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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 853

From जैनकोष



न स्याद्धयातुं प्रवृत्तस्य चेत: स्वप्नेऽपि निश्चलं।

मुनै परिग्रहग्राहैर्भिद्यमानमनेकधा।।

परिग्रहपिशाचपीड़ित पुरुष की ध्यान में नितांत अक्षमता- जिस मनुष्य का चित्त परिग्रहरूपी पिशाच से पीड़ित हो गया है उसका चित्त ध्यान करते समय कभी भी स्वप्न में भी निश्चल नहीं रह सकता है। परिग्रह में अपनायत की बुद्धि जाती है तो उसका मन निश्चल नहीं रह सकता। जो हित का पंथ है, धर्म का तत्त्व है उसमें चित्त नहीं जा सकता। सो यह परिग्रह पिशाच की पीड़ा है। इस परिग्रह के कारण सभी लोग उसे किसी न किसी प्रकार से धोखा देकर उसका धन हड़पने की बात सोचते हैं। उस परिग्रह के कारण महान क्लेश होता है। तो जिसका चित्त परिग्रह से पीड़ित है उस पुरुष का चित्त कभी भी स्थिर नहीं हो सकता। जिस ज्ञानी संत का यह दृढ़ निर्णय है कि यह मेरा परमात्मतत्त्व शाश्वत निर्लेप है। कर्मउपाधि से कुछ यह बिगाड़ हो गया है कि इस शरीर का बंधन है, कर्मों का बंधन है, कर्मों के उदयवश सुख अथवा दु:ख भोगना पड़ रहा है लेकिन मेरा जो सहज स्वरूप है वह अत्यंत शुद्ध है, वह ज्ञानानंदमात्र है, ऐसे निर्णय वाले ज्ञानी संत का चित्त परपदार्थों में नहीं बसता, अतएव स्थिर रहता है। और, जिसने आत्मा का यह मर्म नहीं पाया वह पुरुष बाह्य पदार्थों में ही हित की आशा रख रखकर दु:खी होता है और अपना यह लोक भी बिगाड़ता है और परलोक भी बिगाड़ता है। तो चित्त स्थिर हुए बिना आत्मध्यान नहीं होता। आत्मध्यान बिना मुक्ति नहीं मिलती। अतएव रागद्वेष मोहादिक को हटाकर मैं ज्ञानमात्र हूँ, सबसे निराला हूँ, ऐसी प्रतीति बनायें। जो ऐसी प्रतीति बनाता है उसे इस भव के भी संकट नहीं आते और परलोक के भी संकट नहीं आते। तो धर्म करने के लिए केवल एक ही काम करना है। अपने आपको मैं सबसे निराला केवल ज्ञानस्वरूपमात्र हूँ, यह एक श्रद्धा अपने अंदर करनी है। यह श्रद्धा बन जाय तो आत्महित के लिए क्या क्या करना होता है, वे सब बातें इसके लिए सुगम हो जाती हैं। तो अपना कर्तव्य यह है कि सब परपदार्थों से न्यारे केवल ज्ञानस्वरूप में अपने आपको लगा लूँ और इस प्रतीति के ही अनुसार मैं अपने उपयोग का प्रयोग करूँ तो इससे शांति मिल सकती है। परिग्रह में चित्त बसाने से, तृष्णा बढ़ाने से इस जीवन में कभी शांति प्राप्त नहीं हो सकती। जो विवेकी पुरुष हैं वे परिग्रह को त्यागकर अपने विशुद्ध आत्मा का ध्यान करते हैं और मुक्ति पाने का उपाय करते हैं।


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