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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 210

From जैनकोष



धत्ते नरकपाताले निमज्जगतां त्रयम्।

योजयत्यपि धर्मोऽयं और व्यमत्यक्षमंगिनाम्।।210।।

धर्महीन जीव की जघन्यता―धर्म नरक के पाताल में डूबते हुए इस जगत को आलंबन देकर बचाता है और जीवों को अतींद्रिय सुख भी प्रदान करता है। धर्म की महिमा में उन दो बातों का इसमें वर्णन किया है जो एक तो सबसे नीचे स्थित उससे बचाने की बात है और एक सबसे उत्कृष्ट स्थिति उसके प्राप्त करने की बात है। जीव की सबसे खोटी स्थिति है, यद्यपि निगोद इन तीनों लोकों में सर्वत्र भरा पड़ा हुआ है। लेकिन सब स्थानों में निगोद के अलावा और भी जीव प्रचुरमात्रा में पाये जाते हैं, किंतु सप्तम नरक के नीचे का स्थान ऐसा है जहाँ निगोद जीवों की ही प्रचुरता है इसलिए निगोद स्थान नरक के नीचे बताया है। वैसे हैं सब जगह निगोद। निगोद का अर्थ हे साधारण वनस्पति। 5 स्थावर में अंतिम नाम है वनस्पति का। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति। वनस्पति के 2 प्रकार हैं―एक प्रत्येक वनस्पति व एक साधारण वनस्पति। प्रत्येक वनस्पति तो हरी सब्जी का नाम है और साधारण वनस्पति, नाम तो है वनस्पति उसके नाम कर्म का उदय तो है ऐसा, पर वह हरी सब्जी नहीं है। यह जो खुला आकाश है इसमें भी अनंत साधारण वनस्पति ठसाठस भरे हुए हैं।

साधारण निगोद का आस्रव―साधारण वनस्पति कुछ तो हरी के आधार में रहती है और कुछ निराधार रहती है। जिस हरी के आधार में साधारण वनस्पति रहती है उस हरी को व्रती लोग नहीं खाते। जैसे आलू, शकरकंद, मूली, लहसुन, गाजर आदि साधारण वनस्पति से सहित हरी वनस्पति हैं और अनंत साधारण वनस्पति निराधार हैं। ये सब जगह मौजूद हैं इन निगोदिया जीवों का देह बहुत सूक्ष्म होता है। और एक देह के अनंत निगोदिया जीव स्वामी होते हैं। एक श्वांस में 18 बार जन्मते और मरते हैं, ऐसे निगोदिया राशि के सभी जीव प्रारंभ में निगोदिया जीव थे। जो भगवान बने हैं वे आत्मा भी प्रारंभ में निगोद में थे और जो आज मनुष्य हैं, वे भी प्रारंभ में थे । तो निगोद इस जीव की आदि स्थिति है और इस जीव की अंतिम स्थिति हैं यह अतिंद्रिय सुख का स्थान मोक्ष। तो निगोद और मोक्ष दोनों का संकेत इस श्लोक में है।

धर्म से निगोद का छुटकारा―यह धर्म निगोद से तो बचाता है और मोक्ष में पहुँचाता है। आदि और अंत की बात कहने के बीच की सब महिमा अपने आप आ गयी। इस लोक में जितना वैभव है, जितनी समृद्धियाँ हैं वे सब धर्म के प्रताप हैं। तो यह धर्म नरकों के नीचे जो निगोद स्थान है उसमें पड़ने से बचाता है, अर्थात् निगोद से हम आप तो निकल आये हैं और अनेक विकलत्रयों की योनि को भी पार करके आज मनुष्य हैं। यह संभव है कि हमारी करनी ठीक न रहे, हम आत्मा को न संभाल सकें, अपना सुधार न कर सकें तो पुन: उसी निगोद में जा सकते हैं। फिर हम निगोद में न पहुँचे, इसके लिए यत्न है धर्म का। इस धर्म के प्रताप से यह जीव निगोद स्थान से बच जाता है। निगोद से तो निकल आये और अनेक कुयोनियों को पार कर करके आज मनुष्य हुए हैं। मनुष्य में बुद्धि देह का बल और संपन्नताएँ इंद्रियाँ सब समर्थ हैं।

