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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 9

From जैनकोष



दवियदि गच्छदि ताइं ताइं सब्भावपज्जयाइं जं।

दवियं तं भण्णंते अणण्णभूदं तु सत्तादो।।9।।

क्लेशविनाश का कारण स्वरूपरिच्छेदन―जीवों को जो दुःख का कारण है उस कारण को मेटने की परम आवश्यकता है। दुःख का कारण क्या है? मोह। परपदार्थ दुःख का कारण नहीं है, परपदार्थ अपनी सत्ता में है, अपनी परिणति में है, अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से हैं, उससे मुझ में क्या आयगा? वह मुझ में क्या परिणमन करता है? कोई परपदार्थ किसी दूसरे का परिणमन नहीं करता, परंतु परवस्तुवों के संबंध में जो कल्पना जगती है, मोह जगता है बस यह ही अज्ञान भाव दु:ख का कारण है। तो इस मोह को मिटाया कैसे जाय? बिल्कुल सीधा उत्तर है। पहले यह बताओ कि मोह होता क्यों है? मोह नाम किसका है? मोह नाम है परपदार्थ में अपना लगाव रखना। तो बस उत्तर हो गया। मोह मिटाना है ना, तो परपदार्थों में अपना लगाव न रखो, मोह मिट गया। परपदार्थों में लगाव न रखें―इसकी तरकीब क्या है? इसकी तरकीब यह है कि यह ज्ञान में लाये कि पर की सत्ता अलग और मेरी सत्ता अलग, पर मेरा कुछ नहीं और मैं पर का कुछ नहीं, यह समझ हो तो मोह मिटेगा। यह समझ कैसे हो? इसके लिए पदार्थों के स्वरूप का परिचय बनायें। इससे पहली गाथा में सत्ता के संबंध में बात चली थी। सत्ता सब पदार्थों में है, सर्व रूप है, सर्व पर्यायों में है, प्रतिपक्षसहित है, उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य में है, सो कहीं वह सत्ता पदार्थ से अलग चीज नहीं हैं। सता का वर्णन करना पदार्थ का ही वर्णन कहलाता है। सत्ता से अलग गुण मानने वाले योग आदिक हैं जो सत्ता के संबंध से पदार्थ को सत् मानते हैं। पर ऐसा नहीं है। सत्ता और पदार्थ में अभिन्नता है, भिन्न दो चीजें नहीं हैं। जैसे बोरे में गेहूं या चने वगैरा भरे हों ऐसी कहीं पदार्थ में सत्ता पड़ी हो सो बात नहीं, क्योंकि सत्ता का संबंध लगाने से पहले पदार्थ है या नहीं, यह बताओ। अगर सत्ता का संबंध जोड़ने से पहले पदार्थ है तो अब सता के संबंध की जरूरत क्या रही? वह तो है ही और अगर नहीं है तो क्या असत् में सत्ता जोड़ी जा सकती है? फिर तो खरगोश के सींग और आकाश के फूल आदिक में भी सत्ता जुड़ बैठेगी, सो ये भी सत् बन जायेंगे। तो सत्ता पदार्थ से अलग नहीं। जब पदार्थ का वर्णन किया तो सत् का वर्णन हो गया। पदार्थ का सही-सही स्वरूप जान लेंगे तो मोह मिट जायगा।

