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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 469

From जैनकोष



सामायिकादिभेदेन पंचधा परिकीर्तितम्​ ।ऋषभादिकजिनै: पूर्वं चारित्रं सप्रपंचकम्​ ॥469॥

पंच प्रकार के चारित्र में परिहारविशुद्धि ― ऋषभदेव आदिक तीर्थंकरों ने चारित्र को 5 प्रकार का कहा है ― सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसांपराय और यथाख्यातचारित्र । सामायिक नाम है रागद्वेष न करना, समतापरिणाम में रहना, समता परिणाम से कभी थोड़ा सा डिगे तो बहुत ही जल्दी फिर समतापरिणाम में स्थिर हो जाना यह है छेदोपस्थापना चारित्र । परिहारविशुद्धिचारित्र न भी हो तो भी मुक्ति हो सकती है, परिहारविशुद्धि एक विशिष्ट प्रकार की ऋद्धि होती है। उस ऋद्धिवान मुनि का जो परिहाररूप चारित्र है, हिंसा का जहाँ परिहार है, उसे परिहारविशुद्धिचारित्र कहते हैं । परिहारविशुद्धि संयमी मुनि के परिहार में किसी जीव की हिंसा नहीं होती ऐसी एक विशिष्ट ऋद्धि होती है । तो परिहारविशुद्धि एक स्वतंत्र चारित्र हुआ । वह भी सम्यक्​चारित्र का रूप है, किंतु जो आवश्यक है और जिस परिपाटी से संयम बढ़ता है और मुक्ति मिलती है उस परिपाटी से फिर विचार करें ।सामायिक, 6 छेदोपस्थापना चारित्र ― समतापरिणाम का नाम है सामायिक । समता से कुछ चलित हुए तो फिर समता में स्थिर होना इसका नाम है छेदोपस्थापना । छेद मायने डिग गया और उपस्थापना मायने लग गया । समता से डिगने पर फिर समता में लग जाने का नाम छेदोपस्थापना है ।सूक्ष्म सांपराय व यथाख्यात चारित्र ― सामायिक और छेदोपस्थापना के पुरुषार्थ से जब कषायें दूर हो जाती हैं और केवल सूक्ष्मलोभकषाय रह जाती है, क्रोध, मान, माया, वादरलोभ ये सब समाप्त हो जाते हैं, केवल सूक्ष्मसंज्वलनलोभ रहता है उसके भी नाश के लिए जो अंत:संयम चलता है वह है सूक्ष्मसांपराय संयम । और सूक्ष्मसांपराय भी जब दूर हो गया, विशुद्ध आत्मपरिणाम जग गया वह है यथाख्यात चारित्र ।आत्मनिर्मलता के स्तर से चारित्र के भेद ― सामायिक और छेदोपस्थापना छठे गुणस्थान से 9 वें गुणस्थान तक होते हैं, सूक्ष्मसांपराय संयम 10 वें और यथाख्यात चारित्र 11 वें से 14 वें गुणस्थान तक होते हैं । ये चारित्र के जो भेद किए गए हैं उन्नति के स्तर पर किये गए हैं कि किसी प्रकार योगिराज समता को प्रारंभ करके और समता की पूर्णता में आ जाते हैं इस दृष्टि से ये चारित्र के भेद कहे गए हैं । जिनको भी मुक्ति मिली है उन सबके सामायिक, छेदोपस्थापना, सूक्ष्मसांपराय और यथाख्यातचारित्र, ये चार प्रकार के चारित्र हुए, किन्हीं के परिहारविशुद्धि भी हुई हो तो उनके 5 प्रकार के चारित्र हुए । चारित्र के जो 13 अंग कहे गए हैं वे रात दिन जो चारित्र पाला जा रहा है व्यवहाररूप से उसमें 5 महाव्रत, 5 समिति और 3 गुप्तिरूप आचरण है । वह एक आभ्यंतर बाह्य से संबंध रखता हुआ अंग माना गया है । बाहुबली स्वामी ने एषणा समिति कहाँ पाला? दीक्षा लेने के बाद एक ही जगह पर खड़े रहे और मुक्त हो गए । यह बात जरूर है कि 13 प्रकार के चारित्रों का उन्होंने संकल्प किया था । उसके बिना तो मुनिपदवी ही नहीं है । अंत:कृत केवली हुए उपसर्ग केवली हुए, भरत जी ने भी मुनि दीक्षा लेने के बाद कहाँ आहार लिया तो उनमें ऐसी बाह्यदृष्टि से बुराई आ सकती है किंतु सामायिक, छेदोपस्थापना, सूक्ष्मसांपराय और यथाख्यातचारित्र ये चार बातें प्रत्येक में आई हैं तब मुक्त हुए ।


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