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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 6

From जैनकोष



जीवो पुग्गल कायो धम्म अधम्मो तहेव आयासं।

ते चेव अस्थिकाय परियट्टणलिंगसँजुता।।6।।

द्रव्य समूह―जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और आकाश ये अस्तिकाय तथा परिवर्तन के चिन्ह से जाना जाने वाले कालद्रव्य कर सहित ये सब द्रव्य होते हैं। ये समस्त द्रव्य तीन काल परिणमन कर रहे हैं, फिर भी नित्य है। इस गाथा में छहों द्रव्यों का वर्णन आया है। द्रव्य गुण पर्यायों के अभिन्न आधार होते हैं। जो भी पदार्थ है उसमें कोई न कोई परिणमन अवश्य है तथा उस परिणमन का आधारभूत शक्ति अवश्य है, शक्ति का नाम गुण है, परिणमन का नाम पर्याय है। जो भी सत् हे उसमें गुण पर्याय अवश्य होती है। गुण न हो केवल पर्याय हो ऐसा कुछ नहीं है, पर्याय न हो, केवल गुण हो ऐसा भी कुछ नहीं है। जो भी सत् है वह नियम से गुणपर्यायों का आधारभूत है। युक्ति से भी विचार लो। कोई चीज है तो उसका कोई रूपक तो होना ही चाहिए। कोई दशा, ढंग, परिणति उसकी होनी ही चाहिए, और दशा है वह एक वर्तमानरूप है अगले समय में और कुछ रूप हो सकती है, होती ही है।

प्रतिक्षण परिणमन―यदि ऐसा माना जाय कि जो रूपक है जो दशा जिस द्रव्य की है वही दशा रहेगी। सो भी नहीं बनता है। शुद्ध पदार्थों में ऐसी प्रतीति होती है कि जो दशा हुई है वही सदा काल रह रही है, किंतु, सूक्ष्म दृष्टि से वे सब दशाएं समान होकर भी भिन्न-भिन्न है, अर्थात् यह अमुक समय में अवस्था है, उसमें षड्गुण हानि वृद्धि होती ही रहती है, जितने भी पदार्थ हैं वे सब प्रतिक्षण अपना परिणमन करते रहते हैं।

परिणमनशीलता के कारण एक वस्तु का दूसरे में अभाव―पदार्थों में परिणमन करते रहने का स्वरूप सहज पाया जाता है। यही कारण है कि किसी पदार्थ के द्वारा किसी अन्य पदार्थ का परिणमन नहीं होता है। कोई पदार्थ यदि दूसरे पदार्थ को परिणमाये तो यह बतावो कि न परिणमते हुए को परिणमाता है या परिणमते हुए को परिणमाता है। यदि वह न परिणमता हुआ है तो कोई शक्ति ऐसी नहीं है कि जो परिणमता नहीं है उसे परिणमा दे। यदि परिणमते हुए को परिणमाता है तो वह तो स्वभावत:, परिणमता हुआ ही है। उसे दूसरा क्या परिणमाये। प्रत्येक पदार्थ यह स्वरूप रखता है कि वह प्रतिसमय परिणमता है, परिणमता रहेगा। द्रव्य त्रैकालिक पदार्थों का पिंड है। पर्यायों का प्रतिषेध कर दो तब द्रव्य किसे बतावोगे? पर्यायों से भिन्न निराला कुछ द्रव्य न समझ में आयगा। जैसे एक यह जीव द्रव्य है तो जो प्रतिसमय जाननहार या स्वभाव विभाव जब जो परिणमता है उस परिणाम रूप से परिणमता रहता है। वही तो जीव है।

