• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 3 - समय-व्याख्या

From जैनकोष



समवाओ पंचण्हं समयमिणं जिणवरेहिं पण्णत्तं ।

सो चेव हवदि लोगो तत्तो अमओ अलोयक्खं ॥3॥

अर्थ: 

पाँच अस्तिकायों का समवायरूप समय जिनेन्द्र भगवान द्वारा कहा गया है, वही लोक है तथा उससे आगे असीम अलोक नामक आकाश है।

समय-व्याख्या: 

अत्र शब्‍दज्ञानार्थरूपेण त्रिविधाऽभिधेयता समयशब्‍दस्‍य लोकालोकविभागश्‍चाभिहित: । तत्र च पंचानामस्तिकायानां समो मध्‍यस्‍थो रागद्वेषाभ्‍यामनुहतो वर्णपदवाक्‍यसन्निवेशविशिष्‍ट: पाठो वाद: शब्‍दसमय: शब्‍दागम इति यावत् । तेषामेव मिथ्‍यादर्शनोदयोच्‍छेदे सति सम्‍यगवाय: परिच्‍छेदो ज्ञानसमयो ज्ञानागम इति यावत् । तेषामेवाभिधानप्रत्‍ययपरिच्छिन्नानां वस्‍तुरूपेण समवाय: संघातोऽर्थसमय: सर्वपदार्थ सार्थ इति यावत् । तदत्र ज्ञानसमयप्रसिद्धार्थं शब्‍दसमयसम्‍बन्‍धेनार्थसमयोऽभिधातुमभिप्रेत: अथ तस्‍यैवार्थसमयस्‍य द्वैविध्‍यं लोकालोकविकल्‍पात् । स एव पञ्चास्तिकायसमवायो यावांस्‍तावाल्लोकस्‍तत: परममितोऽनन्‍तो ह्यलोक:, स तु नाभावमात्रं किन्‍तु तत्‍समवायातिरिक्तपरिमाणमनन्‍तक्षेत्रं खमाकाशमिति ॥३॥

समय-व्याख्या हिंदी : 

यहाँ (इस गाथा में शब्द-रूप से, ज्ञान-रूप से और अर्थ रूप से, शब्द-समय, ज्ञान-समय और अर्थ-समय) -- ऐसे तीन प्रकार से 'समय' शब्द का अर्थ कहा है तथा लोक-अलोकरूप विभाग कहा है ।

वहाँ,

  1. 'सम' अर्थात मध्यस्थ यानी जो राग-द्वेष से विकृत नहीं हुआ; 'वाद' अर्थात वर्ण (अक्षर), पद (शब्द) और वाक्य के समुह्वाला पाठ । पाँच अस्तिकाय का 'समवाद' अर्थात मध्यस्थ (राग-द्वेष से विकृत नहीं हुआ) पाठ (मौखिक या शास्त्रारूढ़ निरूपण) वह शब्द-समय है, अर्थात शब्दागम वह शब्द-समय है ।
  2. मिथ्यादर्शन के उदय का नाश होने पर, उस पंचास्तिकाय का ही सम्यक अवाय अर्थात सम्यक-ज्ञान वह ज्ञान-समय है, अर्थात ज्ञानागम वह ज्ञान-समय है ।
  3. कथन के निमित्त से ज्ञात हुए उस पंचास्तिकाय का ही वस्तुरूप से समवाय अर्थात समूह वह अर्थ-समय है, अर्थात सर्व-पदार्थ-समूह वह अर्थ-समय है ।
उसमें यहाँ ज्ञान-समय की प्रसिद्धि के हेतु शब्द-समय के सम्बन्ध से अर्थ-समय का कथन (श्रीमद-भगवत्कुंद-कुन्दाचार्य-देव) करना चाहते हैं ।

अब, उसी अर्थ-समय का, लोक और अलोक के भेद के कारण द्विविध-पना है । वहीँ पंचास्तिकाय-समूह जितना है, उतना लोक है । उससे आगे अमाप अर्थात अनंत अलोक है । वह अलोक आभाव-मात्र नहीं है किन्तु पंचास्तिकाय-समूह जितना क्षेत्र छोड़ कर शेष अनन्त क्षेत्र-वाला आकाश है (अर्थात् अलोक शून्य-रूप नहीं है किन्तु शुद्ध आकाश-द्रव्य-रूप है) ॥३॥

पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

समय-व्याख्या अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:पंचास्तिकाय_संग्रह-सूत्र_-_गाथा_3_-_समय-व्याख्या&oldid=115689"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 30 June 2023, at 13:26.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki