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ग्रन्थ

ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 45

From जैनकोष



तथा-


गृहमेध्यनगाराणां चारित्रोत्पत्तिवृद्धिरक्षाङ्‍गम्
चरणानुयोगसमयं सम्यग्ज्ञानं विजानाति ॥4॥


टीका: 

सम्यग्ज्ञानं भावश्रुतरूपम् । विजानाति विशेषेण जानाति । कम् ? चरणानुयोगसमयं चारित्रप्रतिपादकं शास्त्रमाचाराङ्गादि । कथम्भूतम् ? चारित्रोत्पत्तिवृद्धिरक्षाङ्गं चारित्रस्योत्पत्तिश्च वृद्धिश्च रक्षा च तासामङ्गं कारणम् अङ्गानि वा कारणानि प्ररूप्यन्ते यत्र। केषां तदङ्गम्? गृहमेध्यनगाराणां गृहमेधिन: श्रावका: अनगारा मुनयस्तेषाम् ॥४॥




अब चरनानुयोग का लक्षण कहते हैं-




गृहमेध्यनगाराणां चारित्रोत्पत्तिवृद्धिरक्षाङ्‍गम्

चरणानुयोगसमयं सम्यग्ज्ञानं विजानाति ॥4॥


टीकार्थ:

सम्यग्ज्ञान चरणानुयोग को भी जानता है । चारित्र का प्रतिपादन करने वाले आचारांग आदि शास्त्र चरणानुयोग शास्त्र कहलाते हैं । इन शास्त्रों में गृहस्थ-श्रावक और मुनियों के चारित्र की उत्पत्ति, वृद्धि और रक्षा के कारणों का विशद वर्णन है । समीचीन श्रुतज्ञान इन सब शास्त्रों को विशेषरूप से जानता है ।



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