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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 63

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वस्तुजातमिदं मूढ़ प्रतिक्षण विनश्वरम्।

जानन्नपि न जानासि ग्रह: कोऽयमनौषध:।।63।।

अनित्य को अनित्य मानने से व्याकुलता का अभाव― हे मूढ़ पुरुष ! यह प्रत्यक्ष अनुभव में आता है कि इस संसार में जो पर्यायों का समूह है सो वह पर्यायों की दृष्टि से क्षण-क्षण में नष्ट होने वाला है। इस बात को तू जानकर भी अज्ञानी हो रहा है। यह तेरी कैसी हठ है? क्या तुझ पर कोई पिशाच चढ़ गया है जिसका कि कुछ इलाज ही नहीं होता? अनित्य पदार्थ को नित्य मानने का अज्ञान इस जीव पर लगा है सो यह दु:खी होता है। अचानक चोट पहुँचती है ओ क्या हुआ यह? अरे उस पदार्थ को पहिले से ही ऐसा निश्चित रखिये कि जो कुछ यह मायारूप है यह सब विनष्ट हो जायगा, ऐसा निर्णय रहे तो नष्ट होते समय इसे क्लेश नहीं होता।

मोहियों को वियोग का क्लेश― अहो ऐसा मोह छाया हुआ है विकट कि घर का आदमी बूढ़ा भी हो गया तो क्या वह बूढ़ा भी कभी मरेगा नहीं, पर उस इस मोही वृद्ध के भी वियोगकाल में बड़ा ठेस पहुँचता है, जिसको जिससे जितनी प्रीति है उसके वियोग में उसे उतना ही कष्ट मिलता है। सो क्या ऐसी बात को तू जानता नहीं है? जानता तो होगा। हम आप क्या यह जानते नहीं कि मरण नियम से होगा? अपने मरण की बात नहीं सोच पाते। दूसरों को एक निगाह से देख डालें तो दूसरों पर यह बात बड़ी जल्दी समझ में आयगी कि हाँ ठीक तो है, जो जीवित होता है वह नियम से होता है, पर इसी बात को खुद पर घटाने के लिये मुश्किल जंचता है। यह जानता हुआ भी नहीं जानता ऐसा कोई निरुपाय इसके गृह लग गया है।

कदाचित् महापुरुषों को भी वियोग का खेद― बड़े-बड़े इतिहास और पुराणों में भी ऐसा सुना गया है कि बड़े-बड़े पुरुषों ने भी वियोग काल में बड़ा खेद माना था। नारायण के वियोग में बलभद्र ने कितना खेद माना था, वैसी मिसाल तो यहाँ भी कहीं मिल नहीं पाती। श्रीकृष्ण के मरण पर श्री बलदेव कितने तड़फे थे? श्री लक्ष्मण जी के वियोग पर श्री रामचंद्रजी ने अपनी क्या स्थिति बना ली थी? यह राग पिशाच इस जीव को बुरी तरह से चोट पहुँचाता है। सम्यग्दृष्टि पुरुष भी जब राग का तीव्र उदय आये तो कुछ विवश से होकर ऐसी चेष्टायें करने लगते हैं कि लोग यों कह उठें― ऐसा तो सामान्यजन भी नहीं कर सकता। रागी की वेदना बड़ी प्रबल वेदना होती है। द्वेष की वेदना से भी प्रबल वेदना राग की होती है। हाँ रागपूर्वक जो द्वेष हो रहा है उसमें भी तीव्र वेदना होती है, वह वेदना भी राग से समझिये।

विनाशीक पदार्थों में ही राग का संबंध― जिन वस्तुवों में यह जीव राग करता है वे समस्त पदार्थ विनाशीक हैं, अविनाशी तत्त्व में कौन राग करता है? करके दिखावो। आपमें अविनाशी तत्त्व है चैतन्यस्वभाव। अनादि अनंत शाश्वत एकस्वरूप शक्तिमात्र जो एक प्रतिभास शक्ति है वह है अविनाशी तत्त्व। किसमें राग करने की मन में ठानी है? जो राग करता है वह कषायवान् पुरुषों से राग करता है। चित्स्वरूप से कौन राग करता है? तो जगत् में मित्रता है कषाय की। कषाय से कषाय मिल गई लो मित्रता हो गयी। तो यह मित्रता भी कषाय से की जा रही है। चित्स्वभाव से मित्रता कोई नहीं करता। चित्स्वभाव तो अविनाशी तत्त्व है, उससे कोई प्रीति करे तो सारा काम ही बन जाय। यहाँ तो जो दृश्यमान् पदार्थ हैं उनमें इस जीव का रागभाव पहुँचता है। इन स्कंधों में जो परमार्थ तत्त्व हैं परमाणु, उस परमाणु से कौन राग किया करता है? हाय यह परमाणु मेरा है, बड़ा अच्छा है मुझसे कहीं न जाय। अरे परमाणु टिकता तक भी नहीं है, किसी से बंधता तक भी नहीं है। परमाणु से कोई प्रीति नहीं करता। विनाशीक पदार्थों में यह जीव राग किया करता है। विनाशीक पदार्थों में राग करने का फल उत्तम नहीं है। संसार को बढ़ाने वाला है और आकुलित रखने वाला है।


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