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ग्रन्थ

ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 17

From जैनकोष



अथवात्सल्‍यगुणस्वरूपन्‍दर्शनेप्रकटयन्नाह-


स्वयूथ्यान्प्रति सद्भाव-सनाथापेतकैतवा
प्रतिपत्ति-र्यथायोग्यं, वात्सल्यमभिलप्यते ॥17॥


टीका: 

वात्सल्यंसधर्मिणिस्नेह: । अभिलष्यते प्रतिपाद्यते । कासौ ? प्रतिपत्ति: पूजाप्रशंसादिरूपा । कथम् ? यथायोग्यं योग्यानतिक्रमेण-अञ्जलिकरणाभिमुख-गमन-प्रशंसा-वचनोपकरण-सम्प्रदानादि-लक्षणा । कान्प्रति ? स्वयूथ्यान् जैनान्प्रति । कथम्भूता ? सद्भावसनाथा सद्भावेनावक्रतया-सहिताचित्त-पूर्विकेत्यर्थ: । अतएव अपेतकैतवा अपेतंविनष्टङ्‍कैतवंमायायस्या: ॥१७॥




आगे सम्यग्दर्शन के वात्सल्यगुण का स्वरूप प्रकट करते हुए कहते हैं-




स्वयूथ्यान्प्रति सद्भाव-सनाथापेतकैतवा

प्रतिपत्ति-र्यथायोग्यं, वात्सल्यमभिलप्यते ॥17॥


टीकार्थ:

स्वस्य यूथ: स्वयूथ: तस्मिन् भवा: स्वयूथ्यास्तान् अपने सहधर्मी बन्धुओं के समूह में रहने वालों को स्वयूथ्य कहते हैं । इन सहधर्मियों के प्रति सद्भावना सहित अर्थात् सरलभाव से मायाचार रहित, यथायोग्य - हाथ-जोडऩा, सम्मुख-जाना, प्रशंसा के वचन कहना तथा योग्य उपकरण आदि देकर जो आदर सत्कार किया जाता है, वह वात्सल्य-गुण कहलाता है । वत्सलस्य भाव: कर्म वा वात्सल्यम् वात्सल्य का अर्थ सहधर्मी भाइयों के प्रति धार्मिक स्नेह का होना ।



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