अज्ञानांधकार में मोहलीला―यह अज्ञान क्यों बसा है जीव को कि जो घर में बालक हुआ है उसकी तो शकल सूरत बड़ी इष्ट लगती है और ऐसा मान लेते कि यह तो मेरा है, उससे भी अच्छे बालक हों तो उनके प्रति भाव ही नहीं जाता कि ये मेरे हैं। ऐसा क्यों है? मोहवश। अज्ञान है, स्वपर का विवेक नहीं है, पदार्थों के स्वरूप का भान नहीं है। एक सेठ के यहाँ नई नौकरानी आयी। उस सेठ का बच्चा एक स्कूल में पढ़ता था। उस दिन वह बच्चा अपना खाना न ले गया। उसी गांव की वह नौकरानी थी तो सेठानी ने कहा उस नौकरानी से कि जावो यह मेरा डिब्बा ले जावो, इसमें खाना रखा है, इसे मेरे बच्चे को अमुक स्कूल में दे आवो। तो नौकरानी बोली कि हम तो आपके बच्चे को पहचानते ही नहीं, तो सेठानी गर्व से बोली कि अरे मेरे बच्चे को क्या पहिचानना? उस स्कूल में सारे बच्चों में जो सबसे प्यारा बच्चा लगे उसे दे आना। उस सेठानी को यह गर्व था कि बस सबसे अच्छा तो मेरा ही बच्चा है। नौकरानी चली। उसने उस स्कूल में दृष्टि दी, कौन है वह प्यारा बच्चा जिसको खाना दें। देखते-देखते उसी स्कूल में नौकरानी का लड़का भी पढ़ता था, उसे तो वह ही बच्चा प्यारा लगा और खाना उसी को देकर घर लौट आयी। अब सेठ का बच्चा शाम को लौटकर घर आया तो बोला माँजी ! आज तुमने हमारे लिए खाना क्यों नहीं भेजा था? तो सेठानी बोली―भेजा तो था। नौकरानी को बुलाकर पूछा―क्या तूने मेरे बेटे को खाना नहीं दिया? तो नौकरानी बोली―मालकिन दिया तो था। तुमने ही तो कहा था कि उस स्कूल में जो सबसे प्यारा बच्चा लगे उसे खाना दे आओ, सो मुझे तो सबसे प्यारा मेरा ही बच्चा लगा सो उसी को खाना दे आयी थी। सो घर-घर बात देखो, सबकी रुचि न्यारी-न्यारी है, जीव सब समान हैं, एक स्वरूप वाले हैं, सब अपने-अपने सत्व में ही रहते हैं तो यह क्या है? सबसे पूछ लो तुम्हें कौन प्यारा लगता है? तो सबका उत्तर वही होगा। सब अपना-अपना बतायेंगे, औरों के प्रति सद्भावना ही नहीं जगती। तो यह क्या है? मोहांधकार। यह मोहांधकार कैसे मिटे? पदार्थों के स्वरूप का सही-सही निर्णय होने से मोह मिटता है।

मोहविनाश का उपाय, पदार्थों की परस्पर विविक्तता के तथ्य का परिचय―मोहविनाश का अमोघ उपाय जैनशासन में बड़ी अद्भुत सही शैली से कहा है। द्रव्य के बारे में स्पष्ट ले एकत्वविभक्त स्वरूप याने प्रत्येक पदार्थ अपने स्वरूप में तन्मय और अन्य सर्वपदार्थों से त्रिकाल न्यारा है, ऐसा स्पष्ट स्वरूप जैनशासन में है। बच्चे लोग भी प्रारंभ से ही पढ़ते हैं ना कि द्रव्य 6 प्रकार के होते हैं―जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल, पर वे बच्चे उन 6 प्रकार के पदार्थों का महत्व क्या समझे? बल्कि उन बच्चों के पढ़ाने वाले भी ठीक-ठीक नहीं समझते। यह धर्म प्रवेश का प्रारंभिक परिचय है। उन 6 प्रकारों में तो क्या, व्यक्ति-व्यक्ति में अर्थात् जीव जाति में अनंतानंत जीव हैं। वे प्रत्येक जीव अन्य जीवों से भिन्न अन्य सर्व पदार्थों से भिन्न अणु-अणु समस्त से भिन्न हैं, इसके लिए द्रव्यगुण-पर्याय की विधि समझनी होगी। पदार्थ किसे कहते हैं, जो अपनी परिणतियों को प्राप्त करे उसे द्रव्य कहते हैं। द्रव्य अपनी परिणतियों को ही पाता है, अन्य की परिणतियों को नहीं। परिणति अपने स्रोत में ही होती है, पर में नहीं। द्रव्य के लक्षण से ही ये सब तथ्य ज्ञात हो रहे हैं। यहाँ कह रहे हैं―द्रवति गच्छति, जो अपनी पर्याय को द्रवे, जावे, पावे उसे द्रव्य कहते हैं। यद्यपि द्रवति का ही अर्थ है गच्छति, फिर भी आचार्य महाराज ने जो दो शब्द दिये हैं उससे यह ध्वनित होता है कि स्वभावपर्याय को तो द्रवे और विभावपर्याय को पावे। यह एक शब्द भेद जब यहाँ पड़ा है तो उससे तथ्य निकालने की कला से समझना, और इस आशय में द्रवने का अर्थ सहजस्वभाव में से सहजस्वभाव के अनुरूप उसमें मिला हुआ एक पर्याय की व्यक्ति होना, और पाने का नाम क्या है? जो पाना है व जो कुछ पाया जाता है उसमें विषमता होती है, कुछ अलग लक्षण का भान होता है। तो जो विभाव पर्यायें हैं वह विपरीत परिणमन है, इसलिए उनके बारे में पाना बोलते हैं। द्रव्य स्वभावपर्याय से तो द्रवता है और विभावपर्याय को पाता है, यह बात इस सूत्र में द्रवति, गच्छति दो शब्द बोलने से समझी जा रहा है। वहाँ मूल सिद्धांत से ऐसा एकांत नहीं है, क्योंकि द्रवति दोनों पर्यायों के लिए आता है। तो प्रत्येक पदार्थ अपने में अपनी अवस्थाओं को व्यक्त करता है, यह बात इस गाथा में समझने की है। अब इसको हर जगह घटाते जाइये―आप अपने में अपनी पर्यायों को प्रकट करते हैं। एकद्रव्य का दूसरे द्रव्य पर कुछ अधिकार भी क्या? जो अधिकार का श्रम लग रहा है, मेरा इस मित्र पर अधिकार, बालक पर अधिकार, अमुक पर अधिकार, सो यह तो पुण्ययोग, कषाय की अनुकूलता, एक प्रकार की भावना वालों का संग, ये सब कारण हैं, जो अनुकूल बातें होती जाती हैं, पर वहाँ भी प्रत्येक जीव का भाव अपना-अपना है। एक का दूसरे से कोई संबंध नहीं है, अधिकार नहीं है।

