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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:लिंगपाहुड - गाथा 7

From जैनकोष



पाओपहदसभावो सेवदि अव्बंभु लिंगिरूवेण ।

सो पावमोहिदमदी हिंडदि संसारकांतारे ।।7꠰।

(19) कुशीलरुचिक मुनिवेषी पापी पुरुष का चिर संसारभ्रमण―जिसका स्वरूप पाप से निराकृत हो गया अर्थात् पापवासना के कारण जो अपने चैतन्यस्वरूप की सुध नष्ट कर चुका, ऐसा कोई पुरुष मुनिमुद्रा में रहकर अब्रह्म का सेवन करे तो वह पापबुद्धि वाला पुरुष इस घोर संसारवन में घूमता ही रहता है ꠰ यहां आत्मक्षेत्र में दो बातें चलती हैं ꠰ एक तो वह शाश्वत आत्मस्वरूप वह तो स्वभाव ही है, वह तो जीवत्व का आधार ही है और कर्म-उपाधि का संपर्क होने से कर्मविपाक के उदय होने पर जो आत्मा पर छाया प्रतिफलन उन कर्मरसों का होता है, वह भार इस पर है । सो जैसे ही कर्मरसों का प्रतिफलन आत्मा पर आया वैसे ही आत्मा का स्वभाव तिरस्कृत हो गया । उदाहरण में एक सिनेमा का पर्दा ले लीजिए, जिस पर चित्र फेंके जाते हैं फिल्म के, वह पर्दा अत्यंत सफेद, निर्मल, साफ रहता है, तना हुआ रहता है, ढीला नहीं, तो उस पर्दे पर दो बातें हैं, एक तो पर्दे का जो स्वयं सफेद रूप है, स्वच्छता है, निर्मलता है वह तो पर्दे में है ही, वह कहीं गई नहीं, किंतु जो फिल्म अक्स उपाधि बनकर उसका आकार जो फिल्म की रोल में बना हुआ है वह आकार प्रकाश के आगे आता है और उसका सान्निध्य पाकर सिनेमा के पर्दे पर चित्रित हो जाता है तो उन अक्सों के चित्रित हों जाने से उस पर्दे का जो स्वाभाविक रूप है सफेद, वह बिल्कुल ढक गया, ऐसा सब लोग समझते हैं, उस काल में उस पर्दे की स्वच्छता कहाँ है? वह आगे कहीं नहीं है पर्दे में ही संभव है तो भी उपाधिविपाक के समय वहाँ वह स्वच्छता नहीं है, ऐसे ही आत्मा में अपना स्वरूपस्वच्छत्व, सहजभाव, ज्ञानभाव वह बराबर है । वह स्वरूप कहीं गया नहीं । वह तो सत्त्व के साथ ही है, किंतु पौद्गलिक कर्म का विपाक होने पर जो यह कर्मरस इस आत्मभूमि पर झलकता है वह ज्ञान में ज्ञेय बना, तो वहाँ वह ज्ञेय ही नहीं रह पाता । उससे स्वभाव अभिभूत हुआ, और जो प्रकट है उसमें आत्मा की बुद्धि जगती कि मैं यह हूँ । तो जो ज्ञानी पुरुष हैं वे अपने भीतर उनका विवेक करते हैं कि यह तो कर्मचित्रण है और आत्मा यह चैतन्यस्वरूप है, जैसे जो जानकार है, अनासक्त है वह सिनेमा के पर्दे पर विवेक रखता है कि यह चित्रण तो फिल्म का अक्स है । उस रूप प्रतिफलित हुआ है, आत्मा तो वहाँ वही निर्मल ज्ञानस्वरूप है, जिनके यह भेद नहीं है, इसका परिचय ही नहीं है वे मुनि क्यों हुए ? उसका कारण है कषाय । कुछ भाव है, कुछ प्रतिष्ठा देखते, कुछ अपनी सुविधा समझते हैं और उससे मुनि हो जाते हैं, पर वह परमेष्ठीपना वह मुनित्व वहाँ कहां ठहर सकता है? तो जो पुरुष मुनिभेष में रहकर भी अपने आपको विषयों में ले जाता है, अनाचार रूप से रहता है वह पुरुष पाप से मोहितबुद्धि हुआ इस संसारवन में भटकता और दुःखी होता रहता है ।


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