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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 18

From जैनकोष



सो चेव जादि मरणं जादि ण णट्ठो ण चेव उप्पण्णो।

उप्पण्णो य विणट्ठो देवो मरणुसुत्ति पज्जाओ।।18।।

जीववस्तु की उत्पादव्ययध्रौव्यात्मकता का एक प्रकाश―द्रव्य और जीव उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त हैं, इसी के समर्थन में यह गाथा बतायी जा रही है। जो द्रव्य पूर्वपर्याय के वियोग से एक अवस्था बनाता है और उत्तरपर्याय के संयोग से अवस्था बनती है तो दोनों ही अवस्थाओं को यह आत्मा अपने रूप करता हुआ तो नष्ट और उत्पन्न होता दिखाई देता है, पर दोनों अवस्थाओं में रहने वाला जो एक तत्त्व है जीवत्व, वह न उत्पन्न होता, न नष्ट होता है। अतएव पर्यायों के साथ इस जीवद्रव्य का स्वपना हो रहा है। सो कह लीजिए कि जन्म है और मरण है, पर जीवद्रव्य तो वही एक है। उसका न जन्म है, न मरण। जैसे कोई मनुष्य पुराने घर को त्याग करना ये घर में रहने लगे तो उसका मरण नहीं कहा जाता। किसी का भी मरण नहीं है। घर है, अपने में है। स्थान है अपने में है। यहाँ एक शंका की जा सकती है कि उत्पादव्ययध्रौव्य तीनों एक साथ कैसे एक पदार्थ में रहते हैं क्योंकि उत्पादव्यय तो अनित्यपने का धर्म है और ध्रौव्य होना नित्यपने का धर्म है। तो अगर नित्य है तो अनित्य कैसे और अनित्य है तो नित्य कैसे? जैसे ठंड और गर्मी इन दोनों का विरोध है, तो जहाँ ठंड है वहाँ गर्मी कैसे, जहाँ गर्मी है वहाँ ठंड कैसे? इस शंका का समाधान यह है कि कोई भी पदार्थ एकांत से न नित्य है और एकांत से न अनित्य है । जो एकांतत: नित्य अथवा अनित्य माने वहाँ ही दोष संभव है, किंतु यहाँ नित्यपना अनित्यपना अपेक्षा से है याने मूलतत्त्व की दृष्टि से तो पदार्थ नित्य है और अवस्था की दृष्टि से पदार्थ अनित्य है। तो जहाँ अपेक्षा से नित्य और अनित्य माना जाय वहाँ यह दोष संभव नहीं है। जिस अपेक्षा से नित्य माना उसी अपेक्षा से अनित्य कहा जाता तो अवश्य ही विरोध की बात थी, या जिस अपेक्षा से अनित्य माना उसी अपेक्षा से नित्य मान ले तो विरोध है, परंतु द्रव्यार्थिकनय से द्रव्यपने की अपेक्षा तो नित्यपना है और पर्यायार्थिकनय से पर्याय की अपेक्षा से पदार्थ में अनित्यपना है और वे दोनों एक साथ घटित होते हैं। तब मूल में यह बात युक्त है कि द्रव्य और पर्याय दोनों रूप ही सत् होता है। यदि कोई कुछ है तो वह सदाकाल रहेगा और उसकी अवस्था प्रतिसमय बनती रहेगी। द्रव्य और पर्याय ये दो तत्त्व अनिवार्य हैं पदार्थ में । तो जब द्रव्य और पर्याय का विरोध नहीं है तो नित्य अनित्य का भी विरोध उसमें संभव नहीं है, क्योंकि पर्याय रहित द्रव्य नहीं होता और द्रव्य रहित पर्याय नहीं होता। याने है क्या कोई वस्तु ऐसी कि जिसकी अवस्था कुछ होती ही नहीं और वह सत् हो? या है कोई क्या ऐसी वस्तु कि जिसमें पहले और बाद की अवस्थायें न पायी जाती हों और सत् हो। तो पर्यायमात्र भी कुछ नहीं और जो द्रव्यरूप हो ही नहीं, केवल एक पर्यायरूप ही हो, ऐसा भी कुछ है नहीं, क्योंकि जो किसी रूप में भी पहले नहीं है, उसका कोई रूप नहीं बनाया जा सकता। असत् का उत्पाद नहीं और सत् का विनाश नहीं। इस कारण द्रव्यार्थिकनय को जब मुख्य करके बोलते हैं तो जीव नित्य प्रतीत होता है और जब पर्यायार्थिकनय को मुख्य करके कहते हैं तो पदार्थ अनित्य प्रतीत होता है। पदार्थ में प्रतिसमय नवीन-नवीन पर्यायें होती रहती हैं। बस नवीन पर्याय हुई उसही का अर्थ यह है कि पुरानी पर्याय विलीन हो जाती है। इस तरह वस्तु कथंचित् नित्य और कथंचित् अनित्य स्वरूप है।


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