पदार्थों की परस्पर विविक्तता के परिचय का दृढ़ प्रभाव―पदार्थों की परस्पर विविक्तता का तथ्य जब विदित होता तो मोह नहीं रहता। भले ही पहले अज्ञान संस्कार के कारण राग रहेगा, लगाव रखेगा, संबंध भी बनायेगा, पर समझ सब जायगा कि है कुछ नहीं यह। ज्ञानी पुरुष जब चाहे एक साधारण घटना का ही निमित्त पाकर मोह को त्यागकर, गृहवास तजकर दीक्षा लेने में जो विलंब नहीं रखते और दूसरे लोग समझायें तो भी अपने निर्णय से नहीं चिगते, इसका कारण है कि उनको स्पष्ट विशुद्ध ज्ञान जग गया है। अब किसी के बहकावे में, फिर पुरानी आदत में वे नहीं आ सकते। जैसे बहुत दूर कोई रस्सी पड़ी हो और कोई उसे साँप समझ ले तो जब तक वह सांप समझ रहा था तब तक उसे आकुलता है, बेचैनी है, भय है, प्रयास करता है, दूसरों को बुलाता है, और कदाचित् थोड़ा ऐसा ख्याल रखे कि जरा देखें तो निकट जाकर कि कैसा यह साँप है, निकट गया, कुछ ऐसा लगा कि यह तो कोई चीज पड़ी है, और निकट गया, खूब देखा तो भली-भाँति समझ गया कि यह तो रस्सी है और हाथ से उठाकर निर्णय भी कर लिया कि यह तो रस्सी ही है, उसके बारे में जब ज्ञान हो गया कि यह रस्सी ही है, साँप नहीं, तो अब ऐसे ज्ञान वाले पुरुष को कोई दूसरा अगर बहकाये―कहे कि वह तो साँप है, मान लो साँप है। पहले वाली बात पर जरा आ जावो, तुम जरा वैसा अपना डर तो बनाओ, तुम जैसा भय पहले करते थे जरा वैसा भय करके तो दिखाओ तो क्या वह दिखा सकेगा? नहीं दिखा सकता। जब ज्ञान हो गया कि यह साँप नहीं है तो पहले जैसे भ्रम को वह कैसे लादे? वह किसी दूसरे के बहकावे में आ नहीं सकता, तो ऐसे ही समझ लो कि प्रत्येक पदार्थ का स्वरूपास्तित्व आवांतर सत्त्व प्रत्येक का उसही प्रत्येक में है। एक का दूसरे में कुछ नहीं, तो कैसे फिर यह बहक सकता है? दूसरे के भुलावे में भी कैसे आ सकता है? तो पदार्थों के स्वरूप का निर्णय मोह को मिटाने का उपाय है।