परिणमनों से द्रव्यत्व की सिद्धि―परिणमनों से न्यारा द्रव्य स्वीकार करे तो फिर वह द्रव्य कैसा। जैसे एक अंगुली है, यह सीधी है, टेढ़ी है, किसी भी न किसी रूप में रहेगी। इस अंगुली की कोई दशा हम स्वीकार न करें न गोल न अन्य किसी प्रकार और भी कोई अंगुली हो यह कैसे होगा। जो पदार्थ सत् है वह किसी न किसी दशा में अवश्य रहता है यह वस्तु का स्वभाव है, तो पदार्थ अनादिकाल से है अनंत काल तक रहेगा, तो इसमें अनादि से प्रति समय पर्यायें होती आयी है। प्रत्येक वर्तमान में वर्तमान पर्याय होती ही है। भविष्य में अनंत काल में प्रतिसमय पर्यायें होती रहेगी। उन पर्यायों के स्वरूप से परिणत होने के कारण इन अस्तिकायों को द्रव्य कहा गया है। यों पदार्थ पर्यायों से अभिन्न रहता है। कुछ भी दशा न हो और सत् हो ऐसा कुछ हो ही नहीं सकता है। यदि पर्यायें न हो और पदार्थ मानते रहें तो वह कोरी कल्पना भर है। जैसे कि माताएँ बच्चों को हउवा-हउवा कहा करती हैं। वह हउवा क्या चीज है? कल्पना में जिसमें भय हो जाय, अस्थिरता हो जाय, बस वही उनका हउवा है। हउवा कोई पदार्थ नहीं है। वह जीव है या अजीव है, किस आकार का है। हउवा कोई चीज नहीं है कल्पना मात्र है, ऐसे ही ऐसा ब्रह्म माने कि जिसमें त्रिकाल कभी परिणमन होता ही नहीं है, तो वह ब्रह्म तत्त्व कुछ नहीं है।

स्याद्वाद की प्रतिपादनपुष्टता―स्याद्वाद की वस्तु के स्वरूप को बताने में समर्थ हो सकता है, तब ये पक्ष आ जाते हैं, एक पक्ष ब्रह्म को अपरिणामी मानता है और एक पक्ष प्रतिसमय नवीन-नवीन ब्रह्म उत्पन्न होते है यों मानता है, ऐसे दो पक्ष आते हैं। उनमें एकांत पड़ा हुआ है। उनका समन्वय स्याद्वाद कराता है। चीज तो वह एक है, वह है द्रव्य गुणपर्यायात्मक। द्रव्य दृष्टि से यह ब्रह्म अपरिणामी है अर्थात् यह ब्रह्म चैतन्य स्वभाव को त्यागकर अचेतन रूप त्रिकाल नहीं हो सकता, इस दृष्टि से उसमें रंच भी परिणमन नहीं है, किंतु कोई भी पदार्थ हो, परिणमन बिना रह नहीं सकता, तो इस ब्रह्म की जो प्रतिसमय पर्यायें होती हैं वे पर्यायें अनित्य हैं और उन पर्यायों सहित ब्रह्म प्रतिसमय नया-नया होता है, ब्रह्म उत्पन्न नहीं होता, किंतु जिसे हम आप कह सकते हैं किसी मनुष्य को कि यह बालक मनुष्य मिट गया, जवान मनुष्य मिट गया, वृद्ध मनुष्य मिट गया, एक मनुष्य होकर भी अवस्था सहित नाम लगाने से उसे समूचा ही उत्पन्न हुआ कह सकते हैं। उसमें पर्यायों की मुख्यता है। यों प्रत्येक पदार्थ गुण पर्यायात्मक है, गुणों की दृष्टि से यह नित्य है और पर्यायों की दृष्टि से अनित्य है। ऐसे ये समस्त द्रव्य नित्यानित्यात्मक हैं।

अनित्य होने पर भी नित्यता―यहाँ यह शंका नहीं करना है कि जब इस द्रव्य में भूत में भी परिणमन हो, भविष्य में भी परिणमन होगा, वर्तमान में भी परिणमन चलता है तो ये पदार्थ अनित्य हो गये। अनित्य नहीं है यद्यपि अवस्था की दृष्टि से अनित्य है तो भी उन समस्त पर्यायों में पदार्थ अपने प्रतिनियत स्वरूप का कभी परित्याग नहीं करते हैं इस कारण नित्य हैं।

