• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

Help
 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

राक्षस: Difference between revisions

From जैनकोष

Revision as of 17:47, 20 December 2022 (view source)
Ruma jain (talk | contribs)
m (→‎सिद्धांतकोष से)
← Older edit
Latest revision as of 15:21, 27 November 2023 (view source)
Maintenance script (talk | contribs)
(Imported from text file)
 
(2 intermediate revisions by 2 users not shown)
Line 2: Line 2:
== सिद्धांतकोष से ==
== सिद्धांतकोष से ==
<ol>
<ol>
<li><span class="HindiText"> व्यंतर देवों का एक भेद− सम्बंधित विषय की अधिक जानकारी के लिए - देखें [[ व्यंतर ]]। </span></li>
<li class="HindiText"> व्यंतर देवों का एक भेद− सम्बंधित विषय की अधिक जानकारी के लिए - देखें [[ व्यंतर ]]। </span></li>
<li><span class="HindiText"> पिशाच जातीय व्यंतर देवों का एक भेद | सम्बंधित विषय की अधिक जानकारी के लिए−देखें [[ पिशाच ]]। </span></li>
<li class="HindiText"> पिशाच जातीय व्यंतर देवों का एक भेद | सम्बंधित विषय की अधिक जानकारी के लिए−देखें [[ पिशाच ]]। </span></li>
<li><span class="HindiText"> मनोवेग विद्याधर का पुत्र था (<span class="GRef"> पद्मपुराण/5/378 </span>) इसी के नाम पर राक्षस द्वीप में रहने वाले विद्याधरों का वंश राक्षस वंश कहलाने लगा । सम्बंधित विषय की अधिक जानकारी के लिए −देखें [[ इतिहास#9.12  | इतिहास - 9.12 ]]। <br />
<li class="HindiText"> मनोवेग विद्याधर का पुत्र था <span class="GRef">( पद्मपुराण/5/378 )</span> इसी के नाम पर राक्षस द्वीप में रहने वाले विद्याधरों का वंश राक्षस वंश कहलाने लगा । सम्बंधित विषय की अधिक जानकारी के लिए −देखें [[ इतिहास#9.12  | इतिहास - 9.12 ]]। <br />
</span></li>
</span></li>
</ol><ol>
</ol><ol>
<li><span class="HindiText"><strong name="1" id="1">राक्षस का लक्षण </strong></span><br />
<li class="HindiText"><strong name="1" id="1">राक्षस का लक्षण </strong></span><br />
   <span class="GRef"> धवला  13/5, 5, 140/391/10  </span><span class="SanskritText">भीषणरूपविकरणप्रियाः राक्षसा नाम ।</span> =<span class="HindiText"> जिन्हें भीषण रूप की विक्रिया करना प्रिय है, वे राक्षस कहलाते हैं । <br />
   <span class="GRef"> धवला  13/5, 5, 140/391/10  </span><span class="SanskritText">भीषणरूपविकरणप्रियाः राक्षसा नाम ।</span> =<span class="HindiText"> जिन्हें भीषण रूप की विक्रिया करना प्रिय है, वे राक्षस कहलाते हैं । <br />
</span></li>
</span></li>
<li><span class="HindiText"><strong name="2" id="2"> राक्षस देव के भेद </strong></span><br />
<li class="HindiText"><strong name="2" id="2"> राक्षस देव के भेद </strong></span><br />
ति. पं./6/44 <span class="PrakritGatha">भीममहाभीमविग्घविणायका उदकरक्खसा तह य । रक्खसरक्खसणामा सत्तमया बम्हरक्खसया ।44।</span> = <span class="HindiText">भीम,  महाभीम, विनायक, उदक, राक्षस, राक्षसराक्षस और सातवाँ ब्रह्मराक्षस इस प्रकार ये सात भेद राक्षस देवों के हैं ।44। (<span class="GRef"> त्रिलोकसार/267 </span>) । </span></li>
ति. पं./6/44 <span class="PrakritGatha">भीममहाभीमविग्घविणायका उदकरक्खसा तह य । रक्खसरक्खसणामा सत्तमया बम्हरक्खसया ।44।</span> = <span class="HindiText">भीम,  महाभीम, विनायक, उदक, राक्षस, राक्षसराक्षस और सातवाँ ब्रह्मराक्षस इस प्रकार ये सात भेद राक्षस देवों के हैं ।44। <span class="GRef">( त्रिलोकसार/267 )</span> । </span></li>
</ol>
</ol>
<ul>
<ul>
   <li><span class="HindiText"><strong> राक्षस देवों के वर्ण वैभव अवस्थान आदि</strong> सम्बंधित विषय की अधिक जानकारी के लिए−देखें [[ व्यंतर ]]। </span></li>
   <li class="HindiText"><strong> राक्षस देवों के वर्ण वैभव अवस्थान आदि |</strong> सम्बंधित विषय की अधिक जानकारी के लिए−देखें [[ व्यंतर ]]। </span></li>
</ul>
</ul>


Line 26: Line 26:


== पुराणकोष से ==
== पुराणकोष से ==
<div class="HindiText">  <p id="1"> (1) व्यंतर जाति के देव । ये पहली पृथिवी के पंकभाग में रहते हैं । <span class="GRef"> हरिवंशपुराण 4.50 </span></p>
<div class="HindiText">  <p id="1" class="HindiText"> (1) व्यंतर जाति के देव । ये पहली पृथिवी के पंकभाग में रहते हैं । <span class="GRef"> [[ग्रन्थ:हरिवंश पुराण_-_सर्ग_4#50|हरिवंशपुराण - 4.50]] </span></p>
<p id="2">(2) रात्रि का दूसरा प्रहर । <span class="GRef"> महापुराण 74.255 </span></p>
<p id="2" class="HindiText">(2) रात्रि का दूसरा प्रहर । <span class="GRef"> महापुराण 74.255 </span></p>
<p id="3">(3) पलाशनगर का राजा । इसे राक्षस-विद्या सिद्ध होने के कारण इसका यह नाम प्रसिद्ध हो गया था । <span class="GRef"> महापुराण 75.116 </span></p>
<p id="3" class="HindiText">(3) पलाशनगर का राजा । इसे राक्षस-विद्या सिद्ध होने के कारण इसका यह नाम प्रसिद्ध हो गया था । <span class="GRef"> महापुराण 75.116 </span></p>
<p id="4">(4) एक विद्या । मर 75.116</p>
<p id="4" class="HindiText">(4) एक विद्या । मर 75.116</p>
<p id="5">(5) जंबूद्वीप के भरतक्षेत्र की दक्षिण दिशा में स्थित एक द्वीप । राक्षसवंशी-विद्याधरों द्वारा रक्षा किये जाने से यह द्वीप इस नाम से प्रसिद्ध हुआ । इसकी परिधि इक्कीस योजन है । <span class="GRef"> पद्मपुराण 3. 43, 5. 386, 48.106-107 </span></p>
<p id="5" class="HindiText">(5) जंबूद्वीप के भरतक्षेत्र की दक्षिण दिशा में स्थित एक द्वीप । राक्षसवंशी-विद्याधरों द्वारा रक्षा किये जाने से यह द्वीप इस नाम से प्रसिद्ध हुआ । इसकी परिधि इक्कीस योजन है । <span class="GRef"> [[ग्रन्थ:पद्मपुराण_-_पर्व_3#43|पद्मपुराण - 3.43]], 5. 386, 48.106-107 </span></p>
<p id="6">(6) विद्याधर मनोवेग का पुत्र । सुप्रभा इसकी रानी थी । इसके दो पुत्र थे― आदित्यगति और वृहत्कीर्ति । इस राजा ने इन्हीं पुत्रों को राज्यभार सौंपकर दीक्षा ले ली थी । यह मरकर स्वर्ग में देव हुआ । <span class="GRef"> पद्मपुराण 5.378-380 </span></p>
<p id="6" class="HindiText">(6) विद्याधर मनोवेग का पुत्र । सुप्रभा इसकी रानी थी । इसके दो पुत्र थे― आदित्यगति और वृहत्कीर्ति । इस राजा ने इन्हीं पुत्रों को राज्यभार सौंपकर दीक्षा ले ली थी । यह मरकर स्वर्ग में देव हुआ । <span class="GRef"> [[ग्रन्थ:पद्मपुराण_-_पर्व_5#378|पद्मपुराण - 5.378-380]] </span></p>
<p id="7">(7) विद्याघरों का एक वंश । इस वंश में एक राक्षस नाम का विद्याधर हुआ है, जिसके नाम पर यह वंश प्रसिद्ध हुआ । <span class="GRef"> पद्मपुराण 5. 378 </span></p>
<p id="7" class="HindiText">(7) विद्याघरों का एक वंश । इस वंश में एक राक्षस नाम का विद्याधर हुआ है, जिसके नाम पर यह वंश प्रसिद्ध हुआ । <span class="GRef"> [[ग्रन्थ:पद्मपुराण_-_पर्व_5#378|पद्मपुराण - 5.378]] </span></p>
<p id="8">(8) राक्षसवंशी-विद्याधर । राक्षस जातीय देवों के द्वारा द्वीप की रक्षा होने से यहाँ के निवासी राक्षस नाम से प्रसिद्ध हुए । <span class="GRef"> पद्मपुराण 5.386 </span></p>
<p id="8" class="HindiText">(8) राक्षसवंशी-विद्याधर । राक्षस जातीय देवों के द्वारा द्वीप की रक्षा होने से यहाँ के निवासी राक्षस नाम से प्रसिद्ध हुए । <span class="GRef"> [[ग्रन्थ:पद्मपुराण_-_पर्व_5#386|पद्मपुराण -5. 386]] </span></p>
<p id="9">(9) विद्याधर । ये न देव होते हैं न राक्षस । ये राक्षस नामक द्वीप के रक्षक होने से राक्षस कहलाते थे । <span class="GRef"> पद्मपुराण 43.38 </span></p>
<p id="9" class="HindiText">(9) विद्याधर । ये न देव होते हैं न राक्षस । ये राक्षस नामक द्वीप के रक्षक होने से राक्षस कहलाते थे । <span class="GRef"> [[ग्रन्थ:पद्मपुराण_-_पर्व_43#38|पद्मपुराण - 43.38]] </span></p>
<p id="10">(10) एक अस्त्र-बाण । जरासंध ने इसको कृष्ण पर फेंका था और कृष्ण ने इस अस्त्र का नारायण अस्त्र से निवारण किया था । <span class="GRef"> हरिवंशपुराण 52.54 </span></p>
<p id="10">(10) एक अस्त्र-बाण । जरासंध ने इसको कृष्ण पर फेंका था और कृष्ण ने इस अस्त्र का नारायण अस्त्र से निवारण किया था । <span class="GRef"> [[ग्रन्थ:हरिवंश पुराण_-_सर्ग_52#54|हरिवंशपुराण - 52.54]] </span></p>
   </div>
   </div>



