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ग्रन्थ

ग्रन्थ:हरिवंश पुराण - सर्ग 38

From जैनकोष



तदनंतर इंद्र की आज्ञा और अपनी भक्ति के भार से कुबेर ने स्वयं आकर शुभ तीर्थजल से भगवान् के माता-पिता का अच्छी तरह अभिषेक किया और मनोज्ञ कल्पवृक्षों से उत्पन्न अन्यजन दुर्लभ सुगंध और उत्तमोत्तम आभूषणों से उनकी पूजा की ॥1॥ जिस प्रकार आकाश की लक्ष्मी अपने निर्मल उदर में चंद्रमा को धारण करती है उसी प्रकार भगवान् की माता शिवादेवी ने प्रसिद्ध दिक्कुमारी देवियों के द्वारा पहले से ही शुद्ध किये हुए अपने निर्मल उदर में जगत् के कल्याण के लिए सर्वप्रथम उस गर्भ को धारण किया जो उठती हुई प्रभा से युक्त था, अपने बंधुजनरूपी समुद्र की वृद्धि को करने वाला था तथा संताप के उदय को दूर करने वाला था ॥2॥ उस गर्भरूपी फल के भार ने अत्यधिक दया से प्रेरित होकर ही मानो स्तनरूपी गुच्छों के भार से नम्रीभूत एवं पतली कमर वाली शिवादेवीरूपी लता को रंचमात्र भी बाधा नहीं पहुंचायी थी । न तो उसकी त्रिवलि रूपी तरंग की शोभा को नष्ट किया था, न श्वासोच्छ्वास से उसके अधररूपी पल्लव को बाधित किया था और न उसे आलस्य से युक्त ही होने दिया था ॥3॥ अपने अत्यंत गूढ़ गर्भ में भगवान् के शरीर की जो उत्पत्ति हुई थी उसे प्रकट करने के लिए ही मानो शिवादेवी के स्तनों का भार अत्यधिक दूध से परिपूर्णता को प्राप्त हो गया था तथा मेखला के सघन बंधन से युक्त उसकी नितंब स्थली उस स्तन के भार को धारण करने के गौरव से ही मानो अत्यधिक विस्तृत हो गया थी ॥4॥

उस समय भगवान् के प्रभाव से शिवादेवी का मन संसार की रक्षा करने तथा समस्त तत्त्वों के अवलोकन करने में अभ्यस्त रहता था, वचन सब प्रकार के संशय को नष्ट करने वाले हितकारी भाषण में अभ्यस्त रहता था और शरीर व्रतरूपी आभूषण के धारण करने तथा विनय के पोषण करने में अभ्यस्त रहता था ॥ 5॥ भगवान् की माता, देवांगनाओं के द्वारा संपादित एवं अनंतगुणी कांति और बल को बढ़ाने वाला अमृतमय आहार करती थी इसलिए उनका शरीर कृश होने पर भी अपनी प्रभा से दशों दिशाओं को सुवर्ण जैसी कांति का धारक करता हुआ बिजली के समान सुशोभित हो रहा था ॥6॥ हाथीरूपी मगरमच्छों, उछलते हुए उन्नत अश्वरूपी मीन-समूहों, बड़े-बड़े रथरूपी जहाजों, राजाओं की सेनारूपी नदियों और जहाँ-तहाँ प्रवेश करते हुए मित्रोंरूपी तरंगों से प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त हुए राजा समुद्रविजय उस समय सचमुच ही विशाल समुद्र की शोभा को धारण करते हुए वृद्धिंगत हो रहे थे ॥7॥ इस प्रकार जो जगद्वलयरूपी वेला से पूजित थे, परस्पर में जिनका विशाल हर्ष निरंतर बढ़ रहा था और जो इंद्र की आज्ञा में लीन देव देवियों के द्वारा की हुई विभूति से सहित थे ऐसे भगवान् के माता-पिता ने गर्भ के नौ माह सानंद व्यतीत किये ॥8॥

