ना चाहे तो वह पा सकेगा क्या? अगर आखिरी आया तो उसके बाद क्या है सो बतावो? या तो कहोगे कि पोल है या कहोगे कि पर्वत आदिक हैं । पर इस पोल का ही तो नाम आकाश है, और जो पर्वत आदिक हैं वहाँ भी आकाश है और उसके बाद भी कहीं भी जावो, सर्वत्र आकाश है । और फिर लोक इतना महान है कि जिसका अंत ही नहीं है । जैसे कोई आकाश का अंत समझना चाहे तो वह समझ से बाहर है इसी प्रकार भगवान के गुणों का कोई अंत समझना चाहे तो वह भी समझ से बाहर है । यह सब वैभव कैसे मिलेगा? कषायों का अभाव होने से । अपने आत्मस्वरूप का परिज्ञान हो, उसमें मग्नता हो तो यह वैभव प्राप्त होगा, पर इतनी कायरता है कि कषाय नहीं छोड़ सकते । क्रोध के कारण उपस्थित हों तो क्रुद्ध हो जाते हैं । जरा-जरा से प्रसंगों में लोग अपनी नामवरी का, अपने सम्मान का, घमंड का बर्ताव करते हैं, जरा-जरासी चीजों के लोभ में मायाचार बर्तते हैं, तृष्णा इतनी बेहद लगा रखी है कि जिसका कोई आरोपार नहीं । तो ऐसे बर्ताव वाले व्यक्ति कैसे हितमार्ग पर चल सकेंगे? नकल से काम न बनेगा । काम तो असलियत से ही बनेगा ।

तत्त्वप्रतीति बिना उत्कर्ष की अशक्यता―एक कोई लकड़हारा था, उसको जंगल में एक मुनिराज के दर्शन हुए । बैठ गया मुनिराज के पास और कहा―महाराज ! मुझे भी कुछ नियम दीजिए । तो मुनिराज ने कहा-णमो अरिहंताणं, इस मंत्र का हर जगह, हर स्थितियों में, हर समय जाप करो । लो वह घर चला आया, अब तो उसको उसी मंत्र की धुनि बन गई । कोई भी उससे कुछ कहे-वह उत्तर में णमो अरिहंताणं बोलता । स्त्री कहती―क्या कुछ कमाने न जावोगे? वह बोला―णमो अरिहंताणं ।....अरे ऐसे ही काम चल जायगा? णमो अरिहंताणं । एक बार स्त्री ने कहा―चलो खीर बनी है खा लो, वह बोला―णमोअरिहंताणं, रोष में आकर स्त्री ने हाथ पकड़कर खींचकर चौके में बैठा दिया और कहा अब तो खावो―वह बोला―णमो अरिहंताणं । तो उस स्त्री को गुस्सा आया और चूल्हे से एक अधजली लकड़ी उठाकर उसके सिर पर मारी । लकड़ी फट गई और उसके अंदर कुछ भरे हुए मोती बिखर गए । लो, वह तो अब मालोमाल हो गया । एक दिन पड़ौस की किसी सेठानी ने पूछा कि भाई तुम इतनी जल्दी कैसे धनिक बन गए? तो उसने सारा हाल कह सुनाया । उस सेठानी ने सोचा―वाह यह तो धनिक बनने का बड़ा ही अच्छा उपाय है । सेठजी से कहा कि तुम हर जगह हर समय हर स्थितियों में णमो अरिहंताणं कहना, फिर हम काम बना लेंगी । सेठानी ने खीर बनायी । कहा चलो खीर खा लो, सेठ बोला-णमो अरिहंताणं, सेठानी ने हाथ पकड़कर जबरदस्ती चौके में बैठा दिया और कहा अब तो खावो । तो वह सेठ बोला―णमो अरिहंताणं । सेठानी ने गुस्से का जैसा रूपक बनाकर एक अधजली लकड़ी उठाकर सेठ के सिर पर मारा, अब इधर उधर देखती हैं कि रत्न बिखरे या नहीं ।अरे वह तो नकल थी, असलियत थोडे ही थी । सेठ को कोई उस णमोकार मंत्र से श्रद्धा थी क्या? श्रद्धा तो न थी । तो श्रद्धा सहित अगर इतने ही पद का कोई जाप करे, पूर्ण णमोकार मंत्र की तो बात है ही, इस एक ही पद का कोई श्रद्धासहित जाप करे―मुझे कुछ न चाहिए, प्रभु की छत्रछाया चाहिए प्रभु का गुणस्मरण चाहिए, यों उस प्रभु की यदि कोई हार्दिक उपासना करे तो उस पर संकट नहीं ठहर सकते । हम पहिले श्रद्धा तो लायें ।मन को पवित्र बनाना सर्वप्रथम काम है । सो जो काम प्रभु ने किया, जिस भीतरी भाव की बात जो उन योगीश्वरों ने किया उस पथ पर चले तो हमारा भी जीवन सफल हो सकता है ।


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