पदार्थों की गुणपर्यायमयता व परिपूर्णता―पदार्थ याने जो है सो। सत् का वर्णन किया जा रहा है। जो अपने सत् को याने गुणों को और क्रमभावी याने पर्यायों को जो पाये वह द्रव्य। द्रव्य में गुण और पर्यायों का परिचय कीजिए। कोई पदार्थ है, है तो उसका स्वरूप है ना, स्वभाव है ना, वह एकरूप है। जो भी है अवक्तव्य है, पर उस एकरूप स्वभाव को जानने के लिए भेददृष्टि से गुणों का कथन होता है और व्यवहार से तो निश्चय में समझी जाने वाली बात का परिचय मिलता है। आत्मा है, वह एक स्वभावी है, चैतन्य स्वरूप है। उसको समझाने के लिए कहा गया है कि जो जाने सो आत्मा, जो देखे सो आत्मा, जो रमे सो आत्मा। यहाँ कोई गुण अलग-अलग पड़े हुए नहीं हैं, क्योंकि वह एक सत् है, एक सत् है तो एक स्वरूप है, एक स्वरूप है तो एक पर्याय है, पर उस एक परिणति को समझने के लिए व्यवहार से भेद करके नाना पर्यायें कही जातीं, जिनसे कि शक्तियाँ समझी थीं, तो ऐसा जो शक्तियों से और पर्यायों से अभिन्न है वह पदार्थ है, वह पदार्थ सद्भूत है, स्वयं सत् है, उससे सत्ता न्यारी नहीं। है बस ‘है’ को समझना है। जो भी है वह कैसा है? अपने में परिपूर्ण है। यहाँ कुछ काम अटका नहीं है किसी का । किसी भी मनुष्य का, जीव का कोई काम नहीं अटका ऐसा कि कुछ बात अधूरी रह गई, हमारा अस्तित्व अधूरा रह गया, निर्माण पूरा नहीं बना, ऐसी कुछ बात तो है नहीं, यह जीव अनादि से पूर्ण अस्तित्व वाला है, अनादि से यह परिपूर्ण है अन्यथा यह बतलावो कि पुद्गल को तो कोई अधूरापन नहीं है कि इसका अभी कोई काम बाकी रह गया। प्रत्येक पदार्थ है, परिणम गया जिस रूप परिणम गया। चौकी है, जल गई तो जल गई, रखी है तो रखी है। जिस किसी भी अवस्था को प्राप्त हो, उसमें अधूरापन तो कहीं भी नहीं है कि यह चीज अभी आधी है। चौकी है तो वह भी पूरी, जल गई तो भी पूरी है। जो पदार्थ जिस किसी अवस्था को प्राप्त है वह पूरा है। वहाँ अटका कुछ नहीं है। यही बात जीव की है। जीव भी हर समय पूरा है, इसको अटका कुछ नही, जिस चाहे अवस्था को प्राप्त हो, मगर यह जीव चेतने वाला है, विकल्प करता है,, समझ बनाता है तो उसका दुरुपयोग कर रहा है विकल्प करके और उस विकल्प में अपने को अधूरा मान रहा। यह काम न बना तो मैं अधूरा ही रहा, यह अधूरा ही है। असंतोष ज्ञानी को क्यों नहीं है कि वह जानता है कि मैं परिपूर्ण हूँ, मुझ में अधूरापन है ही नहीं, अज्ञानी को संतोष क्यों नहीं होता? वह हर जगह समझता कि मैं अधूरा हूँ, मेरा यह काम हो जाय तब मैं पूरा कहलाऊँ। जब तक यह काम न बन जाय तब तक हम कुछ न कहलायेंगे, इतनी बाहर में बात बन जाय तो हम कृतकृत्य हो गए। ऐसा अपने को अधूरा मानता है, यह ही जीव को कष्ट की चीज है। लो देखो भैया ! जैसे कहते हैं ना कि कभी-कभी वरदान भी अभिशाप बन जाता है, तो ऐसे ही देखो इस जीव का ज्ञानस्वरूप है ना तो इस मोही के लिए अभिशाप बन गया, विकल्प बन गया, है पवित्र स्वरूप, मगर दुरुपयोग की यह हालत है।

