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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 98

From जैनकोष



जीवा पुग्गलकाया सह सक्किरिया हवंति ण य सेसा ।

पुग्गलकरणा जीवा खंधा खलु कालकरणा दु ।।98।।

सक्रिय व निष्क्रिय द्रव्य―इस गाथा में यह बताया गया हैं कि समस्त द्रव्यों में से कौन-कौन द्रव्य सक्रिय हैं और कौन-कौन द्रव्य निष्क्रिय हैं? जीव और पुद्गलकाय, ये दो द्रव्य तो सक्रिय हैं और शेष के 4 द्रव्य निष्क्रिय हैं । धर्मद्रव्य जहाँ जैसा अवस्थित है वहाँ वैसा त्रिकाल अवस्थित है । यों ही आकाशद्रव्य सर्वव्यापी है, उसमें तो अवस्थितता सुगम विदित हो जाती है और कालद्रव्य जो केवल एक प्रदेश प्रमाण है, लोकाकाश के एक-एकप्रदेश पर ठहरा है, वे भी जहाँ जो ठहरे हैं वहाँ वे अनादि से ठहरे हैं और अनंतकाल तक अवस्थित रहेंगे । केवल जीव और पुद्गल ये दो द्रव्य ऐसे हैं जो सक्रिय हैं, चलते रहते हैं ।इसमें सक्रियता का स्वभाव है । अष्टकर्मों से रहित सिद्ध भगवान यद्यपि सक्रिय अब नहीं रहे, एक प्रदेश हैं । इधर-उधर वे सरक नहीं सकते और उनकें आत्मप्रदेशों में भी योग्य रीति का उथल-पुथल नहीं हो सकता, लेकिन सक्रियता का स्वभाव जिसमें माना गया है वह स्वभावतो त्रिकाल है, और सिद्ध में भी ऊर्द्धगमन स्वभाव पाया जाता है । यद्यपि वे अपने सिद्ध क्षेत्र से ऊपर अर्थात् लोक से बाहर त्रिकाल भी रंच भी नहीं पहुंचते, किंतु जिनमें जो शक्ति, जो गुण है, जो स्वभाव है वह शाश्वत रहा करता है ।

जीव की सक्रियता का बहिरंग साधन―एक प्रदेश से अन्य प्रदेश पर पहुंचने का कारणभूत जो परिस्पंद परिणमन है उसे क्रिया कहते हैं । इस लक्षण को घटित करते हुए निरखें कि कौन से जीव सक्रिय हैं? ये जीव बहिरंग साधन का निमित्त पाकर क्रियाशील बने रहा करते हैं। सक्रियता का स्वभाव होनेपर भी ये जीव पदार्थ यों ही अटपट गमन नहीं किया करते, क्रिया नहीं किया करते, किंतु बहिरंग साधन जैसे अनुकूल सहज प्राप्त हुए हैं उनको मात्र निमित्त पाकर यह जीव अपनी परिणति से अपने आपमें प्रदेशपरिस्पंदन करने लगता है । संसार अवस्था में हम आप चलते हैं इसमें प्रदेशों से प्रदेशांतर पर पहुंचने का कारणभूत बहिरंगसाधन है शरीर व कर्म । और जब यह जीव अष्टकर्मों से मुक्त होकर एक समय में एकदम ऊपर चला जाता है उस समय की क्रिया में साधन है बंध का छेद । कोई चीज किसी में फंसी हो और जब उसका वियोग हो तो फिर भी क्रिया बन जाती है । यों बहिरंग साधन के साथ यह जीव सक्रिय है, और इस प्रकार बहिरंग साधन के द्वार से सक्रिय हुआ करता है ।

पुद्गल की सक्रियता का कारण―यह पुद्गल भी सक्रिय होता है । जो विशेष घटना होती है, विशेष क्रिया होती है, जो अभी न था अब हो गया, यों क्रियाएँ अट्टसट्ट नहीं होती हैं । बहिरंग साधन का निमित्त पाकर होती हैं । ये पुद्गल स्कंध हैं । पत्ता उड़ता है तो उसमें बहिरंग साधन हवा है । हाथ से डला फेंक दिया । डला बहुत दूर तक चला जाता है, उसमें बहिरंग साधन हस्त प्रेरणा है, हस्त क्रिया है । कभी परमाणु अकेला ही गमन करे तो वहाँ भी बंध छेद या अन्य-अन्य योग्य वातावरण वहाँ बहिरंग साधन हैं । इस प्रकार बहिरंग साधनों के द्वारा सद्भूत ये पुद्गल भी सक्रिय होते हैं । निष्क्रिय तो आकाश है, धर्मद्रव्य है, अधर्मद्रव्य है और कालद्रव्य हैं ।

सक्रियता व निष्क्रियता का उपसंहारात्मक वर्णन―जीव के सक्रिय होने का बहिरंगसाधन कर्म और नोकर्म के उपचय रूप पुद्गल हैं । सो वे जीव पुद्गलकरणक होकर क्रिया कर रहे हैं किंतु सिद्ध भगवान की निष्क्रियता पुद्गलकरण के अभाव से है । सिद्ध हो गए, सिद्धक्षेत्र में विराज रहे, अब वे रंच भी प्रदेश से प्रदेशांतर को प्राप्त नहीं होते हैं । इसका कारण यह है कि उनमें अब पुद्गल वर्गणावों का अभाव है । पुद्गल में जो सक्रियता होती है उसमें बहिरंग साधन उस परिणमन का निष्पादक कालद्रव्य है अथवा इन स्कंधों में परस्पर में एक दूसरे का प्रसंग कारण है । जैसे यहां शुद्ध आत्मा के अनुभव से कर्मपुद्गल का अभाव हो जाता है इस कारण सिद्ध जीव की शाश्वत निष्क्रिय स्थिति संभव है । इस प्रकार पुद्गल में भी निष्क्रियता कभी संभव नहीं है । सिद्ध की तरह पुद्गल निष्क्रिय नहीं हो पाते । इस प्रकार इस गाथा में सक्रियता और निष्क्रियता का विभाग बताया है ।


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