प्रतिपाद्य विषय―इस ग्रंथ में मुख्यतया 5 अस्तिकायों का वर्णन है, पर इसके साथ काल द्रव्य के वर्णन की गुन्जाइश क्या निकली? यहाँ यह शंका हो सकती है कि जब ग्रंथ का ही नाम पंचास्तिकाय है और  अस्तिकायों का वर्णन है तो कालद्रव्य का हम वर्णन करें ऐसी गुन्जाइश कैसे निकल आयी है। जिसका नाम रख लिया है उसही का वर्णन करते रहना चाहिए। समाधान यह है कि ये  अस्तिकाय प्रतिसमय परिणमते रहते हैं, उनके परिणमन का निमित्त कारण क्या है? यह जिज्ञासा होती है। उसका उत्तर है कालद्रव्य। लोकाकाश के एक-एक प्रदेश पर एक-एक कालद्रव्य अवस्थित है और कालद्रव्य पर उस प्रदेश पर जो भी पदार्थ हैं उन पदार्थों के परिणमन का कारण उस कालद्रव्य की समय नामक पर्याय है। मोटे रूप में यह सोच लीजिए कि यदि समय न गुजरे तो पदार्थ का परिणमन कैसे होगा। जैसे किसी को कानपुर से बंबई जाना है, 8 बजे से वह जा रहा है तो कुछ समय गुजरेगा तब ही बंबई पहुंच सकेगा। 8 बजे चले-चले और 8 ही बजे पहुंच जाय ऐसा तो कभी हो नहीं सकता है। इस प्रकार यह तो चलने की बात कही है। रखी-रखी चीज पुरानी हो जाय, तो समय गुजरेगा तब ही तो पुरानी होगी। पदार्थों के परिणमन में कारण समय का गुजरना होता है।  अस्तिकायों का परिणमन जो बताया गया है उस परिणमन का कारण क्या है? उसके उत्तर में कालद्रव्य का प्रतिपादन करना पड़ा।

परिवर्तनलिंगता―पुद्गल आदि का पदार्थों के परिणमन का कारण यह कालद्रव्य है एक बात। दूसरी बात यह है कि पुद्गल आदिक का जो परिवर्तन होता है उस परिवर्तन से काल द्रव्य की पर्याय ज्ञात होती है। जैसे समय गुजरे तो कोई मनुष्य 10 कोश पहुंच गया। और 10 कोश पहुंचेगा तो यह ज्ञान होगा कि कितना समय हो गया है इन दोनों का परस्पर में ज्ञान कराने का सहयोग है। समय गुजरा तब परिणमन हुआ तो उससे यह जाना कि समय गुजरा। जैसे दिन में 12, 14 घंटे गुजरते हैं तो उनमें से सूर्य पूर्व से पश्चिम में पहुंच जाता हैं, और समय गुजरता हैं यह हमने कैसे जाना कि जब सूर्य पूर्व से पश्चिम में पहुंचेगा तब ख्याल होता है कि ओह ! 12-13 घंटे समय गुजर गया है, उस काल द्रव्य को यों छोड़ा नहीं जा सकता। इसका वर्णन आवश्यक है करना। यह काल बहुप्रदेशी नहीं है इसलिए अस्तिकाय नहीं माना है। पर समस्त पदार्थों के परिणमन में कारणभूत यह कालद्रव्य है। कालद्रव्य का समय नामक परिणमन जीव के परिणमन में कारण है। पुद्गल, धर्म, अधर्म और आकाश इन सबके परिणमन में कारण है और साथ ही कालद्रव्य के परिणमन में भी कारण है। कालद्रव्य भी परिणमन में कारण है।

आकाश द्रव्य की अखंडता―आकाश एक है, अखंड है, इसके व्यवहार से दो भेद कर डाले हैं, लोकाकाश और अलोकाकाश। जितने आकाश में समस्त द्रव्य रहें उतने आकाश का नाम लोकाकाश है और इससे बाहर के आकाश का नाम अलोकाकाश है। इतने संबंध के भेद कर देने से कहीं आकाश के दो टुकड़े नहीं हो जाते हैं। यह एक अखंड है। अब यहाँ एक जिज्ञासा हो सकती है कि लोकाकाश में कालद्रव्य है ही नहीं, वहाँ तो केवल आकाश ही आकाश है। तो वहाँ के आकाश का परिणमन कैसे होगा। यह आकाश अमूर्त है। यह आंखों दिखता नहीं है। दिखने वाली चीज मूर्तिक होती है। केवल पुद्गल ही आंखों देख सकते हैं, अन्य कोई द्रव्य आंखों नहीं दिखते है, उस पर भी आकाश वास्तविक सत् है, उसमें अविभागी अनंत प्रदेश हैं उनका प्रतिसमय परिणमन होता है। वह एक अखंड आकाश है। उसके बारे में यह जिज्ञासा होती है कि लोकाकाश का परिणमन कैसे होगा क्योंकि वहाँ कालद्रव्य है नहीं अर्थात् पदार्थ के परिणमन के लिए यह आवश्यक नहीं है कि उस पदार्थ के चारों ओर निमित्त रहें, निमित्त किस ओर हो, किस ढंग से हो वह परिणमन में निमित्त होता हैं।