तदनंतर वैशाख शुक्ल त्रयोदशी को शुभ तिथि में रात्रि के समय जब चंद्रमा का चित्रा नक्षत्र के साथ संयोग था और समस्त शुभग्रहों का समूह जब यथायोग्य उत्तम स्थानों पर स्थित था तब शिवादेवी ने समस्त जगत् को जीतने वाले अतिशय सुंदर पुत्र को उत्पन्न किया ॥9॥ जो तीन ज्ञानरूपी उज्ज्वल नेत्रों के धारक थे तथा एक हजार आठ लक्षणों से युक्त नील कमल के समान सुंदर शरीर को धारण कर रहे थे ऐसे जिनबालक ने अपनी कांति के द्वारा, प्रसूतिका गृह के भीतर व्याप्त मणिमय दीपकों के कांतिसमूह को कई गुणा अधिक कर दिया था ॥10॥ उस समय जिनेंद्र रूपी चंद्रमा का उदय होने पर जो धवल पयोधर― मेघों को धारण करने वाली थी (पक्ष में धवल स्तनों से युक्त थी) अखंड-पूर्ण चंद्रमा ही जिसका मुख था (पक्ष में पूर्ण चंद्रमा के समान जिसका मुख था), देदीप्यमान ताराओं के समूह ही जिसके आभूषण थे (पक्ष में देदीप्यमान ताराओं के समूह के समान जिसके आभूषण थे), जो अत्यंत सुंदरी थी (पक्ष में हार से सुशोभित थी) और जो तरंगरूपी भुजपंजर के मध्य में वर्तमान थी ऐसी-आकाशरूपी स्त्री का मदनरूपी महा सागर ने अपनी इच्छानुसार चुंबन किया था ॥ 11 ॥

उस समय जो सुमेरुरूपी गंभीर नाभि से युक्त थी, कुलाचलरूपी कंठ और स्तनों से सहित थी, बहती हुई नदियों के समूहरूपी हार के भार को धारण करने वाली थी, समुद्र का घेरा ही जिसका वस्त्र था तथा शब्दायमान वेदि का ही जिसकी मेखला थी, ऐसी जंबूद्वीप की भूमि चल-विचल हो गयी जिससे ऐसी जान पड़ती थी मानो हर्ष के वशीभूत हो नृत्य ही कर रही हो ॥12॥ जो अनुत्तर विमानरूपी मुख से उज्ज्वल था, मोक्षरूपी मस्तक से सहित था, नौ अनुदिश रूपी ठोड़ी से युक्त था, नौ ग्रैवेयकरूपी ग्रीवा को धारण करने वाला था, स्वर्गरूपी शरीर से सहित था तथा मध्यम लोकरूपी कमर और अधोलोकरूपी जंघाओं से युक्त था ऐसा तीन लोकरूपी पुरुष उस समय चंचल हो उठा था सो ऐसा जान पड़ता था मानो कमर पर हाथ रखकर नृत्य ही कर रहा हो ॥13 ॥ उस समय जिनेंद्र भगवान् के जन्म के प्रभाव से भवनवासी देवों के लोक में अपने आप शंखों का जोरदार शब्द होने लगा । समस्त व्यंतर देवों के लोक में शीघ्र ही जोरदार पटह शब्द होने लगे । सूर्य लोक में सिंहनाद होने लगा और कल्पवासी देवों के भवनों में विशाल शब्द करने वाले घंटा बज उठे ॥14॥ तदनंतर जिनके मुकुट और सिंहासन कंपायमान हो रहे थे, जिन्होंने अपने अवधिज्ञानरूपी नेत्र को प्रयुक्त किया था और उसके द्वारा जिनेंद्र भगवान् के जन्म को जानकर जिन्हें अत्यधिक हर्ष उत्पन्न हुआ था, ऐसे तीनों लोकों में रहने वाले सुरेंद्र तथा असुरेंद्र चतुर्णिकाय के देवों को साथ ले बड़ी विभूति से भरत क्षेत्र की ओर चल पड़े ॥15॥