पदार्थों के साधारण गुणों के परिचय से ही भेदविज्ञान की शिक्षा का प्रारंभ―प्रत्येक पदार्थ अपने द्रव्य में है, अपने प्रदेश में है, अपने गुणों में है, अपनी अवस्था में है। द्रव्य के समझने के जो 6 साधारण गुण हैं वे साधारण गुण ही भेदविज्ञान का प्रकाश करा देते हैं, फिर असाधारण गुणों से ही प्रकाश बढ़ाया। पहले तो साधारण गुणों को ही देख लीजिए। यह जताते हैं कि प्रत्येक पदार्थ एक दूसरे से अत्यंत निराले हैं। जैसे पहला गुण है अस्तित्व। ‘‘है’’ यह एक वस्तु परिचय का प्रारंभ बनाता। पहले कोई चीज है तब तो उसके बारे में आगे चर्चा बढ़ाये। तो पहले यह तो निर्णय बनायें कि पहले पदार्थ को अस्तित्व गुण ने बताया, पर इसमें कुछ स्पष्ट भान न हो सका, क्योंकि प्रत्येक पदार्थ न्यारे-न्यारे हैं, यह बात समझ में आये तो स्पष्ट भान होगा, उसको बताया वस्तुत्व गुण ने। जो अपने स्वरूप से हो, पर के स्वरूप से न हो वह पदार्थ अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से सत्ता से हो, पर के द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से सत् न हो, ऐसी व्यवस्था वस्तुत्व गुण ने बताया। देखो इसका कैसे प्रकाश दिया? तो जो बात वस्तु में है वह बतानी पड़ती है। तीसरा गुण है द्रव्यत्व। पदार्थ है तो निरंतर परिणमन करता रहता है, एक भी समय, किसी भी समय परिणमे नहीं, तो वह पदार्थ है भी नहीं रह सकता, यह द्रव्यत्व गुण बता रहा है। अच्छा, प्रत्येक पदार्थ निरंतर परिणमता रहेगा, जानते तो हैं सब, मगर एक इस क्रम में अभी तक यह बात आयी कि पदार्थ परिणमता है, कोई पदार्थ किसी दूसरे रूप भी परिणम जाय, इसका तो कोई निषेध नहीं हो पाया अब तक। तो इसमें अगुरुलघुत्वगुण ही यह व्यवस्था बनाता है, क्योंकि वह पदार्थ न गुरु बन सकेगा, न लघु। जो है सो ही रहेगा। इस कारण पदार्थ किसी दूसरे के परिणमन को नहीं करता। अगर एक पदार्थ दूसरे के परिणमन को कर दे तो इसका अर्थ है कि खुद तो हो गया हल्का । अपना परिणमन दूसरे को दे दिया और दूसरा हो गया वजनदार, ऐसा कोई गुरु, लघु नहीं बनता। प्रत्येक पदार्थ अपनी-अपनी परिणति से परिणमता है, भले ही निमित्त नैमित्तिक संबंध कितना ही घनिष्ठ कठिन हो, अनिवार्य हो, लेकिन परिणमता खुद-खुद ही है, एक दूसरे रूप नहीं परिणमता। इसी को कहते हैं कि एक दूसरे की परिणति को नहीं करता। यह बात जब स्पष्ट समझ में आये तो वहाँ मोहभाव नहीं रहता।

अकिंचनभाव की आराधना में सिद्धि समृद्धि―अब रह गई यह बात कि मोह न रहे, फिर भी उसका लगाव रहता है कभी कुछ समय तक। वह तो एक परिस्थिति की बात है, पर अंतः प्रकाश बना हुआ है कि एक दूसरे का कुछ नहीं है। इससे अपने को क्या बात लेनी है कि सबसे न्यारा अपने को केवल ज्ञान मात्र निजस्वरूपमात्र निरखना है, मैं ज्ञानमात्र हूँ, सहज स्वभावमात्र हूँ, अपने प्रदेशों में हूँ, अपने में ही अपनी परिणति करता हूं, इसके बाहर मेरा कुछ नहीं है, मेरा कहीं कुछ घर नहीं है, मेरा कहीं कुटुंब नहीं है, मेरा ही प्रदेश यह मेरा घर है, मेरा ही स्वभाव, मेरा ही गुण यह सब मेरा सर्वस्व है। जब मैं इस पर्याय को छोड़कर जाऊँगा तो जो मेरा है वह मेरे साथ जायगा, जो मेरा नहीं है वह मेरे साथ न जायगा। यद्यपि इस संसारी जीव के साथ कर्म भी जाते हैं, पर कर्म उस नाते से नहीं जाते कि वे जीव के स्वरूप हैं, इसलिए जाते यों तो परिस्थिति है, बंधन है, निमित्त नैमित्तिक योग है, वहाँ भी निश्चय से कर्म-कर्म में रहकर जाते हैं, जीव-जीव में रहता हुआ जाता है। निमित्त नैमित्तिक योग जरूर ऐसा है कि अनादि से बंधे हैं, परंपरा उनकी चल रही है और साथ जाते हैं, जैसे कार्माणवर्गणा का शरीर। जो मेरा है सो मेरे साथ है, जो मेरा नहीं वह मेरे साथ नहीं। सबका स्वरूप जुदा-जुदा है, सत्ता न्यारी-न्यारी है। बच्चों को भी देखकर, वैभव को भी देखकर बेहोशी न लाये। ये ही मेरे सर्वस्व है―इस प्रकार की असावधानी बनाकर रहेंगे तो उतना ही दुःखी होना पड़ेगा। पदार्थों का स्वरूप भिन्न-भिन्न निरखें तो मोह मिटेगा और संकट इससे दूर होंगे।


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