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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:योगिभक्ति - श्लोक 23

From जैनकोष



एवं मए मित्थुया अणयारा रायदोसपरिसुद्धा।

संघस्स वरसमाहिं मज्झवि दुक्खक्खयं दितु।।23।।

योगभक्ति में अभ्यर्थना- जिस प्रकार मेरे द्वारा स्तवन किया गया ये अनगार योगीश्वर जो रागद्वेष से दूर रहते हैं वे संघ को उत्तम समाधि प्रदान करें और मेरे भी दु:ख का क्षय करें। यह प्राकृत योगभक्ति में अंतिम छंद के द्वारा योगिस्तवन में अपना उद्देश्य प्रकट किया है। वस्तुत: समाधि और दु:ख का क्षय तो स्वयं को स्वयं ही करना है लेकिन जो समाधिभाव में चले हैं, जिनके दु:ख का क्षय हो रहा है ऐसे योगीश्वरों की भक्ति से, उनके सन्निधान से उनके उस भीतरी पुरुषार्थ के स्मरण से भक्त में अपना बल प्रकट होता है और उससे वे समता प्राप्त करते हैं, दु:ख का क्षय करते हैं। ये योगीश्वर अनगार हैं, घररहित है, इनका अब द्रव्य घर भी न रहा। ईंट, पत्थर महलों वाले घर में ये योगीश्वर अब नहीं बसते। जंगल में, झाड़ियां में, गुफावों में स्वतंत्र यत्र तत्र विहार करते हैं। उनके भाव में घर भी न रहा। उस बीते हुए समय की कल्पनायें तक भी नहीं करते। जिनका ध्येय बदल गया। जो एक उत्कृष्ट ध्येय में आ गए उनको व्यतीत बातों की कल्पना नहीं जगती कि कैसा सुख भोगा था, क्योंकि अब ये द्विज हो गए ना। दुसरी बार का जन्म हुआ है। ऐसे ये निर्ग्रंथ अनगार पुरुष मुझे समतापरिणाम दें और दु:खों का क्षय करें। ये रागद्वेष से रहित हैं। जहां रागद्वेष हैं वहां समता नहीं और दु:खों का क्षय भी नहीं। समता और विगतक्लेशता प्राप्त करने का उपाय तो रागद्वेष से रहित होना है। सो जो इस उपाय में सफल हो रहे हैं ऐसे रागद्वेष से रहित योगियों का यहाँ स्तवन किया है और उस संघ की कुशलता और अपनी कुशलता की चाह की है कि वास्तविक जो कुशलता है, स्वच्छता है वह बनी रहे और अपने इस विशुद्ध अविकार ज्ञानस्वभाव में स्थित रहें, इस प्रकार की योगभक्ति करके प्रार्थना की गई है।

लघुयोगभक्ति


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