हाथ जोड़कर मस्तक से लगाते समय मुकुटों अग्रभाग से टकराये हुए कंटकों के रत्नों को किरणों से जिन्होंने समस्त दिशाओं के अग्रभाग व्याप्त कर दिये थे ऐसे अत्यंत शुद्ध सम्यग्दर्शन के धारक अहमिंद्र देव, यद्यपि अपने-अपने ही निवासस्थानों में ही स्थित रहे थे तथापि उन्होंने सिंहासनों से सात कदम सामने आकर जिनेंद्र भगवान् को नमस्कार किया था ॥16 ॥ असुरकुमार, नागकुमार, विद्युत् कुमार, अग्निकुमार, वायु कुमार, द्वीपकुमार, महोदधिकुमार, स्तनितकुमार और उदधिकुमार ये दश प्रकार के भवनवासी देव, दशों दिशाओं को देदीप्यमान करते हुए जहां-तहाँ पृथिवी से ऊपर आने लगे ॥ 17 ॥ जिनकी स्त्रियाँ मन को हरण करने में दक्ष, गीत तथा नाना प्रकार के नृत्यों से युक्त थीं, ऐसे किंपुरुष, किन्नर, महोरग, राक्षस, पिशाच, भूत, यक्ष और गंधर्व ये मध्यलोक में विशिष्ट प्रीति के रखने वाले आठ प्रकार के व्यंतर देव चारों ओर से आने लगे ॥18॥ उज्ज्वल किरणों से युक्त ग्रह, नक्षत्र, चंद्रमा, सूर्य और तारा नाम को धारण करने वाले पांच प्रकार के प्रसिद्ध ज्योतिषी देवों का समूह एक साथ अपने-अपने विमानों से यहाँ आता हुआ ऐसा सुशोभित होने लगा मानो वह पृथिवी पर एक दूसरा ही ज्योतिषलोक बनाने के लिए उद्यत हुआ हो ॥19॥

जो यथायोग्य अपनी-अपनी सात प्रकार की सेनाओं के सहित थे, ऐसे प्रथम स्वर्ग से लेकर सोलहवें स्वर्ग तक के सोलह इंद्र, आनंद के वशीभूत हो समस्त स्वर्गों के देवों के साथ यहाँ आ पहुंचे ॥20॥ सौधर्मेंद्र अपनी स्त्रियों के साथ उस ऐरावत नामक गजराज पर बैठा हुआ सुशोभित हो रहा था, जो चलते-फिरते हिमालय के समान जान पड़ता तथा अनेक मुखों के भीतर दाँतों पर विद्यमान कमल-समूह की कलिकाओं पर नृत्य करती हुई देवांगनाओं के सुंदर नृत्य से सुशोभित था ॥2॥ इंद्र को चारों ओर से घेरे हुए देवों की वह सेना सुशोभित हो रही थी जिसने सात कक्षाओं का विभाग किया था, जो गोल आकार के सहित थी, स्वाभाविक पुरुषार्थ से युक्त थी तथा वन आदि शस्त्रों के वज्र से जिसने आकाश के अंतराल को रोक रखा था ॥22॥ तदनंतर घोड़ों की बहुत बड़ी विराट सेना थी जो अपने वेग से शीघ्रगामी वायु को शीघ्र ही जीत रही थी । जो अपनी हिनहिनाहट से तीन लोक के अंतराल को संयुक्त तथा वियुक्त कर रही थी और आकाश रूपी समुद्र की उठती हुई तरंगों के समूह के समान जान पड़ती थी ॥23॥ तदनंतर बैलों की वह सेना चारों ओर खड़ी थी जो कि सुंदर मुख, सुंदर अंडकोष, नयन कमल, मनोहर कांदोल, पूंछ, शब्द, सुंदर शरीर, सास्ना, सुवर्णमय खुर और सींगों से युक्त थी तथा अत्यधिक कांति से युक्त चंद्रमा की प्रभा को धारण कर रही थी ॥24॥ तदनंतर रथों की वह सेना भी सुशोभित हो रही थी जो स्वयं सात प्रकार से विभिन्न होने पर भी पर्वतों से अभेद्य थी, आकाशरूपी सागर में जो देवों के यानपात्र के समान जान पड़ती थी, प्रभा से जिसने सूर्य के देदीप्यमान रथ को जीत लिया था, जो अत्यंत मनोहर थी और जिसका घेरा वलय के समान सुशोभित था ॥25॥

