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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 154

From जैनकोष



ते धीर वीर पुरिसा खमदमखग्गेण विप्फुरंतेण ।

दुज्जयपबलबलुद्धरकसायभड णिज्जया जेहिं ।।154।।

(576) क्षमा और इंद्रियविजय से आत्मा का महत्त्व―वह पुरुष धीर वीर है जिसने क्षमा और इंद्रियविजयरूपी चमकती हुई तलवार से दुर्जेय कषायरूपी योद्धाओं को जीत लिया है, विषय और कषाय―इन दो का ही तो युद्ध है । जहाँ ज्ञानबल है वहाँ कषाय हट जाती है । जहाँ कषाय उत्कृष्ट है वहाँ ज्ञान तप जाता है । तो जिसने ऐसा ज्ञान उत्पन्न किया कि कषाय बैरियों को जीत डाला वह पुरुष धन्य है । जो कषाय के वश है वह काहे का बड़ा और जिसने कषायों को जीत लिया उसका भाव है बड़ा । ऐसे पुरुष पर चाहे कितने ही उपद्रव आयें, उपसर्ग आयें फिर भी वह किसी का अहित नहीं विचारता । और न वह किसी के साथ छल कपट का प्रयोग करता है, क्योंकि इसका सीधा उपाय तत्त्वज्ञान उसे मिल गया है । बड़ा नाम धरा ना उसका, जो उड़द की दाल का बनाया जाता । अब उसका बड़ा नाम क्यों धरा सो सुनो―तो बड़ा नाम उसका इसलिए रखा गया कि जब बहुत चोटें झेल लेता है वह उड़द तब उसका नाम बड़ा पड़ता है । खेत में सूख गया, फिर काटा गया, फिर उस पर बैलों से दांय की गई, फिर चकला से उसके दो टूक किए गए, फिर उन टूक किए गये दोनों को शाम को पानी में भिगोया गया, रात भर पड़ा रहा, फिर सुबह हाथ से रगड़-रगड़कर उसका छिलका उतारा गया, अब वह साफ बना । फिर इसके बाद सिलबट्टे पर उसे रगड़ा गया, फिर उसमें नमक मिरच बुरका गया फिर उसको गोल-गोल लोई बनाकर उसकी शक्ल बिगाड़ी गई, फिर उसको जलती हुई तेज तेल की कड़ाही में पटका गया, वह बेचारा बड़ा उस तेल में पककर खूब फूल गया, इतने पर भी लोग नहीं मानते, उसके पेट में एक लकड़ी घुसेड़ते, यह देखने के लिए कि वह पका या नहीं; इसके बाद भी उसे मट्ठे में भिगोया तब उसको खाया । इतने-इतने कष्ट उठाने के बाद वह बड़ा कहलाया । यहाँ लोग बड़ा तो कहलवाना चाहते, मगर किस तरह कि खूब आराम में रहकर विषयों के साधनों में रहकर बड़ा बनना चाहते हैं । अरे बड़ा बनना है तो उस बड़े की तरह बड़ी-बड़ी चोटें आने दो अपने ऊपर तब कहीं बड़ा कहला सकोगे । तो जिनके ज्ञानबल है उनके धीरता है और वीरता है । भोगना भोग बड़ा आसान, भोग तजना शूरों का काम । सो यह विषय विरक्ति उसी के ही बन सकती है जिसको अविकार ज्ञानस्वभाव का अनुभव बना स्वाद आया और एक ही निर्णय है कि यह ही ज्ञानस्वभाव की अनुभूति श्रेष्ठ उपाय है, कर्तव्य है कि जिसके प्रसाद से हम उत्कृष्ट पद में पहुंच सकते हैं । तो क्षमा और इंद्रियविजय―इन दो गुणों का निर्देश किया है इस गाथा में ।

(577) क्षमा और इंद्रियविजय से सर्वजीतपना―अब समझ लीजिए खुद में कि दूसरे छोटे लोग बड़े लोग कुछ भी हम पर जुल्म ढाते हों या कटुक व्यवहार करते हों तो उनके प्रति क्षमा का भाव जगता या नहीं । दूसरे इंद्रियविजय की बात देख लो, सर्वप्रकार की घटनाओं में इंद्रियविजय होता है या नहीं अर्थात् ज्ञानस्वभाव की सुध बनी रहे और उस ही में लीन होने का पौरुष करे, ऐसी उसकी दृष्टि बनी या नहीं । जिसके क्षमा और इंद्रियविजय बनता है वह धीर वीर है, जिसने ज्ञानबल से दुर्जेय क्रोध, मान, माया, लोभ रूपी प्रबल शत्रुओं को नष्ट कर दिया । जीव का प्रबल शत्रु कषाय है, कषाय से यह जल भुन रहा है और पता नहीं करता अपना कि इन कषायों से मेरी बरबादी हो रही, सो कषाय को क्षमा और इंद्रियविजय―इन दो उपाय से जीता जा सकता है । जिसका इतना बड़ा ध्येय होता है वही पुरुष इन घटनाओं को क्षमा कर सकता है । जैसे इस लोक में किसी पुरुष का बहुत बड़ा काम है । जैसे वोटिंग का काम और ऊंची बात, तो छोटी-मोटी बातों की उपेक्षा कर लेना, उनका ध्यान न देना, क्योंकि बहुत बड़े काम की जिम्मेदारी ले रखी, तो ऐसे ही आत्मा का बहुत बड़ा काम हैं―अपने स्वभाव में रमना । इसकी जिसे धुन लगी है सो वह छोटी मोटी बातों का कोई ध्यान नहीं करता, अपने ही इस महान ध्येय का ध्यान करता है । सो पंचेंद्रिय विजय द्वारा ज्ञान के बल के द्वारा जिसने कषायों को जीत लिया वह पुरुष धीर वीर है । कोई एक बड़ा प्रचंड राजा था तो उसने सब राजाओं को जीत लिया और उसने अपना नाम सर्व जीत रखा लिया । अब उसे सभी लोग सर्वजीत कहने लगे पर उसकी मां उसे सर्वजीत न कहती थी । सो एक दिन वह पूछ बैठा-मां जी सभी लोग मुझे सर्वजीत कहते हैं, पर तुम क्यों नहीं कहती हो? तो वह मां बोली―बेटा अभी तुमने सबको जीत नहीं पाया इसलिए तुम्हें सर्वजीत नहीं कहती ?....अरे अभी कौनसा राजा जीतने को बाकी रह गया ?....अरे राजाओं को तो तुमने जीत लिया पर तुमने अभी अपनी कषायों को नहीं जीता, अपने आत्मा को नहीं जीता इसलिए मैं तुम्हें सर्वजीत नहीं कहती हूँ । तो सर्वजीत वही है जिसने विषय कषायों को जीत लिया ।


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