विषयों से विरक्ति ही सुख का लाभ―इस स्थिति में यदि विषयों से ही प्रेम रखा, पशुवृत्ति ही बनायी तो इसका फल फिर कुयोनियों में जाना है। यहाँ संभाल गए तो फिर संभाल के बाद उत्तरोत्तर संभाल बढ़ती जायेगी और इस मनुष्यभव में भी संभाल बढेगी। इस भव के बाद जिस भव में जायेगा वह संभाले तो संभाल शुरू होना चाहिए और उस संभाल की संभाल भी बनी रहना चाहिए। फिर उत्तरोत्तर संभाल होते-होते यह जीव इस उत्कृष्ट हद में पहुँच जायेगा जिसमें अतिंद्रिय आनंद बरसता है। यह सब इस धर्म का प्रताप है कि अत्यंत निम्न स्थान से निकलकर यह जीव अत्यंत उत्कृष्ट मोक्ष स्थान में पहुँचता है। धर्म के सिवाय अन्य किस पदार्थ में, अन्य किस पुरुष में ऐसी सामर्थ्य है जो उसे दु:ख से छुटाकर सुख में पहुँचा दे। किसी में भी ऐसा प्रताप नहीं हैं, ऐसे प्रताप की तो बात दूर रही, उल्टे एक प्रेम के साधन बनाकर अथवा नहीं अन्य पदार्थों को अपने विषय का साधन बनाकर कल्पनाएँ करके रागद्वेष मोह करके उल्टा और कुगति में बढ़ता जाता है। किसी भी बाह्य पदार्थ का सहारा नहीं है। वह तो गिरते हुए को और गिराने का साधन है।

अनादिकालीन विषयों में झुकाव ही दु:ख का मूल―प्रथम तो यह जीव ही अनादि काल से विकारों में बसता चला आया है। इसकी प्रकृति विकारों की ओर चैन मानने की पड़ गई है। विषय साधन मिले बिना इसे चैन नहीं होती। विषय साधन मिलने पर क्षुब्ध हो जाता, आकुलित भी हो जाता और चैन भी मानता जाता है। ऐसी विकट स्थिति है इस संसारी जीव की। तो एक इस जीव की प्रकृति ही विषयविकार की ओर झुकने की है और फिर मिल जायें ये पुण्य के फल विषय साधन, बाह्य पदार्थ प्रेमपात्र तो ये और अधिक ढकेलने में सहायक होते हैं।

धर्म की देन―इस जीव को दु:ख से बचाने में समर्थ एक धर्म ही है। संभालने को धर्म का स्वरूप कहा है। जो संसार के दु:खों से छुटाकर उत्तम सुख में पहुँचाये उसे धर्म कहते हैं। यह धर्म का ही प्रताप है जिसके प्रताप से यह जीव निगोद जैसी खोटी योनियों से निकलकर मोक्ष जैसे उत्तम पद में पहुँचता है। तो जैसे सर्वाधिक निम्नदशा निगोद की है ऐसे ही सर्वोत्कृष्ट आनंद की दशा मोक्ष की है।