तत्पश्चात् जो चारों ओर जल के छींटों की वर्षा कर रहे थे, जिनके शुंडादंड ऊपर की ओर उठे हुए थे, जो बहुत भारी गर्जना कर रहे थे, जो आकार में बहुत भारी थे, एवं जो बड़े-बड़े देवों से अधिष्ठित थे, ऐसे मेघों की समानता धारण करने वाले हाथियों से रचित, अनेक प्रकार की रचनाओं से युक्त हाथियों की सेना भी वर्षा ऋतु की शोभा विस्तृत कर रही थी ॥26॥ हाथियों की सेना के बाद गंधर्वों की वह सेनी सुशोभित हो रही थी जिसने मधुर मूर्छना से कोमल वीणा, उत्कृष्ट बाँसुरी और ताल के शब्द से मिश्रित सातों प्रकार के आश्रित स्वरों से जगत् के मध्यभाग को पूर्ण कर दिया था, जो देव-देवांगनाओं से सुशोभित थी एवं सबको आनंद उत्पन्न करने वाली थी ꠰꠰27॥ गंधर्वों की सेना के बाद उत्कृष्ट नृत्य करने वाली नर्तकियों की वह सेना भी आकाश में प्रकट हुई थी जो कि नितंबों के भार से मंद-मंद चल रही थी, समस्त रसों को पुष्ट करने वाली थी और वलयों से सुशोभित अपने शरीरों से देवरूपी वृक्षों के मनरूपी पुष्पमंजरी को ग्रहण कर रही थीं ॥28॥ प्रत्येक सेना में सात-सात कक्षाएं थीं । उनमें से प्रथम कक्षों में चौरासी हजार घोड़े बैल आदि थे फिर दूसरी-तीसरी आदि कक्षाओं में क्रम से दूने-दूने होते गये थे ॥29॥

अपनी-अपनी सेनाओं से युक्त समस्त इंद्र, भगवान का जन्माभिषेक करने के लिए आकाश में व्यास हो जब तक सूर्यपुर आते हैं तब-तक प्रसन्नता से युक्त एवं आदर से भरी दिक्कुमारी देवियाँ भगवान का समस्त जातकर्म करने लगी ॥ 30 ꠰꠰ देवियों में निर्मल हारों के धारण करने से सुशोभित वैजयंती, अपराजिता, जयंती, नंदा, आनंदा, नंदिवर्धना और हृदय को आनंदित करने वाली नंदोत्तरी नाम की देवियाँ अपने स्तनों के समान स्थूल तथा अंग से विगलित होते हुए शृंगार रस के समान, निर्मल जल से भरी हुई बड़ी, ऊंची झारियाँ लिये हुए थीं ॥31-32॥ यशोधरा, सुप्रसिद्धा, सुकीर्ति, सुस्थिता, प्रणिधि, लक्ष्मीमती, विचित्र गुणों से युक्त चित्रा और मंधरा ये देवियों मणिमय दर्पण लेकर खड़ी थीं और चंद्रमा से युक्त दिशाओं के समान सुशोभित हो रही थी ꠰꠰33꠰꠰

इला, नवमिका, सुरा, पीता, पद्मावती, पृथ्वी, प्रवरकांचना, और चंद्रिका नाम की देवियां, प्रभा से देदीप्यमान ताराओं के समान आभूषणों से सुशोभित तथा देदीप्यमान थीं । ये देवियाँ भगवान् की माता पर सफेद छत्र लगाये हुए थीं और चंद्रमा के सहित रात्रियों के समान जान पड़ती थीं ॥34॥ श्री, धृति, आशा, वारुणी, पुंडरीकिणी, अलंबुसा, मिश्रकेशी और ह्री आदि देवियाँ हाथों पर चामर लिये खड़ी थीं तथा अधिक फेनावली और तरंगों से युक्त आयी हुई कुलनदियों-―गंगा आदि नदियों के समान सुशोभित हो रही थीं ॥35॥ देदीप्यमान कनचित्रा, चित्रा, तीन लोक के देवों में प्रसिद्ध त्रिसिर और सूत्रामणि) ये विद्युत्कुमारी देवियां उस समय जिनेंद्र भगवान के समीप अपनी चेष्टाओं से, ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो मेघ के समीप अंध कार को नष्ट करने वाली बिजलीरूपी लताएं ही हों ॥36 ॥ उस समय समस्त विद्युत्कुमारियों में प्रधान रुचकप्रभा, रुचका, रुचकाभा और रुचकोज्ज्वला तथा दिक्कुमारियों में प्रधान विजय आदि चार देवियाँ विधिपूर्वक भगवान् का जातकर्म कर रही थीं ॥37꠰꠰

