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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 8-22

From जैनकोष



स यथानाम ।। 8-22 ।।

(309) बद्ध प्रकृतियों के विपाक के व्यक्त होने की मुद्रा―ज्ञानावरण का फल ज्ञान का अभाव करना है, दर्शनावरण का फल दर्शन की शक्ति को रोकना है, वेदनीय का फल साता असातारूप परिणाम होना है । इस प्रकार से जिस प्रकृति का विपाक बताना हो उस प्रकृति का जैसा नाम है वैसा ही अनुभाग होता है । तो यहाँ तक यह बात आयी कि जो कार्माणवर्गणायें कर्मरूप परिणमती हैं उनमें प्रकृतिबंध, स्थिति बंध, अनुभागबंध उक्त प्रकार से होता है । अब रहा प्रदेशबंध, उसका वर्णन आगे होगा, पर संक्षेप में यह जानना कि जो भी परमाणु बंधे हैं वे ही तो प्रदेशबंध कहलाते हैं । सर्व प्रकृतियां 148 कही गई हैं । उनमें सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्प्रकृति इन दो प्रकृतियों का बंध कभी नहीं होता । फिर इनकी सत्ता कैसे होती है? तो प्रथमोपशम सम्यक्त्व उत्पन्न होता है तो उस प्रथमोपशम सम्यक्त्व परिणाम के बल से उसके प्रथम क्षण में ही मिथ्यात्व के खंड हो जाते हैं । सो सत्ता में पड़े हुए मिथ्यात्व कुछ सम्यग्मिथ्यात्वरूप बन जाते, कुछ सम्यक्प्रकृतिरूप बन जाते और कुछ मिथ्यात्व ही रह जाते । जैसे चक्की में उड़द, मूंग, चने आदि दले जायें तो कुछ दाने तो एकदम चूरा बन जाते, कुछ दाल बनते और कुछ साबुत दाने के दाने निकल जाते इसी तरह सम्यक्मिथ्यात्व और सम्यक्प्रकृति की सत्ता बनती है । बंध 146 का ही होता है । अब उसका वर्णन करने की दिशा में कुछ संक्षेप किया जाता है अर्थात् 5 शरीर, 5 बंधन, 5 संघात ये एक ही नाम के हैं जैसा कि नामकर्म की प्रकृतियों में बताया है । अतएव उन 15 का संक्षेप करके 5 में ले लिया । 5 बंधन और 5 संघात का अंतर्भाव 5 शरीरों में कर लिया, इस तरह 10 तो ये घट गए और स्पर्श 8, रस 5, गंध 2 और वर्ण 5, इस प्रकार ये 20 प्रकृतियाँ हैं । इन 20 प्रकृतियों का ग्रहण सामान्य स्पर्श, रस, गंध, वर्ण में मूल 4 हो जाने से 16 प्रकृतियां ये घट गईं । 16 और 10 यों कुल 26 प्रकृतियाँ कम गणना में लेने से 120 प्रकृतियाँ बंध योग्य होती हैं ।

(310) सम्यक्त्वरहित गुणस्थानों में ओघालाप से बंध का विवरण―बंधयोग्य 120 प्रकृतियों में प्रथम गुणस्थान में 117 प्रकृतियों का बंध होता है । इसका कारण यह है कि मिथ्यादृष्टि जीव तीर्थंकर प्रकृति, आहारक शरीर और आहारक अंगोपांग इन तीन प्रकृतियों का बंध करने की योग्यता नहीं रखते, क्योंकि ये प्रकृतियाँ प्रशस्त हैं इसलिए इन तीन का बंध पहले गुणस्थान में नहीं है । हाँ आगे के गुणस्थानों में हो सकेगा, 3 कम करने से मिथ्यात्व गुणस्थान में 117 प्रकृतियों का बंध होता है, दूसरे गुणस्थान में तीन तो ये ही प्रकृतियाँ नहीं बंधती, इस प्रकार 16 प्रकृतियाँ न बंधने से दूसरे गुणस्थान में 101 प्रकृतियों का बंध होता है । यहाँ यह विशेष जानना कि जो तीन प्रकृतियाँ नहीं बँध रहीं यहाँ पर वे आगे बँध सकेंगी, किंतु 16 प्रकृतियाँ जो यहाँ नहीं बंध रहीं वे आगे भी कभी किसी गुणस्थान में न बँधेंगी, इसी कारण उन 16 प्रकृतियों की बंध व्युच्छित्ति पहले गुणस्थान में कही गई है अर्थात् मिथ्यात्व हुंडक, नपुंसक, अंतिम संहनन, एकेंद्रिय, स्थावर, आतप, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण, दो इंद्रिय, तीनइंद्रिय, चारइंद्रियजाति, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्व्य, नरकायु इन 16 प्रकृतियों के बंध का नियोग प्रथम गुणस्थान में होता है याने पहले गुणस्थान में तो बँधती है, आगे न बँधेगी । तो इस प्रकार जिस गुणस्थान में जितनी प्रकृतियों की बंध व्युच्छित्ति कही जाये उसका अर्थ यह है कि आगे के गुणस्थानों में वे प्रकृतियाँ न बँधेंगी । यहाँ दूसरे गुणस्थान में 25 प्रकृतियों की बंध व्युच्छित्ति होती है । वे 25 प्रकृतियां ये हैं―अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ, स्त्यानगृद्धि, निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, दुर्भग दुस्वर, अनादेय, 6 संस्थानों में से बीच के चार संस्थान, 6 संहननों में से बीच के 4 संहनन । अप्रशस्त विहायोगति―स्त्रीवेद, नीच गोत्र तिर्यग्गति, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, उद्योत, तिर्यगायु, इन 25 प्रकृतियों का बंध तीसरे गुणस्थान में नहीं है और पहले तीर्थंकर आदिक तीन प्रकृतियों का भी नहीं है, और इसके अतिरिक्त इन गुणस्थानों में चूंकि किसी भी आयु का बंध नहीं होता, सो नरकायु, तिर्यगायु पहले दूसरे गुणस्थान में बंध से व्युच्छिन्न हैं सो नरकायु, तिर्यगायु तो पहले दूसरे गुणस्थान में बंध से व्युच्छिन्न होने वाली प्रकृतियों में शामिल है । शेष दो आयु मनुष्यायु और देव आयु इनका बंध नहीं होता । इस प्रकार दूसरे गुणस्थान में बँधने वाली 101 प्रकृतियों में से 27 प्रकृतियां घट जाने से 74 प्रकृतियों का बंध होता है । गुणस्थान गुणों के विकास से आगे बढ़ते जाते हैं । तो जितना जितना विकास होता है उतनी ही प्रकृतियों का बंध कम हो जाता है ।

