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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 8-24

From जैनकोष



नामप्रत्यया: सर्वतो योगविशेषात् सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाहस्थिता: सर्वात्मप्रदेशेष्वनंतानंतप्रदेशा: ।।8-24।।

(320) प्रदेशबंध का निर्देश और प्रदेशबंधनिर्देशकप्रकृत सूत्र में ‘नामप्रत्यया’ पद की सार्थकता―नाम के कारण समस्त भावों में योगविशेष से सूक्ष्म एक क्षेत्रावगाह में स्थित समस्त आत्मप्रदेशों में अनंतानंत प्रदेश हैं । इस अर्थ से यह ध्वनित होता कि जीव के साथ अनंतानंत कार्माणवर्गणायें कर्मरूप होकर स्थित रहती हैं । सर्वप्रथम शब्द आया है―नाम प्रत्यय । इसका अर्थ है कि सर्व कर्म प्रकृतियों के कारणभूत अर्थात् परमाणुवों का बंध होगा, उन्हीं में तो वे प्रकृतियाँ आयेंगी जिनका पहले वर्णन किया, जो यह प्रदेशबंध हुआ, वही ही प्रकृति होगी, स्थिति होगी, अनुभाग होगा । तो उन सब बंधों का आधार उपादान तो ये कार्माणवर्गणायें हैं, यह बात प्रथम पद में भाषित की है । यहाँ शंकाकार कहता है कि नाम प्रत्यय का यह अर्थ किया जाये तो सीधा अर्थ है कि जिन प्रकृतियों का नामकरण है । उत्तर―ऐसा अर्थ ठीक नहीं है, क्योंकि इस अर्थ के किए जाने में केवल नामकर्म का ही ग्रहण होगा और यह आगम विरुद्ध रहेगा । इस पद में तो हेतुभाव को ग्रहण किया गया है अर्थात् जैसे कि पहले सूत्र कहा गया था―‘सत्यथानाम’ जैसा कि कर्मों का नाम दिया गया है उनकी तरह की प्रकृति स्थिति आदिक बनती है, उनके आधारभूत ये कर्मपरमाणु हैं ।

(321) सूत्रोक्त सर्वतः पद की सार्थकता―दूसरा पद है सर्वत:, इसका अर्थ है कि सभी भवों में यह बंध होता रहा, इसमें काल का ग्रहण बताया गया है । एक-एक जीव के अनंत भव गुजर चुके हैं और आगामी काल में किसी के संख्यात, किसी के असंख्यात और किसी के अनंत भव गुजरेंगे, उन सभी भवों में यह प्रदेशबंध होता रहा है । ऐसा नहीं है कि जीव पहले शुद्ध हो, पश्चात् कर्म परमाणुवों का बंधन हुआ । यदि जीव शुद्ध होता तो कर्म परमाणुवों का बंधन हो ही न सकता था, क्योंकि कर्मपरमाणुवों के बंधन का कारण तो जीव के अशुद्ध भाव है । और मान लिया गया जीव को पहले से शुद्ध तो कर्मबंधन कैसे हो सकता? क्योंकि जब कर्मबंध पहले से होता तब उनके उदय में अशुद्धभाव बनता । सो अब अशुद्धभाव तो हो नहीं सक रहा, फिर कर्मबंध कैसे होता? इस कारण जो तथ्य है वह कहा जा रहा है कि इस जीव के सभी भवों में कर्मबंध हुआ है । इससे यह सिद्ध हुआ कि कर्मसंबंध अनादि काल से है।

(322) सूत्रोक्त ‘योगविशेषात्’ पद की सार्थकता―सूत्र में तीसरा पद योगविशेषात् अर्थात् मन, वचन, काय के योग से कर्म का आस्रव होता है योग के कारण । आत्मा के प्रदेशों में परिस्पंद होने से आत्मस्वरूप के क्षेत्र में रहने वाली कार्माणवर्गणायें, विश्रसोपचय वाली वर्गणायें कर्मरूप परिणम जाती हैं, तो उनका कारण योगविशेष है । जहाँ योग नहीं रहता वहाँ कर्म का आस्रव नहीं होता, बंध की बात तो अलग रही । यद्यपि आस्रव और बंध एक साथ होते हैं किंतु कोई जीव ऐसे होते हैं कि जिनके ईर्यापथास्रव होता है याने कर्म आये और गए, उनमें एक क्षण की भी स्थिति नहीं बंधती । वहाँ बंध तो नहीं कहलाया, आस्रव कहलाया फिर भी जो सकषाय जीव की गतियाँ हैं उनमें बंध है । सो जिस समय कर्म आये वह समय भी स्थिति में शामिल हो गया, आगे भी रहेगा । तो यों आस्रव और बंध एक साध हो गए । योगविशेष से आस्रव होता है, यही बंध का ग्रहण कराता है ।