भगवान् के जन्मोत्सव के पूर्व ही कुबेर ने सूर्यपुर की अद्भुत शोभा बना रखी थी । उसके महलों पर बड़ी-बड़ी ऊंची-ऊंची ध्वजाएं फहरा रही थीं तथा वह इंद्रलोक की शोभा को जीतने के लिए उद्यत सरीखा जान पड़ता था । अपने-अपने इंद्रों सहित चारों निकायों के सुर और असुर आदर के साथ शीघ्र ही आकर जिनेंद्र भगवान् की भक्ति से उस नगर की तीन प्रदक्षिणाएँ दे उसकी शोभा देखने लगे ॥38॥ तदनंतर सज्जनों का सखा और मर्यादा को जानने वाला इंद्र नगर में प्रवेश कर शिवादेवी के महल के समीप खड़ा हो गया और वहीं से उसने आदर से युक्त, पवित्र एवं चंचलता से रहित इंद्राणी को जात बालक के लाने का आदेश दिया । पति की आज्ञानुसार इंद्राणी ने प्रसूतिका-गृह में प्रवेश किया । उस समय आदर से भरी इंद्राणी अत्यधिक सुशोभित हो रही थी ꠰꠰39॥ वहाँ उसने यत्नपूर्वक जिन-माता को प्रणाम कर मायामयी निद्रा में सुला दिया तथा देव-माया से एक दूसरा बालक बनाकर उनके समीप लिटा दिया । तदनंतर इंद्राणी ने कोमल हाथों से जिन-बालक को उठाकर अपने स्वामी-इंद्र के लिए दे दिया और देवों के राजा इंद्र ने सिर से जिन-बालक को प्रणाम कर दोनों हाथों से उन्हें ले लिया ॥40॥ जिन्होंने अपने मुखरूपी चंद्रमा के द्वारा चंद्रमा को जीत लिया था, नेत्रों से पुंडरीक― सफेद कमल को जीत लिया था, शरीर की कांति से नीलकमलों के वन की शोभा को प्रमुख रूप से पराजित कर दिया था और अपने हाथों तथा पैरों से कमलों को पराभूत कर दिया था ऐसे जिनेंद्र बालक को उस समय इंद्र एक हजार नेत्रों से भी देखकर तृप्ति को प्राप्त नहीं हुआ, उसकी देखने की उत्कंठा ज्यों की त्यों बनी रही ॥41॥ वह इंद्र जिनके मस्तक पर इंद्रनील मणि का ऊंचा चूडामणि सुशोभित हो रहा था, ऐसे जिन-बालक को ऐरावत हाथीरूपी स्फटिकमय पर्वत के मस्तक पर विराजमान कर चला । उस समय वह इंद्र चंचल चामर और छत्रों से अतिशय शोभायमान था और उनसे ऐसा जान पढ़ता था मानो चंचल तरंगों के समूह से युक्त फेन से भरा समुद्र ही चला जा रहा हो ॥42॥

ऐरावत हाथी के बत्तीस मुख थे, प्रत्येक मुख में आठ-आठ दाँत थे, प्रत्येक दाँत पर एक-एक सरोवर था, प्रत्येक सरोवर में एक-एक कमलिनी थी, एक-एक कमलिनी में बत्तीस-बत्तीस पत्र थे और एक-एक पत्र पर उत्तम रस से भरी हुई एक-एक अप्सरा नृत्य कर रही थी ॥43॥ उस प्रकार की लोकोत्तर विभूति के साथ देव लोग मेरुपर्वत के समीप पहुंचे तथा उसकी परिक्रमा देकर पांडुक नामक विशाल वन खंड में प्रविष्ट हुए । वहाँ उन्होंने विशाल पांडुक शिला के ऊपर जो पाँच सौ धनुष ऊँचा सिंहासन है उस पर जिन-बालक को विराजमान किया ॥44॥

तदनंतर पूजा के उपकरणों को धारण करने वाले एवं नवीन उत्सव से आनंदित देवांगनाओं के समूह जब चारों ओर खड़े थे, स्पष्ट तथा श्रेष्ठ रस, भाव, हाव और लय से देवों को अनुरंजित करने वाले श्रेष्ठ नृत्यकारों के समूह जब नृत्य कर रहे थे, सुमेरुपर्वत की सुविशाल गुफाओं से गूंजने वाली प्रतिध्वनि से वृद्धिंगत, दिशाओं के अंतराल में फैलने वाले, जिनेंद्र भगवान् के गुणों के समान अत्यंत प्रकट एवं कानों को सुख देने वाले बजते हुए नगाड़ों और शंखों के शब्द तथा सिंहनाद और भेरियों की ध्वनियों से जब संसार का मध्यभाग परिपूर्ण हो रहा था, प्रकट होती हुई सुगंधि से युक्त, नाना प्रकार के पटवास, धूपों के समूह और उत्तमोत्तम पुष्पों के समूह जब इधर-उधर आकाश तल को व्याप्त कर रहे थे और मुखरूपी पांडुक वन से उत्पन्न उत्कृष्ट गंध से हृदय को प्रिय लगने वाली सुंदर वायु जब दिशाओं के मुख को अत्यंत सुगंधित कर रही थी तब अनेक शरीरों को धारण करने वाले इंद्र ने देवों के साथ भक्ति पूर्वक देवों के द्वारा लाये हुए मणिमय और सुवर्णमय कुंभों से च्युत अत्यंत सुगंधित क्षीर सागर के शुभ जल से जिनेंद्र भगवान् का स्वयं महाभिषेक करना शुरू किया ॥45-48॥