(311) सम्यग्दृष्टि जीवों में ओघालाप से बंध का विवरण―चौथे गुणस्थान में अब तीर्थंकर प्रकृति बँधने लगी तथा मनुष्यायु, देवायु बंधने लगी तो तीसरे गुणस्थान में बंधने वाली 74 प्रकृतियों में 3 बढ़ाने से 77 प्रकृतियों का बंध होता है । 5वें गुणस्थान में 10 प्रकृतियाँ जो कि चतुर्थ गुणस्थान में बंध से हट जाती हैं उनको कम करने से 67 प्रकृतियों का बंध होता है । चौथे गुणस्थान में बंधव्युच्छिंन प्रकृतियाँ ये है―अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ, वज्रवृषभनाराचसंहनन, प्रथम संहनन, औदारिकशरीर, औदारिकांगोपाग, मनुष्यगति व आनुपूर्वी तथा मनुष्यायु । छठे गुणस्थान में 4 प्रकृतियां और घट जाती हैं जिनकी बंधव्युच्छित्ति 5वें गुणस्थान में होती है । वे 4 प्रकृतियां हैं―प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ । इनके हटने से महाव्रत हुआ करता है । अब छठे गुणस्थान में बंध व्युच्छित्ति की 6 प्रकृतियाँ घटने से तथा आहारक शरीर, आहारक अंगोपांग बंध में बढ़ जाने से यहां 59 प्रकृतियों का बंध होता है । 8वें गुणस्थान में देवायुप्रकृति का बंध नहीं होता, इसकी व्युच्छित्ति 7वें गुणस्थान में हो जाती है, अत: 58 प्रकृतियों का बंध होता है । 8वें गुणस्थान में 36 प्रकृतियां बंध से अलग हो जाती हैं । उन्हें घटाने से 9वें गुणस्थान में 22 प्रकृतियों का बंध होता है । आठवें गुणस्थान में बंधव्युच्छिंन 36 प्रकृतियां ये हैं―निद्रा, प्रचला, तीर्थंकर, निर्माण, प्रशस्तविहायोगति, पंचेंद्रिय, तैजसद्विक, आहारकद्विक, समचतुरस्र संस्थान, देव गति, देवगत्यानुपूर्व्य, वैक्रियक शरीर, वैक्रियकांगोपांग, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, त्रस, वादर, पर्याप्ति, प्रत्येक, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर व आदेय, हास्य, रति, भय, जुगुप्सा । 9वें गुणस्थान में क्रमश, 5 प्रकृतियों की बंध व्युच्छित्ति होती हैं । पुरुषवेद, संज्वलनक्रोध, संज्वलनमान, संज्वलनमाया व संज्वलन लोभ । इनके घटाने से 10वें गुणस्थान में 17 प्रकृतियों का बंध होता है । 10वें गुणस्थान में 16 प्रकृतियाँ बंध से व्युच्छिन्न हो जाती हैं, वे 16 प्रकृतियाँ हैं―5 ज्ञानावरण, 5 अंतराय, 4 दर्शनावरण, यशकीर्ति और उच्चगोत्र । इनके हट जाने से 11वें गुणस्थान में सिर्फ एक प्रकृति का बंध होता है अर्थात साता वेदनीय का बंध होता है । 12वें गुणस्थान में भी एक साता वेदनीय का बंध होता है । 13वें गुणस्थान में भी एक साता प्रकृति का बंध होता है । इसका बंध व्युच्छेद 13वें गुणस्थान में हो जाता है । अत: 14वें गुणस्थान में कोई भी प्रकृति नहीं बँधती । ये बँधी हुई प्रकृतियां अपनी स्थिति रखती हैं और अपनी स्थिति पर्यंत जीव के साथ रहती हैं । जब उनकी स्थिति पड़ी हुई है तो वे कर्मप्रकृतियाँ आत्मा से अलग हो जाती हैं । ऐसे अलग होने का नाम उदय है और इसी को निर्जरा भी कहते हैं । उसी का वर्णन करते हैं कि स्थिति पूरी होने पर फिर इन प्रकृतियों का क्या होता है?


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