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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:लिंगपाहुड - गाथा 6

From जैनकोष



कलहं वादं जूवा णिच्चं बहुमाणगव्विओ लिंगी ।

वच्चदि णरयं पाओ करमाणो लिंगिरूवेण ।।6꠰।

(15) मानगर्भित कलहकारी मुनिवेषी की नरकपात्रता―जो पुरुष मुद्रा तो साधु ही की धारण करे और मोहवश कलह किया करे तो वह पापी पुरुष नरकगति में ही जाता है । साधारणतया पुरुष पाप कुछ किया ही करते हैं, पर धर्म का भेष धारण करके जो पाप करता है उसमें तीव्रता रहती है । मान की, माया की वहां प्रबलता है इस कारण धर्म का भेष धारण करके यदि पापक्रिया करता है तो उसकी बहुत दुर्गति होती है । साधुसत्संग में परस्पर कलह होने का क्या अवकाश ? सब अपने-अपने कर्तव्य में रहें, कार्य में रहें, योग्य कार्य करें, अयोग्य न करें ऐसी वृत्ति ही तो मुनि की होती है । वहाँ कलह का कोई अवकाश है ही नहीं, पर जिसके भाव मुनि का तो नहीं है, किंतु किसी कषायवश, मान प्रतिष्ठावश मुनिभेष लिया है तो वह उसका मुनिभेष निभ नहीं पाता ꠰ पर्यायबुद्धि होने से नामवरी का उसका बराबर यत्न रहा करता है और उस मोह के कारण परस्पर कलह होती है । कलह होने का मुख्य कारण है पर्यायबुद्धि । जो पर्याय पायी है उसी को ही मान लिया कि मैं यह हूँ तब ही तो उसका यह भाव होता है कि मेरा यश बढ़ना चाहिए ꠰ मेरा जगत में नाम बढ़ना चाहिए, और जहां यह भाव बना वहां विघ्न तो होवेंगे ही, क्योंकि सभी जीव अपने-अपने भाव के, कषाय के आधीन हैं । कोई किसी का कुछ लगता तो नहीं है कि वह दूसरे के मन की किया ही करे । तो वहां जब अंतराय आता है, मनचाही बात नहीं निभती है तो दूसरों को अपना शत्रु मान लेते हैं और इस प्रकार उनमें कलह होने लगती है । तो मुनिभेष धरण करके यदि कलह की वृत्ति जगती है तो वहां मुनिपद नहीं है । वह तो नरक का पात्र है ।

(16) मानगर्वित वादविवादगर्वित मुनिवेषी की नरकपात्रता―वाद―परस्पर में वाद-विवाद होना, किसी ठहरने या उठने बैठने के साधनों का प्रसंग लेकर या किसी ग्रंथादिक का प्रसंग लेकर जो एक परस्पर वादविवाद हो जाता वह भी कलह का ही तो रूप है ꠰ तो वचनों का जहां विवाद हो गया अथवा कोई तत्त्वचर्चा के नाम पर किसी पर ऐसा वाद हो गया कि वह दूसरे को सुहाये ही नहीं तो ऐसे वादविवाद की बात आना यह मुनिपद में नहीं है ꠰ उनका तो अपने आत्मा की रक्षा का भाव है ꠰ यदि कोई ऐसा प्रसंग आता है चित्त में किंचित् ही रागद्वेष जगने का व्यवहार बनता है, पर मुनि वहां से उपेक्षा करता है और अपने आपमें आत्मस्वभाव का आश्रय करता है, सच्चे साधु को वादविवाद का कोई अवकाश नहीं मिलता, किंतु मुनिभेष धारण करके किसी भी विषय पर वार्ता (बात) चले तो ऐसा वाद करके और शर्त लगाने के, जुवां के प्रसंग में उसका चित्त जाये तो वहां मुनिपद कहां रहा ? और मुनि का भेष धारण कर अहंभाव किया तो वह नरक का पात्र है ꠰

(17) द्यूतक्रीडारुचिक मुनिवेषी की नरकगमनपात्रता―जुवां के अनेक प्रकार होते हैं । मानों कोई मुनि ताश नहीं खेल रहा, पर उसकी बात-बात में जुवा है, किसी भी बात को लेकर एक हार जीत की दृष्टि रखना वह भी जुवा है । जैसे आजकल ऐसा भी चल रहा कि कोई ताश आदिक न खेलकर किसी व्यापार में ही हार जीत की दृष्टि या किसी बात पर ही कोई हार जीत की दृष्टि बना ले तो वह भी एक जुवा का ही रूप है । तो मुनिभेष धारण करके एक जुवा जैसा भाव आये किसी भी प्रसंग पर हार जीत की शर्त या दूसरे से यह मनवा लेना कि बोलो तुम हार गए ना? जो मैंने कहा वही निकला ना? चाहे वह धर्मचर्चा की ही बात हो, पर हार जीत की दृष्टि रखकर जो चेष्टा होती है वह पापक्रिया है । तो जो मुनि जिनमुद्रा धारण करके ऐसी पापक्रियावों में आता है वह नरक का पात्र है ꠰

(18) कुत्सित क्रियावों में लगने का कारण बहुमानगर्वितता―ऐसी जो कुत्सित क्रियायें हैं उनमें लगने का कारण क्या है? बहुत प्रकार के मान से गर्वित होना, वहाँ जैसे जुवा के प्रसंग का कारण लोभ तो है नहीं, उन्हें धन न चाहिए, कहां रखेंगे, पर एक बात का ही मान बन गया । लो मेरी बात रह गई ना, तो यह मान से गर्वित होने का फल है । जो हार जीत की दृष्टि बनाये अथवा वादविवाद का मौका बनाये अथवा कलह करे, सबका मूल बीज अभिमान है । और ऐसा अभिमान उसी के ही उत्पन्न होता है जिसने निज सहज चैतन्यस्वरूप में मैं यह आत्मा हूँ, ऐसा दृढ़ निश्चय नहीं किया और ऐसी भावना का दृढ़ अभ्यास नहीं किया उसे ही पर्याय को निरखकर यह मैं हूँ,

ऐसा सोचकर अभिमान आयगा । तो जो अज्ञानी जन हैं, जो आत्मस्वरूप से परिचित नहीं हैं और किसी कषायावेश में मुनि पद धारण किया हो तो उसमें यह अवगुण आता है और उसकी इस प्रकार दुर्गति होती है । तो ऐसे बहुत मान से गर्वित साधु भेष वाले एक मुद्रा की ओट में, धर्म भेष की ओट में जो इन क्रियावों को करता है वह पापी पुरुष नरक में गमन करता है और वहाँ के घोर दुःख सहन करता है ।


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