उस समय सुमेरुपर्वत और क्षीरसागर के मध्य आकाश में हर्ष से भरी एवं देदीप्यमान मणियों के समूह से उज्ज्वल कलश हाथ में लिये देवों की पंक्तियां सब ओर खड़ी थीं उनसे उस समय वह आकाश ऐसा जान पड़ता था मानो बहुत-सी रस्सियों से बांधकर कहीं ले जाया जा रहा हो ॥49॥ उस समय वहाँ ‘कलश लो’, ‘जल्दी दो’, और ‘तुम भगवान् को शीघ्र ही मेरे सम्मुख धारण करो’ इस प्रकार कानों के लिए प्रिय शब्द हो रहे थे तथा वह कलशों की पंक्ति देव-समूह के एक हाथ से दूसरे हाथ में जाती हुई शोभा पूर्वक पांडुक वन में ऐसी प्रवेश कर रही थी मानो बड़े-बड़े हंसों की पंक्ति ही प्रवेश कर रही हो ॥50॥ आकाश में वेगशाली देवों के वशीभूत (हाथों में स्थित) सुवर्ण, मणि, रत्न और चांदी से निर्मित कलशों की पंक्तियाँ आकाश में ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो सुंदर पंखों की कांति से दिशाओं को व्याप्त करती हुई वेग से उड़ने वाले गरुड़ और हंसों की अनेक पंक्तियां ही हों ॥ 51॥ इंद्र की भुजाओं के द्वारा उठाये हुए, मेघों के समान गर्जना करने वाले एवं उज्ज्वल जल से भरे हुए हजार कलशों से अभिषेक को प्राप्त होने वाले भगवान् ने मेरुपर्वत को सफेद कर दिया सो ठीक ही है क्योंकि शुद्ध पदार्थ के आश्रय से अशुद्ध भी शुद्धता को प्राप्त हो जाता है । भावार्थ― भगवान् के अभिषेक जल से मेरुपर्वत सफेद-सफेद दिखने लगा ॥52॥ जिनशासन की प्राप्ति से जिनके प्रशस्त राग का उदय हो रहा था, जिनके शरीर में रोमांच प्रकट हुए थे और जिनका संसाररूपी सागर अत्यंत अल्प रह गया था ऐसे अन्य समस्त स्वर्गों के इंद्रों ने भी बड़े संतोष के साथ इच्छानुसार निर्मल जल से जिनेंद्र भगवान् का अभिषेक किया था ॥53॥ तदनंतर कोमल हाथों को धारण करने वाली शची आदि इंद्राणियों ने आकर सुगंधित द्रव्यों से भगवान् को उद्वर्तन― उबटन किया और अपने ही स्तनों के समान सुशोभित एक साथ उठाये हुए, शुभ जल से परिपूर्ण कलशों के द्वारा उनका अभिषेक किया ॥54॥ तदनंतर इंद्र आदि समस्त सुर और असुरों के समूह ने उत्तम वस्त्र, मणिमय आभूषण, माला तथा विलेपन से सुशोभित, कल्याण के पर्वत, एवं अतिशय विशाल लक्ष्मी के स्वामी श्री जिनेंद्र देव का अरिष्टनेमि नाम रखकर उनकी प्रदक्षिणा दी और उसके बाद नाना प्रकार को स्तुतियों से उनका स्तवन किया ꠰꠰55꠰꠰

अरिष्टनेमि पुराण के संग्रह से युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराण में भगवान् के जन्माभिषेक का वर्णन करने वाला अड़तीसवां सर्ग समाप्त हआ ॥38॥


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