(323) ‘‘सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाहस्थिता’’ इस सूत्रोक्त पद की सार्थकता―चौथे पद में कई बातों का वर्णन है । पहली बात कही गई है कि वे कर्मपरमाणु सूक्ष्म हैं । हैं वे पुद्गल, किंतु शरीरस्कंध की भांति स्थूल नहीं हैं । और ऐसी सूक्ष्म कार्माणवर्गणायें हैं तब ही वे जीव के द्वारा ग्रहण करने योग्य बन पायी हैं । जीव द्वारा ग्रहण योग्य पुद्गल सूक्ष्म हो सकता है, स्थूल नहीं हो सकता । दूसरी बात यह कही गईं है कि ये कर्मपुद्गल एक क्षेत्रावगाह में स्थित हैं अर्थात् जहां आत्मप्रदेश है उस ही क्षेत्र में अवगाहरूप से वे कर्म पुद्गल स्थित हैं । ऐसा नहीं हे कि आत्मा के निकट आत्मा से चिपके हुए कर्मपुद्गल हों, किंतु जितने विस्तार में आत्मा है उतने ही विस्तार में उन्हीं जगहों में ये कार्माण वर्गणायें पड़ी हुई हैं । यहाँ आत्मप्रदेशों का और कर्म पुद्गल का एक अधिकरण बताया गया है, याने व्यवहारनय से जहाँ आत्मप्रदेश हैं उन्हीं के ही साथ वहां ही ये कार्माण वर्गणायें हैं, अन्य क्षेत्र में नहीं हैं । तीसरी बात इस पद में स्थित शब्द देने से यह ध्वनित हुई कि वे ठहरे हुए कर्मपुद्गल हैं जो बंध में आये हैं वे जाने वाले नहीं हैं, डोलने वाले नहीं हैं, अन्य क्रियायें उनमें नहीं हैं, केवल स्थिति क्रिया है । इस प्रकार चौथे पद में बताया गया कि वे कर्म वर्गणायें सूक्ष्म हैं, आत्मा के एक क्षेत्रावगाह में हैं और स्थित हैं ।

(324) सूत्रोक्त पंचम और षष्ठपद संबंधित तथ्यों पर प्रकाश―पांचवें पद में कहा गया है कि वे कर्मवर्गणायें सर्व आत्मप्रदेशों में है । आत्मा के एक प्रदेश में या कुछ प्रदेशों में कर्मबंध नहीं है, किंतु ऊपर नीचे अगल बगल सर्व आत्मप्रदेशों में व्याप करके ये कर्मवर्गणायें स्थित हैं । छठे पद में बताया है कि यह अनंतानंत प्रदेशी है । यहाँ प्रदेश शब्द का अर्थ परमाणु है, लेकिन जो कर्मवर्गणायें कर्मबंध रूप में होती हैं वे एक दो करोड़ अरब असंख्यात नहीं किंतु अनंतानंत परमाणु एक समय में बंध को प्राप्त होते हैं । ये बंधने वाले कर्मस्कंध न तो संख्यात परमाणुवों का है और न असंख्यात परमाणुवों का है और अनंत का भी नहीं किंतु अनंतानंत परमाणुवों का है । कर्मपरमाणु अभव्य राशि से अनंत गुणे हैं, सिद्धराशि के अनंतभाग प्रमाण हैं । घनांगुल के असंख्येय भाग क्षेत्रों में अवगाही हैं । उनकी स्थितियां अनेक प्रकार की हैं । कोई एक समय कोई दो समय आदिक बढ़ बढ़कर कोई संख्यात समय कोई असंख्यात समय की स्थिति वाले हैं । इनकी स्थितियों का वर्णन पहले किया जा चुका है । इन कर्मवर्गणावों में 5 वर्ण 5 रस, 2 गंध, 4 स्पर्श अवस्थायें हैं । ये कर्मवर्गणा में 8 प्रकार की कर्मप्रकृतियों के योग्य हैं अर्थात् इनमें 8 प्रकार की प्रकृतियां बन जाती हैं । इनका बंध मन, वचन, काय के योग से होता है । होता तो आत्मा के प्रदेश परिस्पंद से पर वह प्रदेशपरिस्पंद मन, वचन काय के वर्गणाओं का आलंबन लेकर होता है उनकी बात बताने के लिए तीन योग की बात कही गई है । कर्मबंध के मायने क्या है? आत्मा के द्वारा वह स्वीकार कर लिया जाता है । इस प्रकार प्रदेश बंध का वर्णन किया और इसी के साथ बंध पदार्थ का भी वर्णन हो चुकता है । अब उन बँधी हुई प्रकृतियों में पुण्य प्रकृति कौन सी है, पाप प्रकृतियों में पुण्य प्रकृति कौन सी है, पाप प्रकृतियां कौन सी हैं, यह बात बताते हैं । और चूंकि पुण्य प्रकृति और पाप प्रकृति दोनों का अंतर्भाव बंध में हो जाता है, इसलिए 7 तत्त्वों में इनका वर्णन नहीं किया गया तो भी चूंकि बंध में ही ये शामिल हैं तो उन पुण्य और पापप्रकृतियों का अलग अलग नाम बतलाने के लिए सूत्र कहेंगे । उनमें सबसे पहले पुण्यप्रकृतियों की गणना वाला सूत्र कहते हैं ।


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