शरीर राग ही दु:ख का कारण―यह शरीर, ये कर्म ये सांसारिक समागम दु:ख के कारण बनते हैं। कल्पना करो कि यह मैं जीव जैसा अपने स्वरूप से हूँ अर्थात् अपने ही सत्त्व के कारण जैसा इस मुझमें स्वभाव पडा है। मैं केवल उसही स्वभावरूप रहूँ, अकेला रहूँ। सब लेपों से अलग रहूँ तो इसको फिर कौनसा क्लेश है? जन्म-मरण का क्लेश तो इस अकेले को है नहीं, जो मेरा स्वयं सहज स्वरूप है उस स्वरूप में जन्म और मरण का क्लेश है। जहाँ जन्म न हो, शरीर न मिले वहाँ सारे क्लेश दूर हो गए। इष्टवियोग, अनिष्ट संयोग सारे वियोग, लोगों के द्वारा सन्मान अपमान आदिक जितनी विडंबनाएँ हैं वे एक भी नहीं रहती हैं। तब समझ लीजिए कि मैं केवल जो हूँ वही रहूँ उसमें कितना आनंद बसा हुआ है? दु:ख का नाम नहीं है, अनंत आनंद है। मैं हूँ नहीं ऐसा। पर स्वरूप अवश्य ऐसा है। जो सिद्ध भगवान जिस प्रकार विराजमान हैं उनकी जो स्थिति है वह स्थिति नहीं है हम आपकी, किंतु स्वरूप वही है। यदि वह स्वरूप न होता तो हम किसी भी उत्कृष्ट आनंद को न पा सकते और वह आनंद न मिल सके वह निर्दोष अवस्था न मिल सके, फिर धर्म किसलिए किया जाय? धर्म और सब यह मोक्षपद्धति सबका विनाश हो जायेगा। हममें वह स्वरूप है जो सिद्ध का है। उस स्वरूप को प्रकट करने के लिए हमारा मौलिक यत्न यह होना चाहिए।

आत्मा की अमौलिकता―हम अपना स्वरूप समस्त परपदार्थों से भिन्न निरखा करें, मैं देह से भी न्यारा हूँ, और की तो बात क्या कहें समस्त वैभव से तो न्यारा हूँ ही, देह से तो न्यारा हूँ ही, पर मुझमें जो रागद्वेष पक्ष तर्क वितर्क के कल्पनाएँ जगती हैं उन तर्कवितर्कों से भी न्यारा हूँ। ऐसा सबसे न्यारा अपने आपको निरखें तो सबसे न्यारा हो सकता है। मोक्ष के मायने और क्या हैं? मेरे आत्मा के सिवाय अन्य जिन पदार्थों का विकारों का संबंध और लेप लगा हुआ है वे सबके सब परपदार्थ और परभाव मुझसे जुदे हो जायें ऐसी हमारी परिस्थिति बने उस ही का नाम मोक्ष है। तो हम सबसे न्यारा तो रहना चाहते हैं और न्यारे की भावना न बनाएँ तो न्यारा होने की स्थिति पा कैसे सकते हैं। यहाँ माना यों तो करे कि देह मैं हूँ यह मेरा प्रिय देह है। मेरे घर के लोग बड़े विनयशील हैं, आज्ञाकारी हैं, ये मेरे ही तो हैं, इनसे मेरा बड़ा महत्त्व है इस प्रकार पदार्थों में व्यामोह करे और धर्म के नाम पर थोड़ा मंदिर में आकर या कहीं भी अन्य धर्म कार्य करके मोक्ष की आशा रखें तो यह तो बिल्कुल विपरीत बात है। मोक्ष चाहिए हो तो अंतरंग में अंत पुरुषार्थ करना होगा। वह पुरुषार्थ है भेद विज्ञान जितने भी जीव संसार से छूटकर सिद्ध हुए हैं वे भेदविज्ञान के बल से ही हुए हैं। और जो आज तक रुलते रहे हैं वे भेदविज्ञान के अभाव से रुलते रहे हैं। तो इस एक उत्कृष्ट अतींद्रिय आनंद पाने के लिए हमारा मौलिक यत्न यह होना चाहिए कि हम जगत के वैभव से शरीर से, तर्क-वितर्कों से, रागद्वेषादिक विभावों से अपने को न्यारा समझें। तो यह भेद विज्ञानरूप उत्कृष्ट धर्म बढ़-बढ़कर जिनके अभेदरूपी धर्म को उत्पन्न करके यह इस जीव को अतींद्रिय आनंद प्राप्त करा देगा। यों धर्म का माहात्म्य बताया गया है कि यह धर्म निगोद से निकालकर, बचाकर इस जीव को मोक्ष सुख में पहुँचा देता है।


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