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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 535

From जैनकोष



जयंति ते जगद्वंद्या यै: सत्यकरुणामये ।

अवंचकेऽपि लोकोऽयं पथि शश्वत्प्रतिष्ठित: ॥535॥

सत्य स्वरूप की रुचि मे उद्धार का मार्ग ― जिन प्राणियों ने इस जगत के प्राणियों को सत्यमार्ग में चलाया, करुणामयी धर्म में लगाया, जिसमें कहीं धोखा नहीं है, यथार्थ सही-सही मार्ग है ऐसे मार्ग में चलाया वे सत्य पुरुष जयशील हैं और जगत में वंदना के योग्य हैं, पूजा के योग्य हैं । जिन आचार्यों ने हमें वस्तु का सत्य स्वरूप दिखाया है और सत्यधर्म पर चलाने की प्रेरणा दी है उन आचार्यों का हम क्या गुणगान करें । हम उनकी इस करुणामयी आशय की समीचीनता में, उपदेश में भी समर्थ नहीं हो सकते । धन्य हैं वे संत पुरुष जिन्होंने लोकोपकार के लिए, सत्यस्वरूप का निर्देश किया है । उस सत्यस्वरूप की धारणा से, श्रद्धान से हम संसार के संकटों से दूर हो सकते हैं । हम अपने आपको मानें कि मैं जगत के सब पदार्थों से न्यारा हूँ । इस देह से भी न्यारा हूँ । ज्ञान करने के अतिरिक्त अन्य कुछ हम कर्तव्य किया ही नहीं करते हैं । विचार बनायें, ज्ञान बनायें, विकल्प करें, वे सब ज्ञान के ही तो परिणमन हैं । इसके अतिरिक्त परवस्तु में हम और कुछ भी नहीं किया करते हैं । ऐसा सतयस्वरूप जानकर पर से उपेक्षा लायें और अपने को कृतकृत्य अनुभव करें । मुझे कुछ करने को है ही नहीं लोक में, क्योंकि सब जुदे-जुदे पदार्थ हैं । यों कृतार्थता का अनुभव करें और सत्यस्वरूप की रुचि बनायें, इस रुचि में ही हम आप सबका उद्धार है ।


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