अखंड अनुभवन―जैसे पैर में कांटा चुभ जाय तो सारे जीव प्रदेश में दु:ख होता है। यहाँ यह आवश्यक नहीं हैं कि जीव जितना बड़ा है सब ओर से एक साथ कांटा चुभे तब दु:खी हो उस कांटे के चुभने का वह किसी एक तरफ से कैसा ही निमित्त हो वह तो दु:ख का सर्व प्रदेशों में कारण हो जाता है, क्योंकि यह जीव अखंड है ना। जो पिंड अखंड नहीं है उसके लिए तो जहां निमित्त होगा वहाँ परिणमन है। जैसे यह चौकी पदार्थ है, यह एक अखंड चीज नहीं है, अनंत परमाणुवों का यह पिंड है, इस कारण जिस खूंट में अग्नि लगी होगी वही खूंट जलेगा, कहीं सारी चौकी न जलेगी कि चौकी एक पदार्थ है ही नहीं, अखंड है ही नहीं, जो अखंड पदार्थ है उसके लिए निमित्त किसी भी ओर हो, समूचे पदार्थ के परिणमन के लिए निमित्त होता है। चूंकि यहाँ कालद्रव्य है और यह निमित्त आकाश के परिणमन में है तो समूचा आकाश एक साथ एक परिणमन से परिणमता रहता हैं।

षड्द्रव्य―यों काल, द्रव्य, पुद्गल आदिक के परिवर्तन में कारण है और पुद्गल आदिक के परिवर्तन से कालद्रव्य का ज्ञान होता हे, इस कारण अस्तिकाय से इसका निमित्त नैमित्तिक संबंध है इसी कारण इस कालद्रव्य को यहाँ बताया जा रहा है, और साथ ही इसका नाम धरा परिवर्तनलिंग। चाहे काल कहो, चाहे परिवर्तनलिंग को दोनों एक दोनों एकार्थक हैं। परिवर्तनलिंग का अर्थ यह है कि जो समग्र पदार्थों के परिणमन में कारण हो। यों काल सहित  अस्तिकाय षड्द्रव्य कहलाते हैं।

भेदविज्ञान का शिक्षण―इस प्रकार से हमें यह जानना है कि इस लोक में अनंतानंत जीव हैं, अनंतानंत पुद्गल हैं। एक धर्मद्रव्य, एक अधर्मद्रव्य, एक आकाशद्रव्य असंख्यात कालद्रव्य हैं, इन सब द्रव्यों में एक यह निज जीवास्तिकाय ही उपादेय है, यह जीवास्तिकाय मेरे ही देह के अंतर्गत है। कल्याण का निधान, आनंद का धाम प्रभुता से संपन्न यह भगवान अपने देह में विराजमान हैं, पर मोह का कैसा नशा छाया है कि वह स्वयं अपने आपको नहीं जान पा रहा है। जो इंद्रिय आदिक साधन मिले हें भूल में भटकने और बहकाने के लिए उन साधनों के द्वारा हम बाह्य में देखा करते हैं, और जो कुछ नजर आता है उसे हम सही मान लेते हैं। झूठ को यथार्थ मानने के कारण राग और द्वेष बढ़ते हैं, इस जीव पर संकट है तो राग और द्वेष का है अन्य कुछ नहीं है? इस जीव को अपने सही स्वरूप का विश्वास नहीं है, सो जबरदस्ती आशा करके भिखारी बनकर परपदार्थों को अपनाता है, यह मेरा है, यह मेरे मन माफिक रहें ऐसी बुद्धि बनाये है इसी कारण क्लेश होता है। इस मोही को यह अपनी खबर नहीं है कि यह मैं आत्मतत्त्व इस देह में बसकर भी देह से निराला शुद्ध ज्ञानानंदस्वरूप हूं।