Latest revision as of 15:21, 27 November 2023



सिद्धांतकोष से

  1. व्यंतर देवों का एक भेद− सम्बंधित विषय की अधिक जानकारी के लिए - देखें व्यंतर ।
  2. पिशाच जातीय व्यंतर देवों का एक भेद | सम्बंधित विषय की अधिक जानकारी के लिए−देखें पिशाच ।
  3. मनोवेग विद्याधर का पुत्र था ( पद्मपुराण/5/378 ) इसी के नाम पर राक्षस द्वीप में रहने वाले विद्याधरों का वंश राक्षस वंश कहलाने लगा । सम्बंधित विषय की अधिक जानकारी के लिए −देखें इतिहास - 9.12 ।
  1. राक्षस का लक्षण
    धवला 13/5, 5, 140/391/10 भीषणरूपविकरणप्रियाः राक्षसा नाम । = जिन्हें भीषण रूप की विक्रिया करना प्रिय है, वे राक्षस कहलाते हैं ।
  2. राक्षस देव के भेद
    ति. पं./6/44 भीममहाभीमविग्घविणायका उदकरक्खसा तह य । रक्खसरक्खसणामा सत्तमया बम्हरक्खसया ।44। = भीम, महाभीम, विनायक, उदक, राक्षस, राक्षसराक्षस और सातवाँ ब्रह्मराक्षस इस प्रकार ये सात भेद राक्षस देवों के हैं ।44। ( त्रिलोकसार/267 ) ।
  • राक्षस देवों के वर्ण वैभव अवस्थान आदि | सम्बंधित विषय की अधिक जानकारी के लिए−देखें व्यंतर ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

पुराणकोष से

(1) व्यंतर जाति के देव । ये पहली पृथिवी के पंकभाग में रहते हैं । हरिवंशपुराण - 4.50

(2) रात्रि का दूसरा प्रहर । महापुराण 74.255

(3) पलाशनगर का राजा । इसे राक्षस-विद्या सिद्ध होने के कारण इसका यह नाम प्रसिद्ध हो गया था । महापुराण 75.116

(4) एक विद्या । मर 75.116

(5) जंबूद्वीप के भरतक्षेत्र की दक्षिण दिशा में स्थित एक द्वीप । राक्षसवंशी-विद्याधरों द्वारा रक्षा किये जाने से यह द्वीप इस नाम से प्रसिद्ध हुआ । इसकी परिधि इक्कीस योजन है । पद्मपुराण - 3.43, 5. 386, 48.106-107

(6) विद्याधर मनोवेग का पुत्र । सुप्रभा इसकी रानी थी । इसके दो पुत्र थे― आदित्यगति और वृहत्कीर्ति । इस राजा ने इन्हीं पुत्रों को राज्यभार सौंपकर दीक्षा ले ली थी । यह मरकर स्वर्ग में देव हुआ । पद्मपुराण - 5.378-380

(7) विद्याघरों का एक वंश । इस वंश में एक राक्षस नाम का विद्याधर हुआ है, जिसके नाम पर यह वंश प्रसिद्ध हुआ । पद्मपुराण - 5.378

(8) राक्षसवंशी-विद्याधर । राक्षस जातीय देवों के द्वारा द्वीप की रक्षा होने से यहाँ के निवासी राक्षस नाम से प्रसिद्ध हुए । पद्मपुराण -5. 386

(9) विद्याधर । ये न देव होते हैं न राक्षस । ये राक्षस नामक द्वीप के रक्षक होने से राक्षस कहलाते थे । पद्मपुराण - 43.38

(10) एक अस्त्र-बाण । जरासंध ने इसको कृष्ण पर फेंका था और कृष्ण ने इस अस्त्र का नारायण अस्त्र से निवारण किया था । हरिवंशपुराण - 52.54


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=राक्षस&oldid=128184"
Categories:
  • र
  • पुराण-कोष
  • प्रथमानुयोग
  • करणानुयोग
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 27 November 2023, at 15:21.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki