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ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 16

From जैनकोष



अथस्थितीकरणगुणंसम्यग्दर्शनस्यदर्शयन्नाह --


दर्शनाच्चरणाद्वापि, चलतां धर्मवत्सलै:
प्रत्यवस्थापनं प्राज्ञै:, स्थितिकरणमुच्यते ॥16॥


टीका: 

स्थितीकरणम् अस्थितस्यदर्शनादेश्चलितस्यस्थितकरणंस्थितीकरणमुच्यते । कै: ? प्राज्ञैस्तद्विचक्षणै: । किन्‍तत् ? प्रत्यवस्थापनं दर्शनादौपूर्ववत्पुनरप्यवस्थापनम् । केषाम् ? चलताम् । कस्मात् ? दर्शनाच्चरणाद्वापि । कैस्तेषाम्‍प्रत्यवस्थापनम् ? धर्मवत्सलै: धर्मवात्सल्ययुक्तै: ॥१६॥




सम्यग्दर्शन के स्थितिकरण गुण को दिखलाते हुए कहते हैं-




दर्शनाच्चरणाद्वापि, चलतां धर्मवत्सलै:

प्रत्यवस्थापनं प्राज्ञै:, स्थितिकरणमुच्यते ॥16॥


टीकार्थ:

स्थितीकरण में जो 'च्चि' प्रत्यय हुआ है वह 'अभूततद्भाव' अर्थ में हुआ है । इसलिए 'अस्थितस्य दर्शनादेश्चलितस्य स्थितिकरणं स्थितीकरणं' अर्थात् दर्शनादि से चलायमान होते हुए पुरुष को फिर से उसी व्रत में स्थित कर देना स्थितीकरण अङ्ग है । कोई जीव बाह्य आचरण का यथायोग्य पालन करता हुआ भी श्रद्धा से भ्रष्ट हो जाता है तथा कोई दृढ़ श्रद्धानी होता हुआ भी शारीरिक अशक्तता या प्रमादादि के कारण बाह्य आचरण से भ्रष्ट है । कोई जीव तीव्र पाप के कारण श्रद्धान-आचरण दोनों से भ्रष्ट है । धर्म में प्रेम रखने वाले जनों को चाहिए कि वे उन्हें फिर से उसी व्रतादि में स्थित करें । यह सम्यग्दर्शन का स्थितीकरण अंग है ।



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