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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 209

From जैनकोष



धर्मो गुरुश्च मित्रं च धर्म: स्वामी च बांधव:।

अनाथवत्यल: सोऽयं संत्राता कारणं बिना।।209।।

स्वयं के धर्म की ही शरण―इस प्राणी को धर्म के सिवाय अन्य कुछ शरण नहीं है। बहुत-बहुत घटनाओं को तो समझ लिया होगा कि हम आपका इस जगत में दूसरा कोई शरण नहीं है। यदि कदाचित् कोई अपना शरण बना, अपना मित्र बना, हितकारी बना तो उसमें भी समझना कि अपने सदाचार के कारण अपनी सभ्यता के कारण दूसरा पुरुष सहाय बना। दूसरा कोई सहायक बनता है तो वह यों ही नहीं बन जाता। जो जीव सदाचारी है, धर्मात्मा है, परोपकारी है, कुछ गुणी है उसके कारण लोग सहायक बनते हैं। पुण्यहीन का सहायक भी लोकव्यवहार में कोई बनता नहीं है तब समझिये कि धर्म ही हमारा शरण सहाय रहा। धर्म ही वास्तव में हमारा गुरु भी है। जिसको धर्म के प्रति लगन है यह लगन उसे सत्पथ पर लगाये रहती है। गुरु का काम क्या है कि शिष्य को सत्पथ पर लगाये उसे सत्य रास्ता बताये जिससे वह अहित से दूर हो, हित में लगे। तो यही काम धर्म करता है।

धर्म का उन्नायकत्व―हमारे में धर्म की लगन हमको सत्पथ में प्रेरणा देती है। विषय कषायों से अहित के कार्यों से यह धर्म दृष्टि हमें बचाती है। तब हमारा वास्तविक गुरु धर्म है। लोक में हम जिन्हें गुरु कहते हैं, संत कहते हैं, साधु कहते हैं अथवा अपने से बड़ा कहते हैं वे पुरुष कदाचित् किसी कारणवश हमारे विमुख हो सकते हैं और हमें मार्ग दर्शन का कार्य भी वे न करें, वे छोड़ दें, किंतु मेरा धर्म चाहिए, मैं कहीं होऊँ, कैसी ही अवस्था में होऊँ किंतु यह धर्म सदा जगाये रहता है, सत्पथ में लगाये रहता है।

धर्म की ही गुरुता―तब मेरा वास्तव में गुरु धर्म है। मैं ही अपना श्रद्धान् बनाता हूँ, मैं ही अपना ज्ञान करता हूँ, मैं ही अपने को हित में लगाता हूँ, अत: मैं ही परमार्थ से मेरा गुरु हूँ। चाहे यह कहो कि आत्मा का गुरु आत्मा ही है चाहे यह कहो कि मेरा गुरु मेरा धर्म है। धर्म ही हमें कुपथ से बचाता है और सत्पथ में लगाता है। उस धर्म के लिए अपने आपको न्यौछावर कर दो, अपने आपको मिला दो। यह धर्म अवश्य ही हम आप सबको कल्याण प्रदान करेगा। मित्र भी यह धर्म ही है। मित्र उसे कहते हैं जो ऐसा स्नेह रखे कि अनेक आपत्तियों से बचाता रहे। मुझे आपत्तियों से बचाने वाला यहाँ कोई परपदार्थ है क्या? यद्यपि किसी के निमित्त से मैं आपत्तियों से बच भी गया होऊँ लेकिन परमार्थ से वह मुझमें कुछ उत्पन्न करे अथवा आपत्तियों से बचाता रहे ऐसा तो नहीं है। मैं ही स्वयं धर्म के प्रसाद से आपत्तियों से बच गया हूँ। तो कोई मित्र मेरे सुख में निमित्त बने, आपत्तियों से रक्षा करने में निमित्त बने तो वहाँ भी मेरे धर्म का प्रताप है वह सब। जैसे लोग कहते हैं कि खुद भले तो जग भला। यदि खुद भले हों तो मेरे लिए सब भले हैं और खुद ही बुरा होऊँ तो मेरे लिए सब बुरे हैं। ऐसे ही समझिये कि हममें यदि धर्म का विकास है तो हमारे सभी मित्र बन सकते हैं और हममें ही धर्म नहीं है पुण्य नहीं है तो कोई मित्र भी नहीं बनता है। सब उदयानुसार बात होती है। भला उदय होने पर अनेक मित्र रहते हैं और खोटा उदय होने पर बड़े पक्के मित्र भी किनारा कर जाते हैं। यहाँ ही देख लीजिए वैभव बढ़ रहा हो तो सब पूछ करते हैं, वैभव घट रहा हो तो फिर कोई पूछ नहीं करता। जब कोई टोटा पड़ गया हो, गरीबी की स्थिति आ गयी हो तो फिर कोई भी साथ नहीं निभाता है। और किसी मित्र के कारण यदि हमें कुछ लाभ मिल रहा हो तो वहाँ भी अपने ही धर्म का प्रताप समझिये। हम आप सबको एक मात्र धर्म ही शरण है। किंतु।

मेरा धर्म क्या―यह भी निरखिये कि वास्तव में मेरा धर्म है क्या? मेरा धर्म है सच्चा ज्ञान उत्पन्न करना और सत्य तत्त्व का श्रद्धान् रखना। अपना आचरण अशुद्ध बनाया, पापों से मलिन, कषायों से युक्त अपना आचरण बनाया, श्रद्धा से भी पतित रहे, आत्महित का ख्याल भी न हो, तो वह जीवन क्या जीवन है। अपने को रागद्वेष मोहादि सर्व विकारों से रहित रखें तो यही है वास्तव में धर्म। इस ओर जो जितना चल सकता है वह उतना धर्म का पालक है। तो मित्र भी हमारा वास्तव में धर्म ही है, जो मुझे कभी दगा न दे सके। जो कभी मुझसे विमुख न हो सके। आप सोचिये धर्म के खातिर पुरुषों ने महिलाओं ने अपने प्राण तक दे दिये। शीलवती सतियों के चरित्र देखिये। कितने उन पर उपद्रव आये, पर वे अपने शील पालन पर ही दृढ़ रही। और प्राण तजने पड़े तो प्राण तज दिये, मगर शील को नहीं खोया। तो बड़े-बड़े पुरुषों ने धर्म के प्रति जो इतनी लगन लगायी तो कुछ बात तो है धर्म में। धर्म का महत्त्व समझिये, धन को महत्त्व मत दीजिए। और यह भी समझ लीजिए कि धन बहुत जोड़कर रख लिया तो वह क्या काम देगा। मरने पर साथ नहीं जाता, बल्कि कभी-कभी यह धन ही प्राणघात करा देता है। तो कौनसी ऐसी खास खूबी है जो इस धन पर इतना मरा जाय।

धर्म का सच्चा स्वामित्व―अन्य-अन्य प्रवृत्तियों के मुकाबले में धर्म की बात देखिये। धर्म का यदि परिणाम बना है तो उसी समय में इसे आनंद है, क्योंकि रागद्वेष रहित परिणाम का नाम धर्म है। तो जहाँ रागद्वेष नहीं है, ज्ञान का सही प्रकाश चल रहा है वहाँ नियम से अनाकुलता है। वहाँ क्षोभ का काम नहीं है। तो धर्म पालन से इस भव में भी निराकुलता मिलेगी और बहुत ही शीघ्र संसार के समस्त संकटों से मुक्त हो जायेगा यह उसे भावी फल मिलेगा। धर्म का ही वास्तव में शरण सत्य है। धर्म का ही महत्त्व जानो। धर्म की रुचि करो, अपना स्वामी भी धर्म ही है। मेरा मालिक कौन? जिसके हुकुम में हम रहें और जिसके प्रसाद से हमें शांति मिले। मेरा ऐसा मालिक कौन है? जगत में कहीं बाहर में ढूंढ़ों, कोई मालिक नहीं है। वस्तु का स्वरूप भी यही है कि प्रत्येक पदार्थ अपने आपमें स्वयं स्वतंत्र है। किसी पदार्थ का कोई मालिक नहीं। मेरा मालिक बाहर में कोई हो ही नहीं सकता। मेरा स्वामी मैं हूँ। वह धर्म स्वरूप है अर्थात् मेरा स्वामी धर्म है जो सदा सेवक की नाई मेरी रक्षा करता रहता है। जैसे मालिक मित्र अपने सेवक की रक्षा करता है इसी प्रकार यह धर्म मेरी रक्षा बनाये रहता है। अत: वास्तव में मेरा स्वामी धर्म है।

धर्म का बंधुत्व―धर्म ही वास्तव में मेरा बंधु है। भाई-भाई की एक अनोखी प्रीति होती है। बिरला ही कोई भाई ऐसा होता है जो परस्पर में एक दूसरे से विपक्षी हो जाता है, उस प्रतिपक्ष और विरोध होने का कारण भी विषयों के साधन स्नेह है। विकार भाव में बह गए इसलिए विद्रोह करते हैं अपने ही भाई से, पर कहते हैं ना लोग कि कभी कोई पुत्र गुजर जाय तो कुछ परवाह नहीं। और पुत्र हो जायगा, किंतु भाई बिछुड़ गया तो भाई कहाँ से लायेंगे। इतनी भाई के प्रति प्रीति हुआ करती है लोक व्यवहार में। लेकिन ये लोकव्यवहार के बंधं भी मुझे धोखा दे सकते हैं, मेरे विरोधी बन सकते हैं पर धर्म एक ऐसा बंधं है कि जो मेरा विरोधी नहीं हो सकता, मेरे साथ कभी भी कपट नहीं कर सकता। वास्तव में मेरा बंधु मेरा धर्म ही है और धर्मात्माओं से प्रेम करने वाला ही यह धर्म है।

धर्म की अनुपम वत्सलता―हम इस जगत में कर्मों के परवश होकर अनाथ से फिर रहे हैं। इस मुझ अनाथ को किसी का अनुपम प्यार मिले जिससे मेरा कल्याण हो जाय तो ऐसा वत्सल मेरा धर्म ही है। अनाथों की कौन रक्षा करता है? कदाचित् कोई किसी अनाथ की रक्षा भी करे तो वहाँ भी यह बात समझिये कि उस अनाथ की धर्म ने रक्षा करा दिया। तो अनाथ वत्सल भी धर्म है और बिना ही कारण अपने किसी गरज के बिना मेरी रक्षा करने वाला भी कोई है तो वह धर्म ही है। कोई पुरुष समुदाय कभी किसी की रक्षा करता है तो कोई गरज रहती है तब वह रक्षा करता है। बिरले ही कोई संत ऐसे हैं जो बिना किसी गरज के दूसरे की रक्षा करते रहते हैं। पर प्राय: संसार में ऐसे पुरुष मिला नहीं करते। अत्यंत बिरले ही होते हैं। मिलते हैं किंतु कम। लेकिन गरज साधकर दूसरे के काम में सहायक बनने वाले बहुत हैं किंतु यह धर्म किसी भी गरज के बिना किसी भी कारण के बिना हमारी रक्षा करता है। तो सब प्रकार से समर्थ धर्म को समझकर धर्म की ओर रुचि बढ़ायें। मुझे धर्म ही प्यारा है धर्म मुझे करना है, धर्म ही मेरा सच्चा सहारा है, ऐसा जानकर सर्वप्रयत्न पूर्वक एक धर्म में ही रुचि करें।


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