मोह का बोझ―कोई अपने आपमें मोह का बोझ लाद ले तो यह संसार में ऊपर तिरता रहता है। जीव पर मोह का बहुत बड़ा बोझ है। कभी-कभी आप ऐसा भी अनुभव करते होंगे कि जब हमारे मोह, राग, चिंता बहुत सताती है तो ऐसा लगता है कि स्वयं बड़े वजनदार हैं। यद्यपि मोह में वज़न नहीं होता, मोह की कल्पनावों से यह जीव बोझल हो जाता है औ अपने को हल्का ज्ञान ज्योति स्वरूप आनंदस्वरूप नहीं मान सकता है। आनंद के अनुभवन के समय यह जीव अपने को हल्का अनुभव करता हे और मोह की परिणत के समय अपने को बोझल अनुभव करता है। यह मोह हटे और यह भाव बने कि मैं सर्व से विविक्त हूं। किसी पर न मेरी मालिकाई है न कर्तव्य है, न भोक्तृत्व है, न अधिकार है। सभी अपने स्वरूप से हैं, पर के स्वरूप से नहीं हैं, फिर ऐसे सहज स्वतंत्र पदार्थ में यह मानने की जबरदस्ती करना कि यह इनका है, यह मेरा है, इससे मेरा हित है, इससे मुझे सुख है आदिक मान्यताएँ बनाना यह तो जीव के लिए अहितकारी ही बात है।

समाधिशरण―भैया ! इन समस्त पदार्थों में छाट लो―तुम्हारे लिए शरण क्या है? तुम्हारे लिए मंगल क्या है? शरण हे मेरे लिये मेरे ही शुद्ध ज्ञायकस्वरूप का अनुभव। इसके अतिरिक्त सभी उपयोग मेरे को दु:ख के ही कारण हैं। यह मैं शुद्ध जीवास्तिकाय स्वसम्वेदन ज्ञान से ही जाना जा सकता हूं, पाया जा सकता हूं। ज्ञान से ही जिसका समस्त स्वरूप भरा हुआ है, ऐसे इस शुद्ध जीवास्तिकाय को मैं ऐसे ज्ञान से जानूँगा जो ज्ञान सहज अपूर्व उत्कृष्ट आनंद सहित रहता है। जिस ज्ञान के साथ अधोरता व्यवस्थित रहती हो उससे हम अपने स्वरूप को नहीं पहिचान सकते हैं। जो ज्ञान सहज आनंद लेता बर्त रहा है उससे मैं अपने आपको अनुभव सकता हूं। ऐसा ज्ञान समाधि भाव से उत्पन्न होता है। समाधि तब होती है जब रागद्वेष क्षीण होते हैं। रागद्वेष क्षीण तब होंगे जब हम रागद्वेष सहित केवल ज्ञातादृष्टा निजस्वरूप का श्रद्धान करें, इस ही का ज्ञान करें, और इसके ही ज्ञान में हम रमण करें, तो इसमें समाधि उत्पन्न होगी, सहज आनंद जगेगा, और उस आनंद के ही साथ इस ज्ञान के द्वारा अपने आपका अनुभव कर लेगा।

संकटहारी अनुभव―यह जीव प्रतिसमय अपने को किसी न किसी रूप अनुभव करता रहता है। कोई यों अनुभव करता है कि मैं अमुक घर का हूं। अमुक वर्ण का हूं, अमुक पोजीशन का हूं। ये सब अनुभव संसार बढ़ाने के कारण हैं। बजाये इसके ऐसा अनुभव चले कि मैं केवल ज्ञानस्वरूप हूं, आनंदघन हूं, सबसे निराला हूं, अपने स्वरूप हूं। इस प्रकार शुद्ध निज स्वरूप मात्र अपनी प्रतीति बने तो उसमें ऐसा आनंद प्रकट होता है कि जिससे भव-भव के बांधे हुए कर्म भी नष्ट हो जाते हैं। इसके लिए हमारा यह यत्न हो कि जो हमने अब तक देखा सुना या भोगा, ऐसे समस्त परद्रव्यों के आलंबन से अहित माने। और आहार, निद्रा, भय, मैथुन, परिग्रह इन संज्ञावों में अपना उपयोग न फंसायें। ये अहितरूप ही हैं। मेरा आत्मतत्त्व मेरे शुद्ध स्वरूप का उपयोग ही मेरे लिये हितरूप है, इस तरह की प्रतीति में रहे तो हम निज शुद्ध जीवास्तिकाय को पा सकते हैं। समस्त प्रदेशों का सार और प्रयोजन इतना ही है कि सर्व विकल्प संकल्पों से हटकर निज ज्ञानस्वरूप में अपना उपयोग स्थिर रहे, जिसके होने से सर्व संकट दूर होंगे।


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